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India Speak Daily > Blog > SDEO's Story > मैं एक पत्रकार और पत्रकारिता ही मेरा धर्म!
SDEO's Story

मैं एक पत्रकार और पत्रकारिता ही मेरा धर्म!

Ssandeep Deo
By Ssandeep Deo 11 Min Read
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11 Min Read
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#संदीपदेव। मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग Dainik Jagran में हुई है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि एक पत्रकार की ट्रेनिंग दैनिक जागरण से अच्छी किसी अन्य संस्थान में नहीं हो सकती है।

ग्राउंड रिपोर्टिंग, दस्तावेजों, आंकड़ों व ग्राफिक्स का सही विश्लेषण और खबर में दोनों पक्षों का वर्जन रखना यह जागरण की ट्रेनिंग के कारण ही मैं सीख पाया। आरोपी और आरोप लगाने वाला, जनसमस्याएं और उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी, पार्षद, विधायक, सांसद या मंत्री का जब तक वर्जन (उनका वक्तव्य या पक्ष) नहीं होता था, जागरण में खबर रुक जाती थी।

मुझे याद है कि हम दैनिक जागरण के साधारण रिपोर्टर का फोन भी मंत्री सीधे उठाते थे और उस समस्या पर अपनी टीम से जानकारी लेकर अपना वर्जन हमें देते थे। फिर समस्या का समाधान होने पर सूचित करते थे और फिर हम उसका फॉलोअप छापते थे। मेरी एक आदत थी। वर्जन के लिए फोन करने पर जब मंत्री मुझे मिलने के लिए बुलाते थे तो मैं हंसकर कहता था कि सर आप वर्जन दे दीजिए। खबर छप जाएगी तो आकर आपके साथ चाय पीऊंगा। यह मैं स्वयं को दबाव मुक्त रखने के लिए करता था। खबर से पहले मंत्री से मिलना और यदि उस मिलने में वह कोई दबाव डाल दे तो खबर रोकनी पड़े या उसका एंगल बदल जाए, यह न करना पड़े, इसलिए मैं खबर छपने के बाद ही मिलता था, पहले नहीं!

टेलीविजन ने आकर पत्रकारिता को ‘वेश्यावृत्ति’ में बदल दिया। शाम को टीवी स्टूडियो में ‘कोठा’ सजाया जाने लगा। एक तरफा न्यूज और डिबेट आरंभ हुई। एंकर न्यायाधीश बनकर निर्णय देने लगा। खबरें वस्तुनिष्ठ की जगह व्यक्तिनिष्ठ होती चली गई।

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टेलीविजन पत्रकारिता में पत्रकारों को नाम, शोहरत के साथ खूब पैसा भी मिलने लगा, इसलिए पत्रकारों की नयी पीढ़ी उसी ओर आकर्षित हुई और पत्रकारिता चौपट होती चली गयी। कोई रवीश कुमार, पुण्य प्रसून बाजपेई, अभिसार शर्मा कांग्रेस की पत्रकारिता करने लगा तो कोई सुधीर चौधरी, नविका कुमार, अर्णव गोस्वामी भाजपाई पत्रकारिता का झंडा गाड़ने लगा! इस सबमें पत्रकारिता दम तोड़ती चली गई।

परन्तु अखबार फिर भी बचे रहे और कमोबेश आज भी बचे हुए हैं। मेरे घर में न्यूज चैनलों का शोर न हो, इसलिए डिश कनेक्शन नहीं है, परंतु आज भी तीन अखबार आता है। अखबार की क्रेडिबिलिटी या कहिए विश्वसनीयता सरकारी और कारपोरेट विज्ञापन के कारण कम अवश्य हुई है, परंतु पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, जैसा कि टेलीविजन न्यूज की हो चुकी है। यही कारण है कि युद्ध में प्रोपोगेंडा करते टीवी चैनलों पर बंदिश लगाते हुए मोदी सरकार ने अगले आदेश तक टीआरपी ही सस्पेंड कर दिया है। सरकार का यह फैसला सराहनीय है।

