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India Speak Daily > वैचारिकी > जातिवाद > संपादकीय…IIT Bombay में मेरिट का कत्ल: नकल पर पर्दा डालने के लिए एससी/एसटी एक्ट का खूनी खेल!
जातिवादसंपादकीय

संपादकीय…IIT Bombay में मेरिट का कत्ल: नकल पर पर्दा डालने के लिए एससी/एसटी एक्ट का खूनी खेल!

ISD News Network
By ISD News Network 6 Min Read
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6 Min Read
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इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता, अकादमिक साख और योग्यता पर अब तुष्टीकरण और दलितवादी राजनीति की ऐसी कुल्हाड़ी चल चुकी है, जहाँ परीक्षा कक्ष में ईमानदारी बरतना किसी शिक्षक के लिए जानलेवा जोखिम बन गया है। देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान IIT Bombay से सामने आया हालिया घटनाक्रम सिर्फ एक संस्थान की बदहाली की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का खुला नग्न प्रदर्शन है जहाँ अकादमिक चोरी को छिपाने के लिए SC/ST कानून को ढाल बना लिया गया है।

गौरतलब है कि आईआईटी बॉम्बे के एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला परीक्षा ले रहे थे। परीक्षा हॉल में एक छात्र साहिल रविंद्र वाकोड़े मोबाइल फोन और Chatgpt के जरिए पर्चा हल करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया। नियमों के पालन के तहत प्रोफेसर ने छात्र को नकल करने से रोका और परीक्षा हॉल से बाहर कर दिया। इसके बाद उस छात्र ने आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठा लिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह पूरे अकादमिक जगत को हिला देने वाला है—मृतक छात्र के पिता रवींद्र वाकोडे ने घटना को जातिगत प्रताड़ना का रंग देते हुए प्रोफेसर के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा दिया, जिसकी जांच अब क्राइम ब्रांच के हवाले है। यह पूरा घटनाक्रम सीधे-सीधे उस व्यवस्था पर तमाचा है जिसे कभी देश के सर्वोच्च बौद्धिक मस्तिष्क तैयार करने का गौरव प्राप्त था।

प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला कोई साधारण शिक्षक नहीं हैं; वे स्वयं आईआईटी के पूर्व छात्र हैं, जहाँ से उन्होंने एम.टेक और पीएचडी की डिग्रियाँ हासिल की हैं, और शिक्षण में अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें दो-दो बार ‘एक्सीलेंस इन टीचिंग’ अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है। एक ऐसा समर्पित शिक्षक, जो खुद ओबीसी पृष्ठभूमि से आता है, आज केवल इसलिए जांच एजेंसियों के चक्कर काटने को मजबूर है क्योंकि उसने अपनी निष्ठा और कर्तव्य से समझौता नहीं किया। प्रोफेसर की एकमात्र ‘गलती’ यह थी कि उन्होंने परीक्षा में हो रही चोरी पर आँखें नहीं मूँदीं।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा झोल मृतक के परिवार द्वारा गढ़ी गई जातिगत प्रताड़ना की कहानी में दिखता है। पिता का आरोप है कि उनके बेटे को संस्थान में लंबे समय से प्रताड़ित किया जा रहा था। यदि यह आरोप सच था, तो आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थान में दशकों से सक्रिय एससी/एसटी सेल या आंतरिक शिकायत निवारण समिति में उस छात्र ने अपने पूरे अकादमिक कार्यकाल के दौरान एक भी आधिकारिक शिकायत दर्ज क्यों नहीं कराई? जब तक छात्र जीवित था, तब तक किसी भी मंच पर कोई शिकायत दर्ज नहीं थी, लेकिन परीक्षा में नकल करते पकड़े जाने और उसके बाद उठाए गए आत्मघाती कदम के तत्काल बाद पूरे मामले को एससी/एसटी एक्ट के कठोर प्रावधानों और मुआवजे की जमीन तैयार करने वाले नैरेटिव में बदल दिया गया।

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संपादकीय… प्रेमानंद आश्रम और पॉडकास्टर शुभांकर मिश्रा विवाद का यथार्थवादी विश्लेषण!

