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India Speak Daily > Blog > इतिहास > अनोखा इतिहास > गोवा का इतिहास और उसका मुक्ति संघर्ष!
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गोवा का इतिहास और उसका मुक्ति संघर्ष!

ISD News Network
Last updated: 2025/01/05 at 12:32 PM
By ISD News Network 55 Views 28 Min Read
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हेमंत शर्मा। सितार सा बजता है समुद्र. दिल्ली में कड़ाके की ठंड. जाते हुए साल की तरह सब अपने खोल में सिमटते. आबोहवा में छुट्टी. चौतरफा माहौल आलस्य और आराम का. विलायत से पुरू (मेरे पुत्र) आ गए तो हम भी निकल लिए गोवा. मय परिवार छुट्टियों का आनंद लेने. बनारस, लखनऊ और दिल्ली के कुछ मित्रों के साथ. ताकि कुछ रोज़ समुद्र तट पर ही अड़ी लगे. छुट्टी मनाने में कभी इस ख़ादिम की आस्था नहीं रही. अपनी शादी में भी तिलक, हल्दी, मटमंगरा, सप्तपदी, रिसेप्शन, गंगा पुजैया और हनीमून कुल मिलाकर पूरा पैकेज सात ही दिन का था. संस्थान कोई भी रहा हो,मेरा हर इतवार को भी दफ़्तर जाना होता था.

उम्र के उतरार्द्ध में छुट्टियाँ मनानी शुरू की. बचपन में तो हमने अपनी छुट्टियां ननिहाल जाकर ही बितायी थी. कोई और ठौर होता नहीं था. हमारे बचपन में छुट्टी का मतलब ननिहाल जाना ही था. इसके पीछे अर्थशास्त्र भी था, समाजशास्त्र भी. अब समय बदला है. दुनिया छोटी हुई है. रिश्ते-नातों में जाना लोग अब समय खोटी करना समझते हैं. समय के साथ चलने की मजबूरी ही हमें छुट्टी मनाने के लिए देशी विदेशी पर्यटन स्थलों की तरफ खींचती है.

वैसे मैं आला दर्जे का घुमक्कड़ रहा हूँ. घुमक्कड़ी वृति का अपना ही सुख है. घुमक्कड़ी का अपना शास्त्र है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय जी और विद्या निवास मिश्र ने इसके ज़रिए साहित्य को समृद्ध किया. घुमक्कड़ी में निकलिए ढूँढने कुछ, मिल जाता है कुछ और. ज्ञान और अनुभव का बक्सा भी भरता है सो अलग. प्रकृति की विविधता मन को तरोताजा करती है, यात्रा के दौरान हुए तजुर्बे, बुद्धि को मांजते हैं. जीवन में जान लेना ही अंतिम सत्य नहीं है. उसे देखे, भोगे और गुने बगैर ज्ञान पकता नहीं है. गोवा में प्रकृति की खूबसूरती ललचाती है, उसका बिंदास समाज मन मोहता है. यहां किसी को किसी से मतलब नहीं. महाभारत कालीन खेल जुआ, यहॉं का धर्म निरपेक्ष मौसम. मतलब न ठंडा न गरम, समुद्र का रहस्य, पानी की जिन्दगी का सच और प्रकृति के मायावी चरित्र की अनेक अजानी जानकारियां हमें अपनी ओर खींचती हैं.

