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India Speak Daily > समाचार > न्यायपालिका > संपादकीय…न्याय के रोस्टर पर रसूख की छाया: जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बदले नियम!
न्यायपालिकासंपादकीय

संपादकीय…न्याय के रोस्टर पर रसूख की छाया: जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बदले नियम!

ISD News Network
By ISD News Network 17 Min Read
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इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए—विधि शास्त्र का यह पुरातन सिद्धांत किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा है। जब शीर्ष अदालत के गलियारों से प्रक्रियागत विचलनों और रोस्टर प्रबंधन को लेकर संदेह के स्वर उठने लगें, तो वह केवल दो पीठों के बीच मुकदमों का हेरफेर नहीं रह जाता, बल्कि उस संस्थागत निष्पक्षता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाता है जिसके भरोसे एक आम नागरिक न्याय की उम्मीद बांधता है।

सुप्रीम कोर्ट के 13 जुलाई से प्रभावी रोस्टर व्यवस्था के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री और गौतम बुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी मेधा रूपम पर लगे जुर्माने से जुड़ा मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु जाना तय था। लेकिन ठीक अंतिम क्षण में इस मामले को जस्टिस एस.सी. शर्मा और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ में स्थानांतरित कर दिया गया, और वहीं से इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक (स्टे) लगवा ली गई। मुकदमों का रोस्टर तय करने का सर्वाधिकार सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के पास सुरक्षित होने के बावजूद, ऐन वक्त पर किए गए इस अप्रत्याशित फेरबदल ने न्यायिक गलियारों में तीखी बहस छेड़ दी है।

सुप्रीम कोर्ट के 13 जुलाई से प्रभावी रोस्टर व्यवस्था के अनुसार, ज्ञानेश कुमार की बेटी और गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम पर लगे जुर्माने से जुड़ा मामला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु जाना था।

लेकिन ठीक अंतिम क्षण में इस मामले को जस्टिस एस.सी. शर्मा और एन.के.… pic.twitter.com/XUOOjctqVS

— Ravindra Singh Sheoran (@TellingRavindra) September 24, 2026

गौरतलब है कि इस पूरे विवाद की जड़ में नोएडा में हुआ एक मजदूर आंदोलन और उसके बाद प्रशासन द्वारा की गई कठोर कार्रवाई है। दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी ने नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जिसके बाद पुलिस ने उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया था। इसके पश्चात जिलाधिकारी मेधा रूपम ने बिना ठोस व वस्तुनिष्ठ तथ्यों की पड़ताल किए आकृति चौधरी पर कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) तामील कर दिया, जिसके चलते उन्हें करीब पांच महीने जेल में रहना पड़ा। इस मनमाने कदम के खिलाफ जब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा, तो जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेवा की खंडपीठ ने न केवल एनएसए की कार्रवाई को मनगढ़ंत व अवैध बताते हुए रद्द किया, बल्कि प्रशासनिक निरंकुशता पर अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि नौकरशाही का ऐसा ही तानाशाही रवैया रहा तो उत्तर प्रदेश ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ बन जाएगा।

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अदालत ने नागरिक स्वतंत्रता के हनन के एवज में आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने और यह राशि सीधे डीएम मेधा रूपम के व्यक्तिगत वेतन से वसूलने का कड़ा आदेश जारी किया था। अपनी सर्विस बुक पर प्रतिकूल टिप्पणी और वेतन से जुर्माने की इसी वसूली के आदेश से बचने के लिए मेधा रूपम सुप्रीम कोर्ट पहुँची थीं, जहाँ पीठ-परिवर्तन का यह नया विवाद खड़ा हो गया।

इस विवाद ने और भी गंभीर कानूनी व संस्थागत मोड़ तब ले लिया है, जब वकीलों के प्रमुख संगठन ‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ (LAFC) ने सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को खुला पत्र लिखकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। संगठन ने अपनी चिट्ठी में कड़ा एतराज जताते हुए लिखा कि मौजूदा रोस्टर के अनुसार यह याचिका उस पीठ के अधिकार-क्षेत्र में आती ही नहीं थी जहाँ इसे भेजा गया, बल्कि इसे जानबूझकर एक ‘खास पीठ को विशेष रूप से आवंटित’ (specially assigned) किया गया।

जस्टिस दीपक मिश्रा जब CJI थे उनपर यही आरोप लगा था। चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेस कर दिया था। CJI जस्टिस सूर्यकांत पर भी आरोप है!

वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने CJI सूर्यकांत को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि मौजूदा रोस्टर के बावजूद इस मामले को विशेष रूप से एक… https://t.co/S2ON8QhauR

— Prabhakar Kumar Mishra (@PMishra_Journo) September 24, 2026

एसोसिएशन ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता एक लोक सेवक होने के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं, और ऐसे में किसी मामले को इस प्रकार विशेष तरजीह (preferential treatment) और नियम-विरुद्ध आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग देना न्याय व्यवस्था में बेहद गलत नजीर कायम करता है।

पत्र में यह भी कहा गया कि एक विशेष पीठ के समक्ष इस तरह की विशिष्ट लिस्टिंग ने न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जन-विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। इसके अलावा, वकीलों के संगठन ने सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा और लाइव प्रोसीडिंग्स का ऑडियो म्यूट (बंद) किए जाने पर भी सख्त आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे खुली अदालत (open court hearing) और जन-पारदर्शिता के बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन करार दिया।

उल्लेखनीय है कि इस पूरे प्रकरण पर काकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने भी एक्स पर विस्तृत तथ्य सामने रखते हुए बेहद तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा:

“चूंकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चर्चा में हैं, मेरे पास सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश के बारे में बेहद महत्वपूर्ण लेकिन दुखद खबर साझा करने के लिए है।

🚨IMPORTANT NEWS🚨

Since Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar is in the news, I have some very important but sad news to share about a Supreme Court judge.

Supreme Court judge Justice Satish Chandra Sharma. Just two months away from retirement.

If you remember, the… pic.twitter.com/h6YRgYs14F

— Saurav Das (@SauravDassss) September 24, 2026

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जो सेवानिवृत्ति से महज दो महीने दूर हैं। अगर आपको याद हो, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा श्रम आंदोलन में शामिल एक छात्रा कार्यकर्ता के खिलाफ अनुचित तरीके से एनएसए लगाने पर ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा की डीएम मेधा रूपम पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कानूनी समाचार पोर्टल ‘लाइव लॉ’ ने रिपोर्ट किया कि ज्ञानेश की बेटी का मामला नियमों, परंपराओं और सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर का उल्लंघन करते हुए बिना क्रम (आउट ऑफ टर्न) जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के समक्ष सूचीबद्ध किया गया। यह चुनौती जस्टिस नागरत्ना की पीठ के पास जानी चाहिए थी, जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीश के रूप में जानी जाती हैं।”

“दो दिन पहले, जब यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ, तो जस्टिस शर्मा की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का ऑडियो ही बंद (स्विच ऑफ) कर दिया—जो कि अत्यंत असामान्य है और अमूमन कभी नहीं किया जाता। यह बेहद चिंताजनक (अलार्मिंग) है। जज की तरफ से इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं आया कि ज्ञानेश की बेटी के लिए यह असाधारण रियायत क्यों बरती गई। बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए जुर्माने और प्रतिकूल टिप्पणियों पर जस्टिस शर्मा द्वारा फौरन रोक (स्टे) लगा दी गई।”

Lawyers’ Association for Constitution writes to CJI Surya Kant raising concerns over the “out-of-turn” listing of a plea arising from strictures against the Noida District Magistrate and the muting of live proceedings during its hearing

The letter flags that the petitioner, a… pic.twitter.com/0C10XWcTv2

— Bar and Bench (@barandbench) September 24, 2026

“उसी दिन, ज्ञानेश कुमार से ही जुड़े एक अन्य मामले में—भारत के चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून के खिलाफ दायर संवैधानिक चुनौती पर आखिरकार दो जजों की पीठ द्वारा फैसला सुनाया गया, जिसमें जस्टिस शर्मा भी शामिल थे। इस मामले में नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी, जिसमें भारत के चुनाव आयुक्त का चयन करने वाली तीन सदस्यीय चयन समिति में विपक्ष के नेता की भूमिका आज केवल औपचारिक (ऑर्नामेंटल) रह गई है, जबकि अन्य दो सदस्य प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट मंत्री होते हैं।”

“ध्यान देने वाली बात यह है कि जस्टिस शर्मा ने इसमें असहमति (डिसेंट) जताई, जिसके चलते खंडित फैसला (स्प्लिट वर्डिक्ट) आया और अब यह मामला बड़ी पीठ के गठन के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है। इससे यह मामला शायद वर्षों के लिए टल गया है। यह खंडित फैसला खुद तीन साल बाद आया। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट हमारे जीवन और देश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई टालता है।”

Lawyers Association For Constitution writes to Chief Justice of India Surya Kant raising concerns over the manner in which Noida DM Medha Roopam's petition was listed.

