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India Speak Daily > Blog > पाॅप कल्चर > मूवी रिव्यू > ‘होटल मुंबई’ हमारे जख्मी सीनों का ऐतिहासिक दस्तावेज है
मूवी रिव्यू

‘होटल मुंबई’ हमारे जख्मी सीनों का ऐतिहासिक दस्तावेज है

Vipul Rege
By Vipul Rege 7 Min Read
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रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘अटैक्स ऑफ़ 26/11‘ उस आतंकी हमले पर उथले पानी में तैरती सी फिल्म थी। स्टेशन पर भारी रक्तपात और ताज होटल के प्रसंग उसमे दिखाए गए थे। लेकिन उस फिल्म को देखते हुए हम कभी ये जान न सके थे कि ताज़ वे बारह घंटे कैसे बीते थे। न ये जान सके कि उस रात आतंकियों से छुपकर भाग रहे निर्दोष लोगों की मनःस्थिति कैसी थी। ऑस्ट्रेलियन फिल्म निर्देशक एंथोनी मारस की फिल्म ‘होटल मुंबई’ देखने के बाद रामगोपाल वर्मा की फिल्म जेहन से विदा हो जाती है क्योंकि ये फिल्म हमें उस खौफनाक रात के इतने करीब पहुंचा देती है कि हम खुद को ताज में कैद एक बंधक के रूप में महसूस करते हैं।

वास्तविकता के धरातल पर फिल्म बनाना कलेजे का काम है। करोड़ों के बजट से बनाई जाने वाली फिल्मों को मसाला डालकर बॉक्स ऑफिस पर ‘सेफ’ किया जाता है लेकिन ऐसा करने से वास्तविक घटनाओं पर बनी फ़िल्में बगैर आत्मा का शरीर होती है। एंथोनी ने मुंबई के आतंकी हमले पर फिल्म बनाते समय एक क्षण भी इसे मसाला बनाने के बारे में नहीं सोचा, इसके लिए हम उनका आभार प्रकट करते हैं। बस तकलीफ ये है कि जिस फिल्म को हर देशभक्त व्यक्ति को देखना चाहिए, उस फिल्म ने बेहद कमज़ोर ओपनिंग ली है। हालांकि माउथ पब्लिसिटी से इसके दर्शक वीकेंड में बढ़ने की उम्मीद दिखाई दे रही है।

कसाब और उसके दस साथी समुद्र के रास्ते 26 नवंबर 2008 की सुबह मुंबई में दाखिल होते हैं। उनकी प्लानिंग परफेक्ट है। वे भारी हथियारों और सूखे मेवों से लैस हैं। पाकिस्तान से उनका आका कह रहा है ‘फोन बंद मत करना। सबसे पहले रेलवे स्टेशन जाकर तबाही बरपा दो, उसके बाद ताज होटल तुम्हारा निशाना होगा’। फिल्म में निर्देशक ने अपना सारा ध्यान ताज में घटे बारह घंटों पर केंद्रित किया है। रेलवे स्टेशन का एक सीक्वेंस दिखाया गया है, जो रोंगटे खड़े कर देता है। हमला होते ही तुरंत टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगती है। पास ही रेस्टॉरेंट में हुई फायरिंग से घबरा कर लोग ताज की ओर भागते हैं और दरवाज़ा खोलने की गुहार लगाते हैं। अंदर जा रहे लोगों में चार आतंकी भी शामिल हो गए हैं। कुछ ही देर में ताज होटल में शाम के समय बजती मधुर धुनों की जगह भयाक्रांत चीखे और हैवी गन फायर ले लेते हैं।