समुद्र तट पर आते ही जीवन की निस्सारता का बोध होता है. हमें अपनी क्षुद्रता और हैसियत का एहसास होता है. समुद्र की विशालता हमारे अस्तित्व को आईना दिखलाती है. मित्र कवि आलोक कहते हैं- ‘जरा पाने की ज़िद में बहुत कुछ छूट जाता है. नदी का साथ देता हूँ समंदर रूठ जाता है.’ गोवा का समुद्र उथला, शांत और शीशे की तरह पारदर्शी है. हरे पेड़, सफेद रेत और नीले समुद्र से प्रकृति जो कोलाज बनाती है उसे ही गोवा कहते हैं. जहॉं समुद्र और आकाश मिलकर ही मनुष्य के लिए एक एकांत रचते हैं. अरब सागर की उत्ताल तरंगें सफेद रेत से टकराकर जो निनाद पैदा करती हैं, वह सितार सा बजता है. ’नदी के द्वीप’ से ज्यादा आनंद आता है समुद्र के इस द्वीप में. आजकल तो ‘सी ग्रीन’ सिर्फ पेंटिग में दिखता है. यहां सफेद रेत वाले ‘बीच’ समुद्र में घुलते नजर आते हैं. जहां किनारा समंदर में उतरता है वहां पानी रंगहीन नजर आता है. थोड़ा आगे जाने पर हरा. थोड़ी और दूर पर हल्का नीला और बीच समुंदर में गहरा नीला. समुंदर की गहराई बढ़ने के साथ ही उसका रंग भी बदलता नजर आता है.वैसे ही जैसे मनुष्य की गहराई के साथ उसका स्वभाव. क्षितिज तक अनंत हरा समुद्र है. पक्षियों का कलरव, लहरों का संगीत और पेड़ों की हरियाली से ऐसा वातावरण बनता है मानो भीतर बरसों से दबे उल्लास का स्त्रोत यकायक फूट पड़ा हो.

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धरती का 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्र है.इसलिए समुद्र सत्य है बाक़ी मिथ्या. सूर्योदय से सूर्यास्त तक समुद्र का हर दृश्य एक दिव्य सा आभास बनकर मन में घर कर जाता है. लगता है- “दे गया इक दिव्य-सा आभास कोई, पानियों पर लिख गया इतिहास कोई”. अपना जीवन मित्रों के बिना अधूरा रहता है. तो इस यात्रा में चार-पांच मित्र साथ थे. इनमें एक पंडित नवीन तिवारी भी हैं. जीवन में मैंने उनसे भी बहुत कुछ सीखा है. शराफ़त, शालीनता और आतिथ्य सत्कार आप उनसे सीख सकते है. बिना बात मुक़दमेबाजी के गुर भी आपको वे सिखा सकते हैं. मैं उन्हें मुकदमेबाजी का पितामह कहता हूँ. अगर मुकदमे के लिए कोई प्राणी सामने न दिखे, तो वे हवा पर भी मुकदमा कर सकते है. किसी भी सवाल पर आप अगर आम कहेंगे तो वह इमली ज़रूर कहेंगे.यही अपनी मित्रता का आधार है.

भारतीय वांग्मय में जिन सोलह कलाओं का ज़िक्र आता है उसमें नवीन जी माहिर हैं. नवीन जी के पास लकड़ी और लड़की की ग़ज़ब की पहचान है. एक उनका कारोबार है और दूसरे में उनका दिल रमता है. बस इसी की पहचान में जीवन गुज़र गया. बात इससे आगे कभी बढ़ी नही. इसी नाकाम इश्क़ के चलते नवीन जी को समाज सेवा की बीमारी लग गयी. किसी ने उनसे कहा कि अगर समाज सेवा में आगे बढ़ना है तो ज़मीन से जुड़ना पड़ेगा. तभी से वे जहॉं कहीं भी ख़ाली ज़मीन देखते हैं, मुक़दमा कर देते हैं. राजनीति में ज़मीन से जुड़ने का नारा डॉ लोहिया का था. नवीन जी समाजवादी हैं. आचार्य नरेन्द्र देव के अनुयायी हैं. लोहिया जी आचार्य नरेंद्रदेव को लकवामार समाजवादी कहा करते थे. उनका भरोसा बिनोवा में भी है. पर भूदान में नहीं. मैं उन्हें अपना अगुरू मानता हूँ. अगुरू यानी जिसने आपको पढ़ाया नहीं पर आपने उनसे जीवन में सीखा बहुत.