The Association alleges that her petition was "specially assigned to a particular bench" despite the prevailing… pic.twitter.com/ac6DWpBD39

— Live Law (@LiveLawIndia) September 24, 2026

“मोदी सरकार द्वारा पूर्व और वर्तमान चुनाव आयुक्तों को दी गई अलग ब्लैंकेट इम्युनिटी (पूर्ण संरक्षण) का मामला भी पिछले 9 महीनों से सीजेआई सूर्यकांत के समक्ष लंबित है। आज मुख्य चुनाव आयुक्त सत्ता के इशारे पर भारी गैरकानूनी गतिविधियों और चुनावों व वोटों की चोरी के लिए बेनकाब हो चुके हैं। कोई भी विवेकशील, निष्पक्ष और न्यायप्रिय व्यक्ति यह देख सकता है कि चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया स्वतंत्र नहीं है और पूरी तरह सरकार के पक्ष में झुकी हुई है, लेकिन जस्टिस शर्मा ऐसा नहीं देखते।”

सौरभ दास के अनुसार, “और अब सबसे बड़ी खबर, जस्टिस शर्मा के बेटे के पास एक, दो नहीं, बल्कि सरकार के चार बड़े और मलाईदार सरकारी वकील पैनल (गवर्नमेंट काउंसिल पैनल्स) हैं—जिनमें आयकर विभाग, जीएसटी, कस्टम्स एवं एक्साइज, और मध्य प्रदेश सरकार का पैनल शामिल है। मुझे यह समझाने की आवश्यकता नहीं है कि जब आपके पास ऐसे मलाईदार सरकारी पैनल होते हैं, तो उनके साथ कितने बड़े लाभ और प्रभाव आते हैं। मेरी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा वाली रिपोर्ट पढ़ें, जहाँ मैंने इसी तरह की बात उजागर की थी। मैं अभी के लिए उनके बेटे का नाम उजागर नहीं कर रहा हूँ।”

Propriety Questions Emerge As Son Of Justice SC Sharma, Who Heard ECI & Medha Ropam Cases, Is Election Commission's Lawyer |@manuvichar https://t.co/YuzFUdBTCl

— Live Law (@LiveLawIndia) September 25, 2026

सौरभ दास के अनुसार, “सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि किसी न्यायाधीश के परिवार के सदस्य सरकार की कृपा और मर्जी पर पदों पर बने हों, तो राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में उस जज से निष्पक्ष और तटस्थ न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जज दो महीने बाद सेवानिवृत्त भी हो रहे हैं, और कई वकीलों ने मुझे बताया है कि एनसीएलएटी (NCLAT) और ऐसे ही अन्य मलाईदार ट्रिब्यूनलों में पद रिक्त हैं।”

“मुझे यह कहते हुए बेहद अफसोस है कि न्यायपालिका की ऐसी व्यवस्था निष्पक्ष न्याय करने की अपनी क्षमता में विश्वास नहीं जगाती। यही कारण है कि न्यायाधीशों की आचार संहिता उनसे अलगाव और तटस्थता की भावना बनाए रखने की अपेक्षा करती है, ताकि वे ऐसा कुछ न करें जिससे उनकी और न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचे।”

“जस्टिस स्वर्ण कांता के मामले और सुप्रीम कोर्ट सहित कई अन्य जजों के मामलों में, भारतीय न्यायपालिका की संस्था का इस तरह पूरी तरह बंधक बन जाना (कम्प्लीट कैप्चर) देखना बेहद दुखद है। क्या न्यायपालिका ऐसे ही चल सकती है?”

इस समूचे घटनाक्रम, वकीलों के आधिकारिक विरोध और सौरभ दास द्वारा उठाए गए बिंदुओं की आलोचनात्मक विवेचना व्यवस्था की आंतरिक कार्यप्रणाली और शक्ति-संतुलन की कई असहज परतों को उजागर करती है:

*‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ बनाम प्रक्रियागत शुचिता: जब शीर्ष अदालत की तय रोस्टर व्यवस्था को परे रखकर किसी संवेदनशील मामले को विशेष पीठ को ‘असाइन’ किया जाता है, तो यह प्रशासनिक सुगमता नहीं बल्कि चुनिंदा प्राथमिकताओं का प्रश्न बन जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी के मामले में यह विचलन ‘फोरम शॉपिंग’ के संदेह को बल देता है।

*पारदर्शिता का गला घोंटना और ऑडियो म्यूट: खुली अदालत की कार्यवाही लोकतंत्र की रीढ़ है। जब एक तरफ रसूखदार अधिकारी को स्टे दिया जा रहा हो और दूसरी तरफ कार्यवाही का ऑडियो ही म्यूट कर दिया जाए, तो यह संस्थागत पारदर्शिता को शून्य पर लाकर खड़ा कर देता है। मीडिया, वकीलों और आम नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि बंद कमरों या म्यूट माइक्रोफोन के पीछे न्याय के तराजू पर क्या तौला जा रहा है।

