अजय शर्मा, काशी। काशीखंड अध्याय 84 में वर्णित हैं कि जब भगवान शिव काशी के तीर्थ करते है तब काशी में अवस्थित भगवान राम के वंशजों के तीर्थ की महिमा भी कहते है- हे वीर! तदनन्तर रामेश्वर के आगे रामतीर्थ है, उसमें केवल स्नान करने ही से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। यही निकल हनुमान जी और सुग्रीव जी द्वारा स्थापित उत्तम लिंग है रामघाट फिर समस्त अघसमूहों का नाशक इक्ष्वाकुतीर्थ है। वहीं के नहाने से मनुष्य वेत्रात्मा हो जाता है। रामघाट निकट उसके आगे राजर्षि हरिश्चन्द्र का उत्तम तीर्थ है, जहाँ के स्नान करने से मनुष्य कहीं भी सत्य से च्युत नहीं होने पाता।
हे वीर! हरिश्चन्द्र के तीर्थ में जो कुछ सत्कर्म किया जाता है, वह इस लोक और परलोक में भी अक्षय फल देता है संकठा माता मंदिर सामने कोकावराह से भी दिलीपेश्वर के समीप ही में राजा दिलीप का दिलीपतीर्थ बहुत श्रेष्ठ है, जो तुरन्त ही परमपापनाशक है। चंद्रेश्वर के मंदिर चंद्रेश्वर के निकट राजा सगर का सगरतीर्थ है, जो सगरेश्वर के पास में है ।वहाँ स्नान करने से मनुष्य कभी दुःख सागर में नहीं डूबता। चंद्रेश्वर के निकट मणिकार्णिका ब्रह्मनाल के बीच दक्षिण में राजा भगीरथ का भागीरथी तीर्थ है, जो मनुष्य वहाँ पर स्नान करता है, वह सम्पूर्ण ब्रह्महत्या से भी छूट जाता है।स्वर्गद्वार के सन्निधान में ही भागीरथीश्वर लिंग के दर्शन करने से ब्रह्महत्या के पाप का पुरश्चरण हो जाता है।

मणिकार्णिका समीप था महादेव बोले- अब मैं वाराणसी में स्थित अन्य लिङ्गों का वर्णन करूँगा। लंका से लौटकर श्रीरामचन्द्र जी ने एक लिङ्ग स्थापित किया है । लंकेश्वर को मारकर रघुनाथ के स्थापित उस रघुनाथेश्वर लिंग के स्पर्श करने से ब्रह्मघाती मनुष्य भी तुरत ही शुद्ध हो जाता है। हे सुरेश्वरि! लंका से आकर राम द्वारा वाराणसी में स्थापित लिङ्ग को मैं विशिष्ट (अन्य) स्वरूप में देखता हूँ।
धर्मकूप मीरघाट काशी के मानमंदिर दशाश्वमेध क्षेत्र में भगवान शिव के परम भक्त जिनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान केदारश्वर काशी में प्रकट हुए उनके द्वारा स्थापित मान्धातृ नामक श्रेष्ठ तीर्थ है। राजा मांधाता ने वहीं पर चक्रवर्ती का पद प्राप्त किया था। यही निकट भगवान राम के प्रिय कनक देव भी है। और यही– काशी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से रामेश्वर ज्योतिर्लिंग रामेश्वर महाक्षेत्र (सेतुबन्ध) से जटी देव रूप यहाँ आये हैं । वे एकदन्त गणेश के उत्तरभाग में हैं। उ
नका पूजन करने से वे सभी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। अयोध्या सोमेश्वर के समीप वायुकोण में जहाँ रामेश्वर लिङ्ग है और भगवान् सीतापति राम स्वयं यहाँ वास करते हैं। मानमंदिर दशाश्वमेध उसके आगे गोदौलिया बड़ा देव पर राजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्देश्वर जिनकी चर्चा स्वर्ग में भी होती है,जिन्होंने देवताओं की रक्षा किया उन्ही के द्वारा स्थापित लिंग काशी में है ।वैद्यनाथ के पूर्व में देवताओं को वर प्रदान करने वाला मुचुकुन्देश्वर लिंग है। इन्ही प्रतापी राजा से कालयवन के भस्म करवाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण को यह लीला करनी पड़ी और इसी लीला में रणभूमि से भागने के कारण उनका एक नाम रणछोड़ हुआ।
कालयवन के भस्म हो जाने पर श्रीकृष्ण ने राजा मुचुकुन्द को बताया कि सोते-सोते युग बीत गए हैं और अब आपको मुक्ति के लिए तप करना चाहिए। श्रीकृष्ण की आज्ञा से राजा मुचुकुन्द तप करने चले गए और इन्हें मोक्ष को प्राप्त हुए। गोदौलिया बड़ा देव मंदिर उसके आगे अगस्तेश्वर के दक्षिण विभीषण द्वारा स्थापित लिंग है। पातालपुरी दशाश्वमेध उसके आगे प्रसिद्ध केदारेश्वर के पूर्व उत्तर में राजा इन्द्रद्युम्न द्वारा स्थापित इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंग के सम्मुख ही इन्द्रद्युम्न महातीर्थ है, वहाँ की जलक्रिया के करने से इन्द्रलोक प्राप्त होता है। सोनारपुरा पांडे हवेली गली में प्रसिद्ध केदारेश्वर से दक्षिणापथ में चन्द्रवंशीय और सूर्यवंशीय राजाओं के द्वारा स्थापित किये हुए सैकड़ों / सहस्रों लिंग विद्यमान हैं ।
हनुमानघाट क्षेत्र से लोलार्क शिवाला गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा गंगा तट पर हनुमान जी की पवित्र प्रतिमा की स्थापना उपरांत पवित्र तीर्थ स्थान का नाम हनुमान घाट या हनुमान तीर्थ पड़ा है। जो लोग एक वामपंथी या बौद्धभिक्षु द्वारा लिखित आनद रामायण का उदाहरण दे रहें उन्हें लगता है तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस और तुलसीदास जी पर पूर्ण विश्वास नहीं है। इसके अतिरिक्त भगवान नारायण काशी में अपने अनेक स्वरूप बताते हुऐ कहते हैं– काशी में मेरी पाँच सौ मूर्तियाँ नारायणरूप की, एक सौ जलशायीरूप की, तीस कच्छपरूप की, बीस मत्स्यरूप की, एक सौ आठ गोपालरूप की और तीस परशुरामरूप की और एक सौ एक रामरूप की हैं।
काशी के 1000 पौराणिक शिवलिंगों के मूल देवस्थान एवं तीर्थों की खोज पूर्ण हुई शेष की खोज जारी है। साथ ही काशी के द्वादश ज्योर्तिलिंग और चार धाम के मूल स्थानों की भी खोज पूर्ण हुई