नवीन जी को घूमने के लिए राज़ी करना मुश्किल काम है. वे घूमने के नाम पर नखरे बहुत करते हैं. जैसे-तैसे इस दफ़ा वे हमारे साथ हैं. प्रकृति, समाज, संस्कृति, संगीत, सूरज, चॉंद, अंतरिक्ष, राजनीति, उर्दू अदब और थर्ड जेंडर सब पर हमारा उनसे विमर्श जारी रहा. उन्हें इस बात गर्व था कि गोवा इस देश को समाजवादियों की देन है. जब देश आजाद हुआ तो गोवा इसका हिस्सा नहीं था. गणतंत्र दिवस पर हमारा संविधान पूरे देश पर लागू हो गया पर गोवा पर नहीं. गोवा 1961 तक पुर्तगाल का एक उपनिवेश था. पुर्तगालियों ने गोवा पर लगभग 450 सालों तक शासन किया. दिसंबर 1961 में गोवा भारत का हिस्सा बना.

इस धरती पर सबसे पहले अपना कब्जा जमाने वाले युरोपीय पुर्तगाल के थे. अंग्रेज तो उनके आने के दो सौ साल बाद भारत आए. यानी पुर्तगाली इस जमीन पर कब्जा जमाने वाले सबसे पहले विदेशी थे पर सबसे बाद में देश छोड़कर गए. पुर्तगाली 450 साल पहले व्यापार करने भारत आए थे. 16 वीं शताब्दी में जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह पर मुगल बादशाह हुमायूं ने हमला किया तो उसने पुर्तगालियों की मदद ली. पुर्तगालियों ने यहां एक किला बनाया और खंबात की खाड़ी से होकर गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलना शुरु कर दिया. उन्होंने गोवा, दमन दीव, दादरा नागर हवेली तक अपना राज्य फैला दिया.

आजादी की लड़ाई में इस इलाक़े ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. विश्वनाथ लवांडे, नारायण हरि नायक, दत्तत्रेय देशपांडे, प्रभाकर सिगरी सरीखे क्रांतिकारियों ने यहॉं थानों और बैंकों पर हमले किए. उन्हें गिरफ्तार कर 14 साल के लिए पुर्तगाल की जेल में कैद किया गया. आजादी मिलने के बाद नेहरु ने पुर्तगाल से इस इलाके को मुक्त करने को कहा पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुए. बाद में 1953 में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल अपनी इस मांग को लेकर लिस्बन भी गया पर वहां की सरकार कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थी. अंततः दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध समाप्त हो गए. इसके बाद 1954-55 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने गोवा में सत्याग्रह आंदोलन शुरु किया. इसके लिए सर्वदलीय आल गोवा पॉलीटिकल पार्टी गठित हो गई पर भारत सरकार ने उनके आंदोलन को समर्थन नहीं दिया. जब 18 जून 1954 को इन सत्याग्रहियों ने गोवा में भारतीय ध्वज लहराया तो उन्हें गिरफ्तार कर पुर्तगाल भेज दिया गया. अगले ही महीने 28 जुलाई को सत्याग्रहियों ने दादरा नगर हवेली पर हमला कर 2 अगस्त को उस पर कब्जा कर लिया पर भारत सरकार ने उनकी भी कोई मदद नहीं की और न ही उसे देश का हिस्सा घोषित किया.

तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने तो यहां तक कह दिया कि वो गोवा की मुक्ति में हिंसा का रास्ता अपनाने के खिलाफ हैं. नेहरु द्वारा इस आंदोलन की अनदेखी किए जाने की असली वजह उन पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जानएफ कैनेडी का दबाव था. इसलिए वे लगातार यह बयान देते रहे कि हम हिंसा के खिलाफ है. बल पूर्वक आजादी नहीं लेना चाहते हैं. नेहरु के इस कदम की भारत में ही नहीं दुनिया भर में आलोचना हुई. सितंबर 1961 में बेलग्रेड में हुए अफ्रो एशिया सम्मेलन में अनेक देशों ने यह कहा कि भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा है. इसका असर अफ्रीका पर भी पड़ रहा है. मालूम हो कि उस समय अफ्रीका के अनेक देशों में पुर्तगाली उपनिवेश थे. जब नाटो का गठन हुआ तो पुर्तगाल उसमें शामिल हो गया. इसमें शामिल देशों के बीच एक संधि थी कि अगर किसी सदस्य देश के उपनिवेश पर भी हमला होता है तो वह उस देश पर हमला माना जाएगा और सारे देश मिलकर उसकी मदद करेंगे.

