संदीप देव। जाति विमर्श की पिछली कड़ियों में हमने औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान के षड्यंत्रों और डॉ. भीमराव आंबेडकर की दोनों मूल पुस्तकों के सामान्य ढांचे को समझा। डॉ. आंबेडकर ने 1946 में प्रकाशित अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘Who Were the Shudras?’ (शूद्रों की खोज) में शूद्रों की उत्पत्ति को लेकर एक सर्वथा नया सिद्धांत प्रतिपादित किया।
एपिसोड-4: ‘शूद्र कौन थे?’ — आंबेडकर की ‘कसौटी पर सिद्धांत’ के 10 प्रश्न बनाम शास्त्रीय व ऐतिहासिक यथार्थ
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
2 Comments

यह अत्यंत प्रभावशाली, सुसंगत और तथ्यपरक विश्लेषण है। आपने डॉ. आंबेडकर द्वारा उठाए गए प्रश्नों को केवल अस्वीकार करने के बजाय उन्हें शास्त्रीय और ऐतिहासिक संदर्भों की कसौटी पर परखते हुए प्रत्येक तर्क की गंभीर समीक्षा प्रस्तुत की है। विशेष रूप से राजा सुदास, उपनयन, वर्ण-व्यवस्था और शूद्रों की सामाजिक स्थिति से संबंधित आपका विश्लेषण गहन विचार के लिए प्रेरित करता है।
जो लोग इन तथ्यों को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करते हैं या इन प्रमाणों को देखने तक के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए कवष ऐलूष और सरस्वती नदी का संदर्भ ही एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करता है। जिस परंपरा और इतिहास को केवल एक निश्चित राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की आदत बन चुकी हो, उसके सामने जब मूल ग्रंथों और वैकल्पिक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया जाता है, तो स्थापित निष्कर्षों की पुनर्समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
वास्तव में, किसी भी महान व्यक्तित्व के विचारों का सम्मान करने का अर्थ उन्हें आलोचना से परे मान लेना नहीं है। डॉ. आंबेडकर जैसे (दोगला)व्यापक दृष्टि वाले चिंतक के तर्कों पर भी नए साक्ष्यों और प्रतितर्कों के आधार पर गंभीर एवं तर्कसंगत विमर्श होना चाहिए। आपने इस विमर्श को भावनाओं के बजाय प्रश्नों, स्रोतों और प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ाया है। निस्संदेह, यह लेख अध्ययन और चिंतन के योग्य है।
महर्षि वाल्मिकी किरात/वनवासी पृष्ठभूमि के नही थे बल्कि जन्मना ब्राह्मण थे। बाद में किरातों के संगत में आने के कारण उनका व्यवहार किरातों सा हो गया धा। ये तथ्य स्वयं महर्षि वाल्मिकी ने कहे हैं। रामायण में 7/111/11 उनका मौलिक परिचय हैं : “पुत्रस्तद्ब्रम्हाऽप्यन्वमन्यत”। रामायण 7/96/19-20 में अपना परिचय दिया है। अध्यात्म रामायण 2/6/65 आदि।