श्वेता पुरोहित। अनेकानेक रक्ष-सुभटों के रणभूमि में सो जाने के कारण हताश होकर रावण ने कुम्भकर्ण को जगाने का विचार किया। अनेक प्रकार के उपायों द्वारा उसे जगाया। जागते ही उसने पूछा कि ‘आजतक उसे कभी भी नहीं जगाया गया था तो फिर आज ऐसी कौन-सी समस्या आ गयी कि उसे उठाने की आवश्यकता आ गयी?’ रावणने सीताहरण-लंकादहन-समुद्रपर सेतु निर्माण कर श्रीराम के लंका-आगमन का वर्णन करते हुए बताया कि’अक्षयकुमार-प्रहस्त-अकंपन-अतिकाय-देवांक- नरांतक-मकराक्ष आदि सहित खर-दूषण भी वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं। अब लंका के गौरवकी रक्षा वीरवर ! तुम्हारे पराक्रम के अधीन है।’
कुम्भकर्णने उसकी भर्त्सना करते हुए कहा कि ‘सीता जगदम्बा है। उसका हरणकर तुमने उचित नहीं किया। किंतु अनुचित भी कैसे कहूँ ? देवर्षि नारद मुझे, हमारे अन्तका कारण जो वर्षों पूर्व बता चुके थे, वह असत्य नहीं था। उसे सत्य सिद्ध करनेके तुम साधन बने। बनने ही थे। बन गये।’
रावण जानता था कि यदि उसने सीताको लौटानेका प्रस्ताव रख दिया तो समस्या हो जायगी। कुम्भकर्ण विभीषण-जैसा सज्जन तो नहीं था कि उसे भी लात मारकर निकाल देता। वह कुम्भकर्णके चरित्रकी दुर्बलता जानता था। एक संकेतपर मदिराके घड़े-के-घड़े, विभिन्न प्रकारके मांसोंके भार-के-भार आने लगे। कुम्भकर्ण खा-पीकर रणरंगमें रँगने लगा। इस स्थितिमें उसने पूछा कि ‘सखे ! तुमने जिस कारण जानकीका हरण किया, उसका उपभोग भी किया कि नहीं ?’
रावणने उत्तर दिया कि ‘समस्त प्रकारके लोभ – लालच, भय आदि दिखाकर थक चुका हूँ, परंतु वह मेरी ओर देखनेको भी तैयार नहीं है।’
मदकी मादकतामें धुत कुम्भकर्ण बोला, ‘अरे राक्षसराज ! तुम तो मायावी हो। एक बार रामका रूप रखकर चले जाते। काम बन जाता।’
रावण बोला, ‘अरे मित्र ! सखे ! मैंने यह भी विचार किया था। किंतु रामका रूप धारण करनेके लिये जैसे ही मैं रामरूपका ध्यान करता हूँ कि मेरे मनकी समस्त कलुषित भावना नष्ट हो जाती है। मैं प्रत्येक स्त्रीमें अपनी माताके दर्शन करने लगता हूँ। स्वयंसे लज्जित होकर बैठ जाता हूँ।’ – कहकर रावण मौन हो गया। मदमत्त कुम्भकर्णकी वाणी अत्यधिक मदिरापानके कारण लड़खड़ाने लगी उसी अवस्थामें वह एक-एक शब्दको खींचता हुआ- सा बोलने लगा, ‘भ… इ…या, लं…के… श्व… र ! उ…ठो,
इ… स… अ…प…ने…अ…नु…ज… को… अं… तिम… हां…
अंतिम आलिंगन दो। विदा… विदा… करो।’
प्रत्युत्तर में रावण के ‘विजयी भव’ शब्दों का अट्टहास के रूप में उपहास उड़ाता हुआ कुम्भकर्ण मद्य-पात्रोंको ठुकराता हुआ, प्रभुके हाथोंसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये राक्षसी स्वभावके अनुरूप बकता-झकता, अपने बल- विक्रम-शौर्यका उच्च स्वरसे बयान करता हुआ, रक्ष- सेनाको प्रमादपूर्ण धिक्कृत दृष्टिसे देखता हुआ लंका- द्वारकी ओर न देखकर प्राचीर फाँदता हुआ, घोरा गर्जनासे दिशाओंको प्रकंपित करता हुआ, समरांगण की ओर बढ़ चला। आरती के थाल सजाये वज्रज्वाला- सानंदिनी आदि रानियाँ उसकी ओर बढ़ने का साहस नहीं दिखा पाने के कारण दूर खड़ी रह गयीं।
श्रीरामकथा के इस पावन प्रसंग से यही निष्कर्ष निकलता है कि श्रीराम के स्वरूप के चिन्तनमात्र से जब उनके परम वैरी में भी सात्त्विकता का संचार हो जाता है तो फिर श्रीरामभक्तों का तो कहना ही क्या ?
- आचार्य श्रीरामरंगजी
श्री राम जय राम जय जय राम