फिर गोवा की मुक्ति में आगे आए डॉ राममनोहर लोहिया. गोवा की मुक्ति डॉ लोहिया का भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा अवदान है. जो नेहरू नहीं कर पाए वह लोहिया ने कर दिया. दरअसल लोहिया आधुनिक दुनिया से भी उतने ही जुड़े थे जितने भारतीय देशीपन से. वे अमेरिका में भी नागरिक अधिकारों के लिए गिरफ़्तारी देते, गोवा की आज़ादी में भी, तिब्बत की मुक्ति का आन्दोलन भी छेड़ते और नेपाल में लोकतंत्र के लिए भी उनकी लड़ाई जारी रहती. वे पख्तूनों की समस्या पर अफ़ग़ानिस्तान सरकार के ख़िलाफ़ भी क्रान्ति का बिगुल बजाते. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अगस्त क्रान्ति की निर्णायक लड़ाई के डॉ साहब हीरो थे. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ 1942 की अगस्त में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. पॉंच अगस्त को आन्दोलन के लिए लोहिया, अरुणा आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी, एसएम जोशी, साने गुरू, सादिक़ अली आदि की एक संचालन कमेटी बनी. लोहिया का कहना था कि समूचे अंग्रेजी राजतंत्र को ठप्प कर दिया जाय. मानव हत्या और मानव हानि के अलावा आन्दोलन के सारे संभव रास्ते आजमाए जाएं. तार यंत्र को तोड़ा जाय, सरकारी दफ़्तरों पर क़ब्ज़ा हो. पुलिस के लिए हथियार लाने वाली गाड़ियां बारूद से उड़ाई जाएं. यह सब भूमिगत आन्दोलन की रणनीति थी. 9 अगस्त को ग्वालिया टैंक मैदान बम्बई में क्रान्ति का ऐलान हुआ और अरुणा आसफ़ अली ने तिरंगा फहराया. पुलिस बल का बेरहम इस्तेमाल हुआ. बम्बई जलने लगी.

लोहिया जी भूमिगत हुए. 22 महीने की फ़रारी के बाद वे 22 मई 44 को मुम्बई से गिरफ़्तार हुए. उन्हें लाहौर जेल भेजा गया. लाहौर क़िले में क़ैद डॉक्टर साहब को गम्भीर यातना दी गयी. पूरे समय वे हथकड़ी में थे. हथकड़ी वज़नी थी. क़ैद इतनी सख्त थी कि लोहिया को छ महीने तक यह पता ही नहीं चला कि उसी जेल में जेपी भी बन्द हैं. मुंबई के मशहूर वकील पारडीवाला उनकी ज़मानत के लिए लाहौर गए. वे कोर्ट में हैबियस कार्पेस डालने ही वाले थे कि पारडीवाला को ही गिरफ़्तार कर लिया गया. बम्बई से लोहिया जी की महिला मित्र पूर्णिमा बैनर्जी लाहौर पहुँचीं. उन्होंने स्थानीय बड़े वकील जीवनलाल कपूर को खड़ा किया. अंग्रेज सरकार ने फ़ौरन लोहिया को ‘सिक्योरिटी प्रिजनर’ बना दिया ताकि उन पर ‘हैबियस कारपस’ लागू ही न हो. लोहिया का मुक़दमा ख़ारिज हो गया.

