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India Speak Daily > समाचार > मुद्दा > प्रतिपक्ष की तिलमिलाहट और नरेंद्र मोदी!
मुद्दा

प्रतिपक्ष की तिलमिलाहट और नरेंद्र मोदी!

Courtesy Desk
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10 Min Read
India Speaks Daily - ISD News
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सोनाली मिश्रा। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सरकार हर मोर्चे पर कमजोर लग रही थी और विपक्ष सरकार को घेर रहा था। सरकार के प्रतिपक्ष में सभी दल न केवल हर प्रांत पर बल्कि देश की गद्दी पर भी अपना दावा ठोंक रहे थे। इनमें अरविन्द केजरीवाल सबसे आगे हैं। अरविन्द केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनने के सपने का तो आलम यह है कि दिल्ली की अधिकतर योजनाओं का मुख्य चेहरा वे रह ही नहीं गए हैं। मनीष सिसोदिया का चेहरा ही दिल्ली के हर कोने में लगा हुआ है। नरेंद्र तोमर के साथ मनीष सिसोदिया और आप कहते हैं कि आप ईमानदारी की लड़ाई लड़ते हैं। इसी प्रकार अरविन्द केजरीवाल पंजाब में इन दिनों अपना समय बिता रहे हैं।

अरविन्द केजरीवाल जहां पहले हर दल को जातिगत राजनीति करने का आरोपी बताते थे, वहीं खुले आम पंजाब में जाति की राजनीति कर रहे हैं। पंजाब में वे दलित को उपमुख्यमंत्री का पद दे रहे हैं। खैर अरविन्द केजरीवाल जो खुद को भ्रष्टाचार का काल कहते थे, विमुद्रीकरण के बाद विक्षिप्त से हो गए हैं और इसी मानसिक विक्षिप्तता में अपनी छवि स्वयं ही खराब कर रहे हैं। इसी राह पर कहीं न कहीं कांग्रेस चलती हुई नज़र आ रही है। राहुल गांधी की खाट यात्राओं ने जहां एक उम्मीद की किरण पैदा की थी वह डिजिटल इण्डिया के इतने घटिया विरोध के कारण धूमिल होती दिखाई दे रही है। यह सोशल मीडिया का जमाना है, आपका एकाउंट हैक होता है, लोगों को चिंता होती है। मगर एक दिन पहले दिग्विजय सिंह का यह कहना कि डिजिटल इण्डिया में किसी का सोशल मीडिया का एकाउंट हैक हो जाए तो? और उसके अगले ही दिन राहुल गांधी का ट्विटर एकाउंट हैक होना और उसके बाद डिजिटल इण्डिया पर प्रहार और कुछ ही देर में यह पानी की तरह स्पष्ट हो गया कि इसमें और किसी का नहीं शायद कांग्रेस का आतंरिक ही मामला है।

सोशल मीडिया पर आप अधिक चालाकी नहीं दिखा सकते, यह बात राहुल गांधी की टीम समझ नहीं पा रही है। इसी प्रकार कई कोंग्रेसी पत्रकार विदेशों की लाइनों की पोस्ट लगाते हुए पकडे गए, कि यह बैंकों के बाहर लगी लाइन है। कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि उसे समझ नहीं आ पा रहा है कि राजनीति के जिस उत्पाद को जनता पहले ही खारिज कर चुकी है उसे वह दोबारा कैसे चलाए। ये मार्केटिंग युग है, यदि केवल सोशल मीडिया की बात होती तो भी कुछ ख़ास चिंतित होने की वजह नहीं थी, परन्तु कोंग्रेस के साथ समस्या यह है कि जैसे ही वह गरीबी पर कोई बात कहती है, उसके पुराने भूत उसके सामने आ जाते हैं। आज़ादी के बाद लगभग पैंसठ वर्षों तक कोंग्रेस का शासन रहा है, उसमें गरीब और गरीब क्यों होते चले गए? टाटा, बिडला, अम्बानी,अडानी क्या भाजपा के शासन में फले फूले? नहीं? ये सभी उद्योगपति केवल और केवल कांग्रेस के शासनकाल में ही अमीर हुए।

आज जब कांग्रेस गरीबों के प्रति अपनी हमदर्दी प्रदर्शित करती है तो कहीं न कहीं वह अपनी असफलता का ढोल पीटती हुई नज़र आती है। गरीबों का सबसे बड़ा अपमान यदि कांग्रेस ने किया है तो वह है खाने का अधिकार अर्थात सबके लिए अन्न वाली योजना! आप आज़ादी के बाद जनता को इतना सक्षम भी नहीं बना पाए कि वह अपना मनचाहा खरीद कर खा सके? जब यह योजना लागू की गयी थी तब पत्रकारों के एक विशाल वर्ग ने सोनिया गांधी का चुनाव जीतने वाला ट्रंप कार्ड बताया था, पर दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं। अभी भी कांग्रेस केवल अपने ऐसे नेता को जनता पर थोपकर अलोकतांत्रिक कदम उठा रही है, जिसे जनता हर चुनावों में ठुकराती हुई आ रही है। चाहे वह लोकसभा का हो या विधानसभा का। ऐसी अलोकतांत्रिक पार्टी जब लोकतंत्र की बात करती है तो जनता पिछले साठ बरस का हिसाब मांगने के लिए आ जाती है।