यह प्रवृत्ति बताती है कि किस तरह सुरक्षात्मक कानूनों का इस्तेमाल अब अकादमिक विफलताओं, अनुशासनहीनता और अनैतिक आचरण को ढकने के लिए एक अचूक हथियार के रूप में किया जा रहा है। रियायतों के दम पर तकनीकी संस्थानों में प्रवेश पा लेने के बाद यदि कोई छात्र न्यूनतम अकादमिक दबाव नहीं झेल पाता, चैटजीपीटी और मोबाइल से नकल करता है, और पकड़े जाने पर तंत्र शिक्षक को ही सूली पर टांग देता है—तो यह संदेश साफ है: या तो शिक्षक अपनी आँखें बंद कर लें, या फिर जेल जाने और करियर बर्बाद करने के लिए तैयार रहें।

संपादकीय टिप्पणी:

राजीव मल्होत्रा ने अपनी चर्चित कृति ‘स्नेक्स इन द गंगा‘ में जिस ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’ के आयातित जहर की बात कही थी, वह आज सच साबित हो रही है। पश्चिमी साजिशों और वामपंथी अकादमिक एजेंडे के तहत भारत के शीर्ष संस्थानों—आईआईटी और आईआईएम—में meritocracy (योग्यता तंत्र) को ध्वस्त कर वहाँ पहचान, पीड़ित-भाव (victimhood) और कानून के आतंक को स्थापित किया जा रहा है।

यदि एक श्रेष्ठ शिक्षक को परीक्षा में चोरी रोकने के लिए कानून के शिकंजे में कसा जाएगा, तो देश के प्रतिभाशाली छात्र और शिक्षक इस सड़ांध भरी व्यवस्था से भागेंगे ही। प्रतिभा पलायन (Brain Drain) केवल बेहतर पैकेज की तलाश नहीं है, बल्कि अपनी गरिमा और योग्यता को इस कानून-संरक्षित ब्लैकमेलिंग से बचाने की मजबूरी भी है। अगर आज पूरा समाज और नीति-निर्माता प्रोफेसर दूल्ला के पक्ष में खड़े नहीं हुए, तो आने वाले समय में आईआईटी के परीक्षा कक्षों में कोई शिक्षक ड्यूटी देने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा, और देश के सबसे प्रीमियम संस्थान केवल डिग्री बांटने वाले ऐसे कारखाने बनकर रह जाएंगे जिनका वैश्विक साख से कोई वास्ता नहीं होगा।

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2 Comments
  • Avatar Priyajit Pattanaik says:
    September 26, 2026 at 11:26 am

    मेरिट और अकादमिक ईमानदारी के पक्ष में आवाज उठाना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी है। IIT Bombay का यह प्रकरण कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि कोई शिक्षक परीक्षा में अनियमितता देखकर नियमों के अनुसार कार्रवाई करता है, तो केवल उस कार्रवाई के आधार पर उसे दोषी मान लेना उचित नहीं हो सकता। प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष और तथ्य-आधारित जांच होनी चाहिए, ताकि सत्य सामने आए और किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित न होना पड़े। साथ ही, किसी भी सुरक्षात्मक कानून का इस्तेमाल वास्तविक भेदभाव के मामलों में पूरी गंभीरता से हो, लेकिन उसे अकादमिक अनुशासन या परीक्षा की निष्पक्षता के प्रश्न से अलग रखकर देखा जाना चाहिए।

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    Reply
  • Avatar Prem Beniwal says:
    September 27, 2026 at 9:16 pm

    Sandeep Ji ram Ram. Ab tao halat ye hain ki SC/ST varg ke bahut se advocates ki Vakalat hee SC/ST ke jhuthe cases ke karan hee chal rahi hai.

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    Reply

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