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India Speak Daily > इतिहास > आजाद भारत > माक्सवादी इतिहासकारों और अन्य बुद्धिजीवियों की जुगलबंदी ने जान बूझ कर अटकाया है राम मंदिर की राह में रोड़ा!
आजाद भारतस्वर्णिम भारत

माक्सवादी इतिहासकारों और अन्य बुद्धिजीवियों की जुगलबंदी ने जान बूझ कर अटकाया है राम मंदिर की राह में रोड़ा!

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 9 Min Read
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India Speaks Daily - ISD News
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कविता नायर-फोंडेकर। फिलहाल यह कहना कठिन है कि अयोध्या मसले को आपसी बातचीत से सुलझाने की कोई कोशिश होगी या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि जब भी ऐसी कोई बातचीत होगी तो कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक महत्व के साक्ष्यों की अनदेखी नहीं की जा सकेगी। पुरातात्विक महत्व के कुछ साक्ष्यों की चर्चा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा-‘न्यांन एन्ना भारतियन’ यानी ‘मैं एक भारतीय’ में की है। जनवरी, 2016 में आई इस किताब को लिखने वाले मुहम्मद का गहरा नाता 1976-77 में अयोध्या में हुए उत्खनन और अध्ययन से रहा है। वह प्रोफेसर बीबी लाल की अगुआई वाले उस पुरातत्व दल के सदस्य थे जिसने दो महीने वहां उत्खनन किया था। इस दल को वहां पहले अस्तित्व में रहे मंदिर के अवशेष दिखे और उनसे यह स्पष्ट हुआ कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर की अवशेष सामग्री से ही हुआ था।

केके मुहम्मद ने लिखा है, ‘हमने देखा कि बाबरी मस्जिद की दीवारों पर मंदिर के स्तंभ थे। ये स्तंभ काले पत्थरों से बने थे। स्तंभों के निचले भाग पर पूर्णकलशम जैसी आकृतियां मिलीं, जो 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में नजर आती थीं। वहां ऐसे एकाध नहीं, बल्कि 1992 में मस्जिद विध्वंस के पहले तक 14 स्तंभ मौजूद थे। चूंकि उस जगह पुलिस की सख्त पहरेदारी थी, लिहाजा हर किसी को जाने की आजादी नहीं थी, लेकिन शोध समूह का हिस्सा होने के नाते हमें कोई मनाही नहीं थी। यही वजह है कि हमारे लिए उन स्तंभों का सूक्ष्म अवलोकन करना संभव हुआ।’ केके मुहम्मद के अनुसार, “मस्जिद के पीछे और किनारे वाले हिस्सों में एक चबूतरा भी मिला जो काले बसाल्ट पत्थरों का बना था। इन साक्ष्यों के आधार पर दिसंबर, 1990 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वहां असल में एक मंदिर ही था। तब तक यह ज्वलंत मुद्दा बन गया था, फिर भी तमाम उदारवादी मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को सौंपने पर रजामंदी जताई, लेकिन उनमें सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत नहीं थी। मुहम्मद कहते हैं कि अगर तब बात आगे बढ़ती तो अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो सकता था। मुश्किल यह हुई कि इस विवाद में वामपंथी इतिहासकार कूद पड़े और उन्होंने उन मुसलमानों के पक्ष में दलीलें पेश कीं जो विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंपने के हक में नहीं थे।”

केके मुहम्मद ने एस गोपाल, रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे जेएनयू के इतिहासकारों का विशेष रूप से उल्लेख किया जिन्होंने रामायण की ऐतिहासिकता पर प्रश्न उठाने के साथ ही कहा कि 19वीं शताब्दी से पहले मंदिर विध्वंस के कोई साक्ष्य नहीं हैं। इन इतिहासकारों ने यहां तक कहा कि अयोध्या तो बौद्ध और जैन धर्म का केंद्र था। प्रोफेसर आरएस शर्मा, अख्तर अली, डीएन झा, सूरज भान और इरफान हबीब भी उनके साथ हो गए। इस खेमे में सिर्फ सूरजभान ही पुरातत्व विशेषज्ञ थे। उन्होंने इसी हैसियत से कई सरकारी बैठकों में शिरकत की थी। इनमें से अधिकांश बैठकें इरफान हबीब की अगुआई में हुई थीं जो उस समय भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष भी थे। तत्कालीन सदस्य सचिव एमजीएस नारायणन ने परिषद परिसर में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की बैठक का विरोध भी किया था, मगर इस आपत्ति का उन पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने मीडिया में अपने संबंधों का इस्तेमाल कर अयोध्या मामले में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। यह भी अफसोसजनक है कि इन बातों ने उन उदार मुसलमानों का रुख भी बदल दिया जो पहले समझौते के हक में थे। मुहम्मद इसके लिए प्रमुख मीडिया समूहों को भी कसूरवार मानते हैं जो लगातार इन वामपंथी इतिहासकारों को प्राथमिकता देते रहे।