*दोहरा न्याय और हितों का टकराव: एक तरफ आम नागरिक की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बुनियादी सवाल हैं, जहाँ 5 महीने जेल काटने वाली छात्रा के पक्ष में आया हाईकोर्ट का फैसला पलक झपकते रोक दिया जाता है। दूसरी तरफ, न्यायाधीशों के परिजनों को मिलने वाले सरकारी पैनल और सेवानिवृत्ति के मुहाने पर खड़े पदों के समीकरण हैं। यह स्थिति न्यायपालिका के नैतिक दिशा-निर्देशों और उसकी स्वायत्तता पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है।

निष्कर्ष:

न्यायिक संस्थाएं संविधान के निर्जीव अनुच्छेदों या पद के विशेषाधिकारों की आड़ लेकर नहीं, बल्कि अपनी निर्भीक निष्पक्षता, अक्षुण्ण पारदर्शिता और बेदाग नैतिक आचरण से लोक-विश्वास अर्जित करती हैं। जब सत्ता के गलियारों का रसूख और प्रभाव अदालत के तराजू को झुकाने लगे, प्रक्रियागत शुचिता को ताक पर रख दिया जाए और न्याय की आवाज को म्यूट कर दिया जाए, तो वह केवल किसी आदेश पर रोक नहीं होती, बल्कि लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर की आत्मा पर किया गया सीधा प्रहार होती है।

यदि आम नागरिक की नजरों में यह धारणा घर कर गई कि न्यायपालिका ताकतवर हुक्मरानों के लिए ढाल और मजलूमों के लिए महज तारीखों का अंतहीन भंवर बन चुकी है, तो गणतंत्र का यह सबसे मजबूत स्तंभ भरभरा कर गिर जाएगा। न्याय की चौखट पर अंतिम उम्मीद बांधे खड़े साधारण वादी का भरोसा तभी बहाल हो सकता है, जब ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ का विशेषाधिकार किसी एक व्यक्ति की विवेकाधीन करने के बजाय एक पूरी तरह स्वचालित, पारदर्शी और अभेद्य वस्तुनिष्ठ प्रणाली के अधीन बंधे—जहाँ न्याय न बिके, न झुके, और न ही किसी रसूखदार के लिए पूरी न्यायिक प्रक्रिया की ही बली चढ़ा दे!

आलोचना से घबरा कर सुप्रीम कोर्ट का U-turn!

चहुंओर से घिरी न्यायपालिका और सार्वजनिक आलोचनाओं के भारी दबाव का ही नतीजा है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने पहले के आदेश में आनन-फानन में संशोधन करने पर बाध्य होना पड़ा है। शुरुआत में शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे फैसले (विशेषकर पैरा 27 से 33) के क्रियान्वयन पर एकमुश्त रोक लगा दी थी, जिससे ऐसा संदेश गया मानो छात्रा आकृति चौधरी की रासुका हिरासत रद्द करने का फैसला ही पलट दिया गया हो। लेकिन जब वकीलों के संगठनों के विरोध, बंद ऑडियो और प्रक्रियागत मनमानी पर देशभर में किरकिरी होने लगी, तो बैकफुट पर आई अदालत ने संशोधित आदेश जारी कर सफाई दी कि यह रोक केवल डीएम मेधा रूपम के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों, सख्ती और उनके वेतन से ₹5 लाख मुआवजे की वसूली (पैरा 27 से 33) तक ही सीमित है, जबकि छात्रा की रासुका हिरासत रद्द करने का हाईकोर्ट का मूल फैसला जस का तस बरकरार है। आलोचनाओं से घबराकर उठाया गया यह सुधारात्मक कदम वास्तव में इस कड़वी सच्चाई को ही पुष्ट करता है कि अदालत को अपनी चूक का अहसास था—जहाँ नौकरशाही के रसूख को बचाने की जल्दबाजी में संवैधानिक मर्यादाएं इतनी तार-तार हो चुकी थीं कि डैमेज कंट्रोल किए बिना शीर्ष पीठ के पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था

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2 Comments
  • Avatar Anonymous says:
    September 25, 2026 at 10:27 pm

    🙏🚩

    Loading...
    Reply
  • Avatar Anonymous says:
    September 26, 2026 at 11:40 am

    संबाल है,कि अपने वेतन से पैसे कटने की बारी आईं तो पूरी लावी खड़ी हो गई! पर जब गरीबों से वसूली होती है!तब कोई नजर नहीं आता!रही सर्विस बुक में प्रतिकूल प्रविष्टि की बात तो बकरी की मां कब तक खैर मनाएगी!!

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