मुझे भी www.indiaspeakdaily.in पर अखबार स्टाइल में पुनः खोजी पत्रकारिता करने में आनंद आ रहा है। खबरों को लिखना मुझे सदा से पसंद है, बनिस्पत उसे बोलने के। यूट्यूब जर्नलिज्म मैंने लोगों के दबाव में आरंभ किया था, लेकिन मेरी पसंद सदा से खबरों को लिखने की रही है, जिसमें किसी चीज के छूटने की गुंजाइश बेहद कम रहती है।‌जवाबदेही से भरी वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता के लिए लिखाई बहुत आवश्यक है।

पिछले चार-पांच दिनों में वेब पर तीन बड़ी-बड़ी खोजी खबर लिख चुका हूं और अभी तो मेरे पास पूरा पिटारा पड़ा है खोजी रिपोर्ट लिखने के लिए! ऐसा लगता है कि पुनः अपनी पुरानी दुनिया में लौट गया हूं, जहां अखबार में रिपोर्ट छपने पर सिस्टम बेचैन होकर नोटिस थमाता था! पहले कांग्रेस की सरकार एवं कारपोरेट कंपनियां नोटिस भेजती थीं, क्रिमिनल धमकाने और कोर्ट में घसीटने तक का प्रयास करते थे, आज वही भाजपा की सरकार कर रही है! इससे स्पष्ट है कि मेरी पत्रकारिता नहीं बदली है, भले सरकार बदल गई है!

एक बार मेरी एक रिपोर्ट पर दैनिक जागरण पश्चिम दिल्ली कार्यालय को कांग्रेसी नेता की सह पर अपराधियों ने घेर कर आग लगाने का प्रयास किया था तो एक बार कश्मीर के आतंकवादी यासीन मलिक ने अपने गुर्गे जागरण कार्यालय में भेज दिए थे! बिजनस टाइकून लक्ष्मी निवास मित्तल से लेकर रिलायंस के मुकेश अंबानी के विरुद्ध खबर लिखने पर अपने ही संपादकों का कारण बताओ नोटिस और उनकी बकर..बकर मैं सुन चुका हूं। आज जब पुनः वेब जर्नलिज्म पर उतरा हूं तो सीधे केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी की ओर से सरकारी नोटिस और उनकी बेटी हिमायनी पुरी की ओर से लीगल नोटिस ने मुझ में पुनः वह उमंग भर दिया है और पुराने दिनों की याद ताजा कर दी है!

धन्यवाद माननीय मुझे चुनौती देने के लिए। मुझे चुनौती सदा से पसंद रही है। चुनौती न मिले तो यही लगता है कि रिपोर्ट लिख रहा हूं और सिस्टम पर कोई असर ही नहीं पड़ रहा है, यह तो वही बात हो गई कि ‘जंगल में मोर नाचा, किसी ने नहीं देखा!’

एक पत्रकार का सम्मान तभी है जब सिस्टम उसकी रिपोर्ट का संज्ञान ले, वो हिले, दो-चार-दस नोटिस भेजे, केस करे! यदि किसी पत्रकार के जीवन में यह नहीं है तो समझिए कि उसने पत्रकारिता की बोली लगाकर दौलत कमाई है, शोहरत कमाया है, परंतु पत्रकारिता उसने कभी नहीं की है! इसे भड़ुआगिरी, दलाली, प्रेस्टीट्यूशन या वेश्यावृत्ति- जो चाहे आप कहिए, परंतु पत्रकारिता तो नहीं ही कह सकते हैं!

पत्रकार का मूल कर्म ही ‘एंटी स्टेब्लिशमेंट’ अर्थात् सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने और उस पर नजर रखने का है, क्योंकि उसे लोकतंत्र में जनता का आंख-कान-नाक माना गया है। अब आप यह मत समझ लेना कि रवीश कुमार मोदी सरकार से सवाल पूछ रहा है तो वह पत्रकार है? कांग्रेस के शासन में उसने एक भी सवाल नहीं पूछे थे, इसलिए वह कांग्रेसी पत्रकारिता करता रहा है, वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता नहीं। ऐसा ही हाल आज के ‘दरबारी पत्रकारों’ का है, जो कांग्रेस से तो आज भी सवाल पूछ रहे हैं, नेहरू के जमाने का, लेकिन भाजपाई सत्ता से एक भी सवाल नहीं पूछते? गले में श्वानों की तरह मालिक का पट्टा पहन कर टेलीविजन स्टूडियो और यूट्यूब पर बैठ जाते हैं, दल्लागिरी करने के लिए!

