संदीप देव। जाति विमर्श की पिछली कड़ियों में हमने ऋग्वैदिक उत्पत्ति, मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों, डॉ. आंबेडकर के ‘जाति उन्मूलन’ (Annihilation of Caste) के अंतर्विरोधों और पूना पैक्ट से लेकर वर्तमान तक आरक्षण के राजनीतिकरण का विशद दस्तावेजी परीक्षण किया। इन कड़ियों से यह तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आया कि भारत में जाति-व्यवस्था को समाप्त करने के बजाय आंतरिक चुनावी राजनीति और वोट-बैंक सिंडिकेट द्वारा इसे निरंतर सींचा गया।
किंतु 21वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में जाति का प्रश्न केवल भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है। आज भारतीय जाति-व्यवस्था को एक वैश्विक हथियार (Geopolitical Weapon) में रूपांतरित कर दिया गया है। पश्चिमी विश्वविद्यालयों, वैश्विक गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), अंतरराष्ट्रीय मीडिया और अमेरिकी विधायी संस्थाओं में एक सुनियोजित नैरेटिव चलाया जा रहा है—“जाति भारत का नस्लवाद (Caste is India’s Racism) है।”

बहुत ही शोध पूर्ण तथ्यपरक और सत्य का साक्षात्कार कराने वाली रिपोर्ट।