नाराज़ लोहिया ने सीधे लेबर पार्टी के अध्यक्ष प्रो हेराल्ड लास्की को चिट्ठी लिख दी. चिट्ठी की भाषा ऐसी थी कि अबे ओ फलांवाले, यही तुम्हारा लोकतंत्र है? प्रो लास्की हमारे प्रोफ़ेसरों की तरह नहीं थे. दुनिया में उनकी साख थी. हैरोल्ड लॉस्की ब्रिटेन के राजनीतिक सिद्धान्तकार, अर्थशास्त्री और लेखक थे. वे 1945-1946 में ब्रिटेन की लेबर पार्टी के अध्यक्ष रहे .1926 से 1950 तक वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर रहे. लोकतंत्र के सिद्धान्तकार के नाते दुनिया में उनका दबदबा था. लोहिया की जेल से लास्की को लिखी चिट्ठी ऐतिहासिक दस्तावेज है.

लोहिया की इस चिट्ठी के बाद ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव बना. फ़ौरन उनका तबादला आगरा जेल किया गया. जेपी और लोहिया आगरा आ गए. आगरा में रहते हुए पिता हीरालाल लोहिया की कलकत्ते से मौत की खबर आई. सरकार ने लोहिया के पेरोल की पेशकश की. लोहिया ने कहा जब तक दूसरे बेक़सूर राजनैतिक क़ैदी नहीं छूटते मेरे लिए पेरोल लेना अनैतिक होगा. मामला बढ़ा, प्रो लास्की के दख़ल से ब्रिटिश संसदों का एक दल आया. इस दल ने आगरा जेल जाकर लोहिया और जय प्रकाश से मुलाक़ात की. तब जाकर अप्रैल 47 में लोहिया जेल से छूटे.

लोहिया अभी छूटे ही थे और कलकत्ता जाकर पिता की श्रद्धांजलि सभा में शामिल ही हुए थे की गोवा के एक समाजवादी कलाकार ने डॉ साहब से मुलाकात कर उन्हें गोवा आकर आराम करने की सलाह दी. लोहिया जुलियो मैनेजिंस के बुलावे पर गोवा पंहुचे. गोवा पर पुर्तगाली शासन था. लोग लोहिया को देखने सुनने आए. लोहिया ने 12 जून को वहॉं गोवा मुक्ति का आन्दोलन छेड़ दिया. लोहिया वहॉं गिरफ़्तार हो गए. बाद में समाजवादियों ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया. गोवा दिसम्बर 61 में आज़ाद हुआ. आज भी गोवा में जो लोक गीत गाए जाते हैं, उसमें लोहिया का ज़िक्र होता है. उन गीतों में गाया जाता है- ‘माहिली माँझी ओढ़ी महिले माह फूल भक्ति ने अर्पिन लोहिया ना.’

दरअसल लोग अपने संघर्ष के लिए लोहिया को न्योता देते थे. और लोहिया मानो इन्हीं संघर्षों के लिए तैयार बैठे रहते थे. अंततः भारत ने 16 दिसंबर को गोवा को आजाद कराने की कार्रवाई शुरु की. जिसमें जल, थल, वायु सेना ने हिस्सा लिया. आपरेशन विक्रम नाम की इस सैन्य कार्रवाई का नेतृत्व जनरल चौधरी कर रहे थे. उस दिन सुबह 6.30 बजे वायुसेना ने बंबोलिया स्थित रेडियो स्टेशन व डबोलिन हवाई अड्डे पर बम बरसाए. नेवी ने मारमगाओ बंदरगाह पर अपने जहाज तैनात किए. सेना ने उत्तर से हमला किया. पुर्तगालियों ने कई अहम पुल उड़ा दिए. इस वजह रात सेना शहर में प्रवेश नहीं कर सकी. अंततः 40 घंटों तक चली इस जंग के बाद 18 दिसंबर की शाम 6 बजे पुर्तगालियों ने गोवा सचिवालय पर सफेद झंडा लहरा कर समर्पण कर दिया. इस संघर्ष में कई पुर्तगाली व भारतीय सैनिक मारे गए.