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और विरोधियों में इस समय केवल ममता बनर्जी हैं, जिनके विषय में कुछ दिन पूर्व यह दावा किया जाता था कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए टक्कर दे सकती हैं। मगर विमुद्रीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जो रवैया उन्होंने अपनाया है वह न केवल हतप्रभ कर देने वाला है बल्कि दुखद भी है। ममता बनर्जी यदि चाहतीं तो इस मौके का फायदा उठा सकती थीं, और देश में एक नए नेतृत्व की डोर थाम सकती थीं, मगर ऐसा उन्होंने नहीं किया। यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि पश्चिम बंगाल नकली नोटों का एक प्रमुख केंद्र बन गया है और ऐसा नहीं हो सकता कि यह गोरखधंधा सत्ताधारी दल के संज्ञान में न हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि ममता बनर्जी अपना वोटबैंक बचाने के लिए इस तरह के अनापशनाप कदम उठा रही हैं।

देश में इन दिनों वाकई एक विश्वसनीय नेता का अभाव है। ऐसा नेता जो आगे बढ़कर इस सरकार के गलत कदमों का विरोध कर सके। कथित बौद्धिक वर्ग की बात क्या की जाए, वह तो खुद ही जनता से कटा हुआ है। कहना न होगा कि कथित वरिष्ठ साहित्यकारों ने कांग्रेस के गलत क़दमों या कृत्यों का विरोध न के बराबर किया था। जब मनमोहन सिंह के शासनकाल में घोटाले पर घोटाले हो रहे थे और जनता इन घोटालों को होते देख रहे थी, वे मनमोहन सिंह को दुनिया का सबसे ईमानदार व्यक्ति बताने पर तुले हुए थे। उनकी नज़र में वे एक ईमानदार मगर मजबूर नेता थे। यदि हमारे बुद्धिजीवियों को मनमोहन सिंह की इतनी चिंता थी तो उन्होंने कभी उन लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाई क्या जो उनके प्रिय नेता की छवि तार तार कर रहे थे? नहीं? मनमोहन सिंह के प्रति बुद्धिजीवियों का यह प्रेम मेरी समझ से परे की बात है। वे न तो मनमोहन सिंह का तब विरोध कर पाए जब उन्होंने कहा “देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है!” काश, हमारे बुद्धिजीवी समझ पाते कि इस तरह के वक्तव्यों से बहुसंख्यक वर्ग में एक असंतुष्टि उत्पन्न हो रही थी, आखिर उसकी क्या गलती थी? बहुसंख्यक वर्ग की क्या गलती है जो उसे उसके ही देश के संसाधनों पर अधिकार नहीं मिलेगा? मगर बुद्धिजीवी समझ नहीं पाए? या उन्होंने समझना जरूरी नहीं समझा।

बुद्धिजीवी वर्ग न जाने किस अफीम का सेवन करे बैठा रहा और बहुसंख्यक आक्रोश को अनदेखा करता रहा। बुद्धीजीवी वर्ग इशरत जहां और सोहराबुद्दीन का समर्थक बन गया! ये कैसे? बहुत कुछ अंदरखाने बदल रहा था, पी चिदम्बरम का हलफनामा बदलना बहुत कुछ कह रहा था, मगर बुद्धिजीवी वर्ग ने इस पर मुंह नहीं खोला! क्या यह सत्ता के प्रति प्रेम था या कुछ और नहीं पता! बुद्धिजीवी वर्ग लगातार एक वर्ग को अपमानित करता रहा फिर चाहे वह प्रस्तावित साम्प्रदायिक हिंसा रोधी अधिनियम ही क्यों न हो, जो पूरी तरह एकतरफा तुष्टिकरण का नमूना था। मई 2014 में जो हुआ, वह एक दिन का मामला नहीं था, वह ऐसे ही छोटी छोटी आतिशबाजियों का विस्फोट था।परन्तु दुःख की बात यह है कि अभी भी हमारे कथित बुद्धिजीवियों और कांग्रेस के नेता इस बात को नहीं मान रहे कि वे सत्ता में नहीं हैं। वे नेतृत्व का गठन करने के स्थान पर काल्पनिक भय का संचार कर रहे हैं, जबकि जनता न केवल बुद्धिजीवियों को बार बार गलत साबित कर रही है बल्कि कांग्रेस और विपक्ष को भी बार बार आईना दिखा रही है। ऐसे में आप जनता को ही बेवकूफ साबित करने में लग जाते हैं? यह कैसा अहंकार है आपका?

इस परिद्रश्य में जिन नेताओं से परिपक्वता की उम्मीद लगती है वे हैं ओडिशा के मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक, बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव। अखिलेश यादव उभरते हुए युवा नेता हैं और जिस तरह से वे शासन कर रहे हैं, मंजे हुए कदम उठा रहे है, उस तरह से उन्हें भविष्य का नेता मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। मगर फिर भी यह राजनीति है। कुछ भी कहीं भी हो सकता है। कोई माने या न माने, इस समय नरेंद्र मोदी के सामने एक बड़े कद का नेता लाने में विपक्ष असमर्थ है। वह भाग रहा है, कभी कन्हैया को खड़ा कर देता है तो कभी रविश को? मगर दूसरों के कन्धों पर बन्दूक रखकर अपने अस्तित्व की लड़ाई नेतृत्वविहीन विपक्ष कब तक लड़ेगा, यह विचारणीय होगा!

Courtesy Desk December 7, 2016
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TAGGED: arvind kejariwal, congress conspiracy, modi gov

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