एक दृश्य में अपने बेटी का जन्मदिन मनाने आया विदेशी युगल अपनी छह माह की बेटी और उसकी आया को महंगे सुइट में छोड़कर रेस्टॉरेंट में डिनर करने आया है। वह बीवी से पूछता है ‘कौनसा बर्गर खाओगी, बीफ या चीज़’, बीवी कहती है ‘ये इण्डिया है, यहाँ बीफ नहीं मिलता। यहाँ गाय की पूजा की जाती है। पति वेटर से सॉरी कहता है। एक दृश्य में आतंकियों से लोगों को बचाकर ले जाते समय एक व्यक्ति किसी न्यूज़ चैनल को फोन कर अपनी लोकेशन बताता है। उसके तीस सेकंड के भीतर पाकिस्तान से आका का कॉल आता है और वह बचकर भाग रहे लोगों पर गोलियां बरसाने को कहता है। निर्देशक बताता है कि उन बारह घंटों की रिपोर्टिंग से टीवी चैनलों ने कितनी जानें खतरे में डाल दी थी।

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सम्पूर्ण फिल्म उस रात ताज होटल में फंसे लोगों के अनुभवों पर आधारित है। इसलिए ही ये फिल्म इतनी वास्तविक बन सकी है। यहाँ तक कि बंधक बनाकर रखे गए विदेशियों का घटनाक्रम हूबहू वैसा ही फिल्माया गया है, जैसे वह घटा था। अंतिम समय में वह विदेशी महिला ‘अल्लाह’ का नाम लेने लगती है और कई लोगों की लाशे बिछा चुके उस आतंकी के हाथ रुक जाते हैं। बेहद कम उम्र युवा अपने आका के कहने पर भी उसे नहीं मारता। उस कमरे में बचने वाली वह इकलौती इंसान होती है।

अनुपम खेर ने हेमंत ओबेराय का किरदार निभाया है, जो ताज होटल के पूर्व हेड शेफ थे। ओबेराय की मनःस्थिति को वे जस का तस दर्शाने में सफल रहे हैं। फिल्म में उनकी उपस्थिति दर्शक में ऊर्जा का संचार करती है। हेमंत ओबेराय और एक सिख वेटर अर्जुन सिंह न होते तो मृतकों की संख्या और अधिक होती। अर्जुन सिंह का किरदार देव पटेल ने निभाया है। देव पटेल लगातार अपने अभिनय में सुधार करते जा रहे हैं। अर्मी हैमर, जेसन इसाक्स भी बेहतरीन रहे हैं।

इस फिल्म को मैं ‘डाक्यूड्रामा’ कहना पसंद करुंगा क्योंकि इसे वास्तविक तथ्यों पर बनाया गया है। 26/11 पर बनी ये अब तक की सबसे विश्वसनीय फिल्म है और इसे आर्काइव में रखा जाना चाहिए। एक भारतीय होने के नाते मैं उस रात के बारह घंटों को जीना चाहता था। अब जाकर वह साध पूरी हुई। फिल्म शुरू होते ही आप खुद को बंधक सा महसूस करने लगते हैं। आपको लगता है कि अभी कोई गोली कहीं से आएगी और आपका सिर उड़ाकर चली जाएगी। आपकी मुट्ठियां कुर्सी के हत्थों पर खुद-ब-खुद कस जाती हैं।

टीवी चैनलों के असली फुटेज इस तरह फिक्स किये गए हैं कि वे फिल्म का ही हिस्सा लगते हैं। कोई जर्क दिखाई नहीं देता। ये भी दिखाया गया कि मुंबई पुलिस जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार थी लेकिन आदेश नहीं दिए गए। बारह घंटों तक आतंकी ताज होटल में हैवानियत का नाच करते करते रहे। सुरक्षा बलों की देरी का भी हवाला दिया गया है, जो सचमुच केंद्रीय नेतृत्व पर एक शर्मनाक धब्बा है।

यही सिनेमा का जादू है। जब जादू एक अच्छे मकसद के लिए किया गया हो तो और भी सुहाता है। फिल्म न कमज़ोर दिल वालों के लिए हैं, न बच्चों के लिए। गर्भवती महिलाएं न देखे तो ही अच्छा। खून से लथपथ दृश्य उन्हें देखना भी नहीं चाहिए। बाकी बचे ये फिल्म अवश्य देखें। जब आप देखकर बाहर आएँगे तो समझेंगे कि ये फिल्म क्यों देखनी चाहिए।

Vipul Rege November 30, 2019
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Posted by Vipul Rege
पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।
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