– के. पी. मलिक- एक तरफ सरकार देशवासियों से पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील कर रही है, सोना खरीदने से मना कर रही है, चीनी एक्सपोर्ट पर रोक लगा रही है और विदेशी मुद्रा बचाने की बात कर रही है। दूसरी तरफ भारत अरबों डॉलर का कच्चा तेल आयात करके उसे रिफाइन कर पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में विदेश भेज रहा है।
सवाल यह है कि जब डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है और रुपये पर दबाव बढ़ रहा है, तब क्या यह नीति सच में देशहित में है या कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों के हित में? आम आदमी महंगे पेट्रोल-डीजल की मार झेले, लेकिन बड़ी रिफाइनरियों को Windfall Tax और Export Duty में राहत मिलती रहे, यह विरोधाभास आखिर क्यों?
अगर चीनी जैसी जरूरी वस्तु के निर्यात पर सरकार पूरी तरह रोक लगा सकती है, तो पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर कम से कम अस्थायी नियंत्रण क्यों नहीं लगाया जाता ताकि घरेलू कीमतों और विदेशी मुद्रा दोनों पर दबाव कम हो?
भारत आज खुद को “Global Refining Hub” बनाने की रणनीति पर चल रहा है, लेकिन इस मॉडल की कीमत कौन चुका रहा है? रूस और ईरान से सस्ता तेल खरीदने के लिए भी भारत को “US waiver” जैसी भाषा इस्तेमाल करनी पड़ती है, जो ऊर्जा नीति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है।
क्या देश की Energy Security का मतलब सिर्फ बड़े निर्यात आंकड़े और कॉरपोरेट मुनाफा है, या फिर सस्ती ऊर्जा, मजबूत रुपया और आम नागरिक को राहत देना भी इसका हिस्सा होना चाहिए? जब किसान, मध्यम वर्ग और छोटे उद्योग महंगाई से जूझ रहे हों, तब यह पूछना स्वाभाविक है कि विदेशी मुद्रा बचाने की असली जिम्मेदारी सिर्फ जनता पर ही क्यों डाली जा रही है, जबकि तेल निर्यात से जुड़े बड़े आर्थिक फैसलों पर सरकार चुप्पी साधे बैठी है?
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