Åvanìsh Kumar : हम अपने इतिहास को लेकर कितना सजग हैं इसे इस बात से समझिए। चाणक्य के जन्मस्थान को लेकर अलग अलग दावे किए जाते हैं। पंजाब, सिंध, लाहौर, कराची, खैबर पख्तूनख्वा जैसे नाम है। जबकि वास्तविक यह है कि चाणक्य का जन्म बिहार में पटना के पास एक गांव चनाकी में हुआ था। वह टीला आज भी है जहाँ चाणक्य का परिवार रहा करता था। दुखद बात यह है कि हम आज भी इस सत्य को स्थापित नहीं कर सके। उन्हें फर्जी ही बता दिया। यही हाल आर्यभट्ट को लेकर है। उन्हें भी अलग अलग स्थानों का बताया जाता है, पंजाब, सिंध, लाहौर का। जबकि वास्तविक यह है कि चाणक्य के चनाकी गांव से 7 किमी दूर तारापुर एक गांव है जहाँ आर्यभट्ट का जन्म हुआ। फिर बौधायन को लेकर भी यही है। बौधायन कौन तो पायथागोरस थ्योरम पढ़ते हैं उनके जनक यही हैं। इन्हीं की रचना को चोरी कर ग्रीक पाइथागोरस ने अपनी रचना बता दी और अपने नाम से स्थापित कर दिया।
बौधायन को लेकर कहा जाता कि वे भी पाकिस्तान पंजाब, काबुल, गांधार और कही कही उन्हें दक्षिण भारत का बताया जाता है। जबकि बौधायन का जन्म बिहार के सीतामढ़ी जिला के बनगांव नामक गांव में हुआ है। जहाँ बौधायन ने अपने ग्रन्थों की रचना की वहाँ पहले एक बरगद का पेड़ था जो अब नहीं है। किंतु वह स्थान अभी भी है। गांव में बौधायन मंदिर भी है। लेकिन हम इस सत्य को स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। वो तो छोड़िए, भारत सरकार सीता जन्मभूमि को नेपाल का मानती रही है। अबतक मानती रही है। खुद बिहार के कुछ हिस्सों में भी यही मान्यता है और देश के लोगों में भी है। अभी भूमिपूजन से यह सत्य स्थापित हो सका।
वरना सीता जन्मभूमि मतलब जनकपुर। यही बात विदेह की राजधानी को लेकर भी है। इस बात को तो खैर बहुत कम ही जानते होंगे कि विदेह की राजधानी त्रेता में जनकपुर नहीं था। विदेह की वास्तविक राजधानी महेला जो आज सीता जन्मभूमि सीतामढ़ी जिला है वह रही है। इसका प्राचीन नाम गिरिजाग्राम है। वह ग्राम जहाँ भगवती गिरजा (पार्वती) विराजमान हैं।
ठीक ऐसे ही वामन अवतार को लेकर है। इसे हरदोई, सीतापुर, केरल में कहा जाता है। जबकि वामन अवतार बिहार के बक्सर में हुआ। प्राचीन नाम सिद्धाश्रम है। ऋषि कश्यप और अदिति का यहाँ आश्रम था। फिर नृसिंह अवतार को लेकर भी है। इसे भी मध्यप्रदेश के नृसिंहपुर, यूपी के इटावा, तेलांगना के मल्लूर और पाकिस्तान के मुल्तान में कहा जाता है। जबकि नृसिंह अवतार बिहार के मिथिला क्षेत्र के पूर्णिया जिला में बनमनखी में सिकलीगढ़ धरहरा गांव में हुआ है। जिस स्थान में नरसिंह भगवान का अवतार स्थल है, वहां हिरन नामक नदी बहती है। इस नदी के तट पर भीमेश्वर मन्दिर है।
नदी में स्नान कर हिरणकश्यप इसी मंदिर में पूजा करता था। नरसिंह के अवतार से जुड़ा खम्भा, जिसे माणिक्य स्तंभ कहा जाता है। वो आज भी यहां सिकलीगढ़ किले में मौजूद है। यही बात मंडन मिश्र को लेकर है। उन्हें मध्यप्रदेश के महेश्वर का होना बताया जाता है जबकि मैथिल ब्राह्मण परिवार में जन्मे मंडन मिश्र सहरसा जिले के महिषी गांव के रहने वाले थे। आज भी वह स्थान है जहां शंकर और मिश्र का शास्त्रार्थ हुआ था।