गोवा अभियान में हवाई कार्रवाई की जिम्मेदारी एयर वाइस मार्शल एरलिक पिंटो के पास थी. भारतीय सेना ने 2 दिसंबर को ‘गोवा मुक्ति’ अभियान शुरू कर दिया. वायु सेना ने 8 और 9 दिसंबर को पुर्तगालियों के ठिकाने पर अचूक बमबारी की. भारतीय थल सेना और वायु सेना के हमलों से पुर्तगाली तिलमिला गए. 19 दिसंबर, 1961 को तत्कालीन पुर्तगाली गवर्नर मैन्यू वासलोडे सिल्वा ने भारत के सामने समर्पण समझौते पर दस्तखत कर दिए. भारत ने गोवा और दमन दीव को मुक्त करा लिया और वहां से पुर्तगाल के 451 साल पुराने औपनिवेशी शासन को खत्म कर दिया. पुर्तगालियों को एक तरफ़ तो भारत के हमले का सामना करना पड़ रहा था. वहीं दूसरी ओर उन्हें गोवा के लोगों का रोष भी झेलना पड़ रहा था. उन पर दोहरी मार थी. अगले साल 1962 में 12 वे संविधान संशोधन के जरिए यह हिस्सा भारत का अंग बना. गोवा दमन दीव ने महाराष्ट्र में शामिल होने से इंकार कर दिया. उन्हें केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया. इसके लिए 16 जनवरी 1967 को जनमत संग्रह भी करवाया गया. फिर भी पुर्तगाल 1974 तक इसे अपना हिस्सा मानता रहा. अंततः 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य की हैसियत हासिल हुई.

गोवा का इतिहास रोमांचक है. पुर्तगाली इतिहासकार फोंसेका जोस निकोला डू (FONSECA, José Nicolau da.1837–1886) के मुताबिक गोवा की टेक्टोनिक उत्पत्ति के प्रमाण 10,000 ईसा पूर्व के हैं. इसके अलावा, गोवा में मानव के रहने के प्रमाण कम से कम निचले पुरापाषाण युग (Lower Paleolithic Age) के हैं, जिसका संकेत मंडोवी-ज़ुआरी बेसिन में एच्यूलियन बाइफेसकी पुरातात्विक खोजों से मिलता है. गोवा के प्रागैतिहासिक अध्ययन के विशेषज्ञ अनंत रामकृष्ण धूमे ने अपनी किताब ‘द कल्चर हिस्ट्री ऑफ़ गोवा, फ्रॉम 10,000 ईसा पूर्व- 1352 ईस्वी’ में लिखा है कि उन्हें समुद्री शंख के जीवाश्म तथा दो विशाल बेसाल्टिक प्राकृतिक स्तंभों के रूप में पुरातात्विक साक्ष्य मिले, जो इस तर्क का समर्थन करते हैं कि गोवा का विकास समुद्र तल से हुआ है.

गोवा की किंवदंती परशुराम से भी जुड़ती है…पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान विष्णु के छठे अवतार ऋषि परशुराम ने गोवा का निर्माण किया ऐसा माना जाता है. उन्होंने सह्याद्रि पर्वत से अरब सागर में बाण चलाया था, परशुराम ने तीर चलाकर गुजरात से केरल तक समुद्र को पीछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया. और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम वंदनीय हैं. यह भी कहा जाता है कि परशुराम द्वारा किया गया अश्वमेध यज्ञ उत्तरी गोवा के हरमल गाँव में हुआ था. यहॉं समुद्र तट पर परशुराम की विशाल प्रतिमा लगी है.