वामपंथी इतिहासकारों ने समझौते की गुंजाइश हमेशा के लिए खत्म कर दी। अगर उसी समय समझौता हो गया होता तो देश में हिंदू-मुस्लिम रिश्तों में नई मिठास पैदा होती और कई मसले सुलझ जाते। इस गंवाए अवसर ने साबित किया कि किस तरह कुछ इतिहासकारों ने पूरे मामले को वामपंथी चश्मे से ही देखा। इसकी देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। आइएएस अधिकारी और प्रतिष्ठित लेखक एरावतम महादेवन ने लिखा था कि, ‘अगर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में मतभेद हैं तो उस स्थान की दोबारा खुदाई से इसे हल किया जा सकता है, मगर किसी ऐतिहासिक गलती को सुलझाने के लिए किसी ऐतिहासिक दस्तावेज को ध्वस्त करना गलत है।’ बाबरी विध्वंस के बाद मिले अवशेषों में मुहम्मद ने ‘विष्णुहरि’ दीवार सबसे अहम बताई। इस पर 11वीं-12वीं शताब्दी में नागरीलिपि-संस्कृत में लिखा था कि यह मंदिर विष्णु (भगवान श्रीराम विष्णु के ही अवतार हैं) को समर्पित है जिन्होंने बाली और दस सिरों वाले रावण का वध किया था।

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वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के निर्देशानुसार हुई खुदाई में भी 50 से भी ज्यादा मंदिर स्तंभ मिले। इनमें मंदिर के शीर्ष पर पाई जाने वाली अमालका और मगरप्रणाली खासे अहम थे। कुल मिलाकर वहां से 263 प्रमाण हासिल हुए। उनके आधार पर एएसआइ ने निष्कर्ष निकाला कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भी इस पर मुहर लगाई। मुहम्मद यह भी लिखते हैं कि खुदाई के दौरान बहुत सतर्कता बरती गई ताकि पक्षपात के आरोप न लगें। खुदाई दल में शामिल 131 कर्मचारियों में 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की ओर से इतिहासकार सूरज भान, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक मजिस्टे्रट भी दल का हिस्सा थे।

केके मुहम्मद के मुताबिक, उच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी वामपंथी इतिहासकार अपने दुष्प्रचार में लगे रहे। एक साक्षात्कार में मुहम्मद ने मुझे बताया था, ‘मुझे लगता है कि मुसलमान बाबरी मामले का हल चाहते थे, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने उन्हें बरगलाया। इन इतिहासकारों को पुरातात्विक साक्ष्योंं की जरा भी जानकारी नहीं थी। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सामने गलत जानकारी पेश की। माक्सवादी इतिहासकारों और कुछ अन्य बुद्धिजीवियों की जुगलबंदी मुसलमानों को ऐसी अंधेरी सुरंग में ले गई जहां से वापसी मुमकिन न थी। वह ऐतिहासिक भूल थी।’ अपनी किताब में मुहम्मद ने यह भी लिखा है, ‘हिंदुओं के लिए अयोध्या उतना ही महत्वपूर्ण है जितना मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना। मुसलमान इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि मक्का-मदीना गैर-मुसलमानों के नियंत्रण में चले जाएं। हिंदू बहुल देश होने के बावजूद अयोध्या में ऐतिहासिक मंदिर गैर-हिंदुओं के कब्जे में चला गया जो किसी भी सामान्य हिंदू को बहुत पीड़ा देता होगा।’ मुसलमानों को हिंदुओं की भावनाएं समझनी चाहिए।

अगर हिंदू यह मानते हैं कि बाबरी मस्जिद राम का जन्म-स्थान है तो मुस्लिम नजरिये से उस जगह से मोहम्मद नबी का ताल्लुक नहीं हो सकता। मुहम्मद ने अपनी आत्मकथा में कई खुलासे किए और कहा कि वामपंथी इतिहासकारों ने तथ्यों को विरुपित किया। वह आज भी इस रुख पर अडिग हैं कि बाबरी मस्जिद ढांचे के नीचे राम मंदिर मौजूद था और इसे साबित करने के लिए उनके पास तथ्यों की भी कमी नहीं है।

साभार: जागरण.कॉम

Courtesy Desk April 6, 2017
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