मैं एक रिपोर्ट लिख रहा था और उसके विभिन्न पहलुओं को एआई के जरिए चेक करने की कोशिश कर रहा था। पत्रकार नयी तकनीक से यदि एकाकार न हो तो उसकी पत्रकारिता दम तोड़ देती है। पिछले पोस्ट में ही आपको बताया था कि जब मोबाइल नया-नया आया था तो फिल्ड रिपोर्टर के लिए दैनिक जागरण में मोबाइल रखना अपरिहार्य कर दिया गया था। जब कंप्यूटर आया तो उसने टाइपराइटर का स्थान ले लिया। कागज पर पेन से लिखने की जगह रिपोर्टर खुद कंप्यूटर पर अपनी खबर टाइप करने लगे! मुझे टाइपिंग नहीं आती थी। जागरण ने एक सप्ताह का समय दिया कि मुझे टाइपिंग सीखनी होगी, कोई अन्य आपकी रिपोर्ट टाइप नहीं करेगा। तो वह मैंने एक सप्ताह में सीखी। ऐसे ही एआई का प्रयोग भी आज पत्रकारिता के लिए सीख रहा हूं।

कुरुक्षेत्र गुरुकुलम फाउंडेशन (KGF) में एक अमेरिकी आईटी फॉर्म के प्रमुख गौरव जी AI पर कक्षा ले रहे हैं और दो बैच में करीब 150 बच्चों को उन्होंने एआई सिखा दिया है। मैं और अमरदीप भी उनसे सीख रहे हैं। मैं सीख कर अपनी पत्रकारिता में उसका उपयोग कर रहा हूं। मैंने अपने एआई एजेंट को एक पत्रकार के नजरिए का प्रशिक्षण दिया है ताकि वह विश्लेषणात्मक, आलोचनात्मक और खोजपरक दृष्टिकोण विकसित करे। मेरी आवाज और मेरी शक्ल में वह आपको मेरी ही लिखी खबर या स्क्रिप्ट पढ़कर सुनाता है, यह तो आपने देख ही लिया है।

नीचे का स्क्रीनशॉट देखिए एआई कह रहा है कि एक पत्रकार के रूप में आपने उस बिंदुओं को जोड़ा है, जिसे दुनिया अलग-अलग खानों में रखती है। एआई एजेंट भी चकरा जाता है, और कई बार मुझे कहता है कि इससे आगे नहीं बढ़ सकता, आखिर मैं हूं तो एक मशीनी टूल ही न! 😀

तो आज भी सीखने की प्रक्रिया चल रही है। यही पत्रकारिता है। पत्रकारिता एक धर्म है, जिसका आधार सत्य और वस्तुनिष्ठता है। यदि यह दोनों नहीं है तो वह केवल प्रोपोगेंडा है, पत्रकारिता नहीं! मेरी पत्रकारिता का तो ध्येय वाक्य ही है- ‘सत्यं ब्रूयात्’ और No left, No Right, Only Sanatani Voice.

एक लेखक के रूप में पहचान स्थापित करने के बावजूद आज भी मैं अपनी पहचान एक पत्रकार के रूप में ही देता हूं। पत्रकारिता मुझे हमेशा जीवित होने की अनुभूति कराती है। मरते दम तक मैं एक पत्रकार के रूप में ही जाना जाऊं, यही मेरी चाह है।

मृत्यु से चंद मिनट पहले मेरे पिताजी ने फोन पर मुझे कहा था, ‘पत्रकार हो, सत्य के लिए लड़ते रहो!’ तब भी मोरारी बापू की ओर से मुझे नोटिस भेजा गया था और फोन करके मां समझा रही थी कि ‘क्यों सबके बारे में खुलासा करते हो और अपना दुश्मन बढ़ाते जाते हो?’ तब पिताजी ने कहा था, ‘एक पत्रकार खुलासा नहीं करेगा तो क्या करेगा?’ पिताजी की मेरे लिए कही गई यह आखिरी लाईन मैं कैसे भूल सकता हूं? धन्यवाद

Ssandeep Deo March 17, 2026
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Ssandeep Deo
Posted by Ssandeep Deo
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
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