कौटिल्य भी गोवा से मुख़ातिब हैं. उनका कहना है कि यह क्षेत्र आदिवासी निगम था जो कृषि और शस्त्र दोनों में प्रवीण था. महाभारत के भीष्मपर्व में दी गयी राज्यों की सूची के अनुसार, पांडु राष्ट्र, गोप राष्ट्र, मल्ल राष्ट्र और अश्मक ने मिलकर आधुनिक महाराष्ट्र का गठन किया. गोवा शब्द गोपराष्ट्र के क्षेत्र से लिया गया है. गोपराष्ट्र का मतलब यहॉं गाय चराने वालों के देश के तौर पर है. संस्कृत के कुछ कई पुराने स्रोतों में गोवा को गोपकपुरी और गोपकपट्टन कहा गया है जिनका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अलावा हरिवंशम और स्कंदपुराण में भी मिलता है. गोवा को बाद में कहीं-कहीं गोअंचल भी कहा गया है. टॉलेमी ने गोवा का उल्लेख वर्ष 200 के आस-पास गोउबा के रूप में किया. जिस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोवा रखा वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोआ-वेल्हा है. बाद में इस पूरे क्षेत्र को गोवा कहा गया. जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा किया.

गोवा से जुड़े कुछ और संदर्भ भी हैं. चालुक्य युग के शिलालेखों में गोपराष्ट्र में बालेग्राम गाँव का उल्लेख मिलता है. सह्याद्रि खंड नामक पौराणिक किताब में गोवा को गोमांतक कहा गया है. ऋषि वराह मिहिर की बृहत्संहिता में गोवा को गोमंत कहा गया है. कदंब शासक विष्णुचित्त के एक शिलालेख में गोपकपट्टन नामक बंदरगाह का ज़िक्र है. पहली सदी के शुरुआत में गोवा पर कोल्हापुर के सातवाहन वंश के शासकों का अधिकार स्थापित हुआ. और फिर बादामी के चालुक्य शासकों ने इस पर वर्ष 580 से 750 तक राज किया. इसके बाद के वर्षों में गोवा पर कई अलग अलग शासकों ने राज किया.

वर्ष 1312 में गोवा पहली बार दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ लेकिन उन्हें विजयनगर के शासक हरिहर प्रथम द्वार ने वहां से खदेड़ दिया. अगले सौ बरस तक विजयनगर के शासकों ने यहां शासन किया और 1469 में गुलबर्ग के बहामी सुल्तान द्वारा फिर से दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बनाया. बहामी शासकों के पतन के बाद बीजापुर के आदिल शाह का गोवा पर क़ब्ज़ा हुआ जिसने गोआ-वेल्हा को अपनी दूसरी राजधानी बनाया.

1498 में, पुर्तगाली खोजकर्ता वास्को डि गामा समुद्री मार्ग से भारत पहुंचने वाला पहला यूरोपीय व्यक्ति बना, जो कालीकट (अब कोझिकोड) में उतरा. वास्को डि गामा की यात्रा ने गोवा के ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित किया. भारत आकर वास्को डि गामा ने न केवल व्यापार के लिए नए रास्ते खोले, बल्कि इस क्षेत्र में एक मजबूत उपस्थिति के लिए पुर्तगालियों की तीव्र इच्छा को भी प्रकट किया. पुर्तगालियों को गोवा से दूर रखने के लिए यूसूफ आदिल खां ने गोवा पर हमला किया. शुरू में उन्होंने पुर्तगाली सेना को रोक तो दिया लेकिन बाद में अल्बुकर्क ज्यादा बड़ी सेना के साथ लौटे और एक दुःसाहसी प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर उन्होंने शहर पर फिर से कब्जा कर लिया.

