संदीप देव। आज मेरी मौसी का फोन आया। मुझे पालने वाली तीन माओं में एक मां मेरी मौसी है। मेरी मां, मेरी नानी और मेरी मौसी ने ही बचपन में मुझे पाला है। हर वर्ष 1 जनवरी को पिताजी मौसी को फोन करके नववर्ष की बधाई देते थे और फिर मौसी, पिताजी से और मेरी मां से बात करती थी।
मौसी की आवाज में आंसू मुझे साफ दिख रहा था। वह कह रही थी, हर वर्ष बहन-बहनोई फोन करते थे। इस बार फोन नहीं आया। बड़ी याद आ रही है। बहनोई तो नहीं रहे, बहन से बात कर लेती हूं। फिर मां और मौसी बात करते हुए खूब रोईं।
मेरी मां को 5 नवंबर की वह शाम भूलती ही नहीं! वह उस घटना को अक्षरशः मौसी को सुनाते हुए रो रही थी। पिताजी को कोई बीमारी होती तो उनके जाने का शायद इतना दुख नहीं होता, जितना उनके स्वस्थ, हंसते हुए और चेतन अवस्था में दरवाजा खोलते ही उनके इस पृथ्वी से विदाई का हुआ है!
हम प्रयास करते हैं कि मां को खुश रखें, लेकिन वो प्रत्यक्षदर्शी थी अपने पति की मृत्यु की, रात भर उनके शव से चिपटी रही थी! उनका दुख हम सभी से कहीं बड़ा है! इसलिए हम उनके आंसू को रोकने का बहुत प्रयास भी नहीं करते। सोचता हूं कि बहते आंसू अपने साथ कुछ पीड़ा भी बहा ले जाती है! रोने से शायद उनका दुख कुछ कम हो जाए!
हमारी आंखें जब नम होती है तो सबसे बचाकर आंखों के कोर को पोंछ लेते हैं कि कहीं मां देख न ले! अब यही सत्य है कि पिताजी इस दुनिया में नहीं हैं, परंतु इसे समझने और स्वीकार करने में हमारे परिवार को अभी लंबा वक्त लगेगा शायद!
पिताजी आपको नववर्ष की शुभकामनाएं! आप कैसे इस दिन हम सभी को बारी-बारी से फोन करते और बधाई देते थे! अब कौन हमें सुबह-सुबह सबसे पहले फोन करेगा हर वर्ष एक जनवरी को?
