विपुल रेगे। भारत के पहले फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ पर बनाई गई बॉयोपिक ‘सैम बहादुर’ में वह ‘एज’ नहीं दिखाई दे रही, जो उसे बॉक्स ऑफिस पर बेहतर फुटफॉल्स दिलवा सके। ये बॉयोपिक देश के सबसे ख्यात सैन्य रणनीतिकार का सम्मान तो करती है लेकिन वह जादू नहीं जगा पाती, जिससे बॉक्स ऑफिस दौड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड की ओर से प्रसिद्ध लोगों के जीवन पर आधारित फिल्मों की बाढ़ आ गई, जिसके कारण इनका मार्केट कुछ धीमा पड़ गया है। वैसे भी बॉयोपिक फिल्मों का कभी कोई ट्रेंड नहीं होता। ऐसी फिल्मों को बनाना हमेशा से फिल्मकार के लिए एक ज़ोखिम होता है।
मेघना गुलज़ार एक अनुभवी फिल्म निर्देशक हैं। वे अपने किरदारों और कहानी पर बहुत मेहनत करने के लिए जानी जाती हैं। हालांकि ‘सैम बहादुर’ पर मेघना के क्रिएशन में कुछ कमी रह गई है। एक इंटरव्यू में मेघना ने कहा था कि सैम मानेकशॉ के किरदार के लिए रणवीर सिंह को एप्रोच किया गया था लेकिन बात नहीं बन सकी। यानि विकी कौशल पहली पसंद नहीं थे। विकी कौशल ने फिल्म का केंद्रीय पात्र निभाया है लेकिन वे इसकी गहराई में नहीं उतर सके हैं।
हैरानी है कि फिल्म निर्देशक ने विकी कौशल की बॉडी लेंग्वेज और संवाद बोलने की स्टाइल पर ध्यान ही नहीं दिया। विकी कौशल इस किरदार में सैम बहादुर कम और देव आनंद अधिक दिखाई देते हैं। बहुत से दृश्यों में वे ओवर एक्टिंग कर जाते हैं। यदि फिल्म का केंद्रीय अभिनेता अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाता तो इसका बहुत बुरा प्रभाव फिल्म पर होता है। ऐसा ही यहाँ हुआ है। हालाँकि इंटरवल के बाद फिल्म ताव पर आती है। इस हिस्से में विकी कौशल के कुछ अच्छे दृश्य देखने को मिलते हैं।
फिल्म में इंदिरा गांधी का किरदार फातिमा सना शेख ने निभाया है। फातिमा इंदिरा गांधी को प्रस्तुत करने में नाकाम रही हैं। वे इंदिरा गांधी के तेवर एक भी दृश्य में नहीं दिखा सकी हैं। सैम मानेकशॉ की पत्नी के रुप में सान्या मल्होत्रा का अभिनय फीका रहा है। मेघना की पिछली फिल्म ‘राज़ी’ के सामने ये फिल्म कुछ भी नहीं है। कुछ डिपार्टमेंट्स में फिल्म अच्छी है। सिनेमटोग्राफी बेहतर है। सेना को लेकर टीम ने अच्छा शोध किया है।
अफसरों की वरिष्ठता, सैनिकों के बीच का स्वाभाविक माहौल, भाषा इत्यादि पर गहराई से काम किया गया है। मेघना ये फिल्म बनाते हुए तय नहीं कर सकी है कि सैम मानेकशॉ जैसी विराट शख्सियत के जीवन के कौन से पहलू को अपनी कहानी के केंद्र में रखे। फिल्म इतिहास की अच्छी जानकारी देती है लेकिन दर्शक को बांधे रखने में सफल नहीं होती। देशभक्ति के भाव और जूनून जैसे गायब से लगते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि मेघना अपनी फिल्म से राष्ट्र के सबसे बेहतरीन रणनीतिकार सैनिक को सम्मान देने में सफल रहती हैं।