16वीं शताब्दी के दौरान पुर्तगालियों ने मसाला व्यापार में महारत हासिल की और गोवा को मसाला व्यापार का बेस बनाया. लिस्बन में वापस लाया जाने वाला मुख्य उत्पाद काली मिर्च थी. खोजके युग में पिपर्निग्रम सोने जितना मूल्यवान था.16वीं शताब्दी में, पुर्तगाल के राज्य राजस्व का आधे से ज़्यादा हिस्सा पश्चिमी अफ़्रीकी सोने और भारतीय काली मिर्च और अन्य मसालों से आता था. 1542 में, सेंट फ्रांसिस जेवियर ने शहर की वास्तुकला की भव्यता का उल्लेख किया. 1575 और 1625 के बीच गोवा अपनी समृद्धि के शिखर पर पहुंचा. एक पुर्तगाली कहावत है, “जिसने गोवा देखा है, उसे लिस्बन देखने की ज़रूरत नहीं है.” पत्थर से बने अमीरों के घर बगीचों और ताड़ के पेड़ों से घिरे रहते थे. कांच के बजाय, उनकी बालकनी वाली खिड़कियों में जालीदार काम में पतले पॉलिश किए हुए सीप के गोले लगे होते थे. 1809-1815 के बीच नेपोलियन ने पुर्तगाल पर कब्जा कर लिया और एंग्लो पुर्तगाली गठबंधन के बाद गोवा अपने आप ही अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र में आ गया. 1815 से 1947 तक गोवा में अंग्रेजों का शासन रहा और पूरे हिंदुस्तान की तरह अंग्रेजों ने वहां के भी संसाधनों का जमकर शोषण किया. और इसके बाद के गोवा से लेकर आज के गोवा तक की कहानी तो मैं आपको बता ही चुका हूं.बाकी कुछ नवीन जी के लिए भी छोड़ रहा हूँ.

पिछले कुछ समय से देखता हूं कि इतिहासबोध कैसे जनमानस से कमजोर होता गया है. अपना जानते नहीं हैं और दूसरे का जानने में रुचि नहीं है. गोवा आने वाली भीड़ का एक बड़ा हिस्सा गोवा के बारे में दरअसल कुछ नहीं जानता. उनके लिए गोवा एक भू-देह है. भोग के लिए उपलब्ध. मुद्रा खर्चिए और फिर पिघलती मादकता, विलास, मद सबका मजा लीजिए. यहां आया व्यक्ति पहले तो प्रकृति की भव्यता में गोता लगाता है लेकिन फिर अधिकतर प्रकृति से निकलकर इंसानी सागर का हिस्सा बन जाते हैं. एक दूसरे में लिपटे, उलझे, लहरों की तरह डूबते, उतरते, खेलते, शोर करते और फिर थककर किनारे लगते. मैं अपने मित्रों और गोवा की मरीचिकाओं के बीच एक बैलेंसर बनकर इस यात्रा को नए साल में ले जाने का कार्यवाहक बना.

गोवा आना असल में इतिहास के एक मुहाने पर खड़े होकर दुनिया को देखने का अवसर है. गोवा सुख भी है और आनंद भी. पदार्थ भी है और अनुभूति भी. माया भी है और वैराग्य भी. वासना भी है और दैवत्व भी. एक धुला हुआ द्वीप-सा गोवा प्रकृति की चादर पहने ताजा बना खड़ा रहता है. हरियाली एक मादक और जीवंत चमड़ी की तरह इसपर लिपटी हुई है. और सामने होता है विशाल सागर. हमें, हमारे भोग, हमारी इच्छाओं और हमारे वजूद के किनारों पर लगातार थपेड़े मारता हुआ. अपने घरों में रहकर हम जिस अनंत को देख नहीं पाते हैं, वो यहां सागर के तट पर साफ़ दिखता है. और यह अनंत ही हमें हमारी सीमा, क्षणभंगुरता और शून्यता का दर्शन भी कराता है.

मंडली लौट आई है अब. अपनी-अपनी खुमारी लेकर सबके ट्राली बैग हवाईजहाज़, टैक्सी, कार और फिर घरों तक पहुँच आए हैं. जो कुछ लिया, लाया गया, सब खोला जा चुका है. लेकिन मेरे स्मृतियों में गोवा से एक गठरी साथ आई है. इस गठरी में ढेर सारी रेत है. सफेद… चमकती… रिसती-सरकती हुई. जब-जब इस रेत को अपनी उंगलियों से सहलाउंगा, गोवा सामने नज़र आएगा.

साभार: हेमंत शर्मा जी के फेसबुक वॉल से।

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