इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारतीय लोकतंत्र का आधार यदि कोई एक सिद्धांत है, तो वह है ‘एक नागरिक, एक वोट’। किंतु जब चुनावी प्रक्रिया का नियामक ही कटघरे में खड़ा हो जाए और संस्थागत निष्पक्षता की बुनियाद ही हिलने लगे, तब मूकदर्शक बने रहना लोकतंत्र के साथ खुला छल होगा। देश के पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आर. के. सिंह द्वारा ‘सभी देशवासियों के नाम खुला पत्र’ लिखकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वे केवल प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा नहीं करते, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर एक खतरनाक और सुनियोजित विकृति की पुष्टि करते हैं।
आर. के. सिंह कोई सामान्य नागरिक या तात्कालिक राजनीति से प्रेरित व्यक्ति नहीं हैं। वे एक वरिष्ठ पूर्व आईएएस अधिकारी और मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हैं। उन्होंने पूर्व में भारत सरकार के गृह सचिव के रूप में देश के आंतरिक प्रशासन और सुरक्षा तंत्र का नेतृत्व किया है। जब ऐसा कोई व्यक्ति साक्ष्यों, कानूनी धाराओं और आंकड़ों के साथ यह कहे कि—“SIR (विशेष पुनरीक्षण) के नाम पर कानून का खुला उल्लंघन कर अब तक 13 करोड़ मतदाताओं को सूची से निकाला गया है, जिनमें से 99 प्रतिशत गरीब भारतीय हैं”—तो यह पूरे राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोरने वाला तथ्य है।
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ISD Radio : लोकतंत्र पर ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’ या संस्थागत पतन?
कानूनी प्रावधानों का खुला उल्लंघन और शक्तियों का केंद्रीकरण
आर. के. सिंह ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950) की कानूनी बारीकियों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि आयोग की यह पूरी कवायद वैधानिक सीमाओं का खुला अतिक्रमण है:
* धारा 21 और अखिल भारतीय SIR का अवैध दायरा: आर. के. सिंह लिखते हैं, “धारा 21 के अनुसार, विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष कारणों से ही किया जाना है और वह भी केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में… विशेष परिस्थितियों के लिए किया गया अपवाद स्वरूप प्रावधान सामान्य नियम नहीं बन सकता।” पूरे देश में एक साथ गहन पुनरीक्षण (Intensive Revision) का आदेश देकर आयोग ने कानून की मूल भावना को ही पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रक्रिया को ठहराया गया कानूनी आधार भी गंभीर सवालों के घेरे में है।
* धारा 22 का उल्लंघन और प्रमाण के भार का उलटना: किसी भी मतदाता का नाम काटने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को है, वह भी धारा 22 के तहत समुचित जांच और सुनवाई का मौका देने के बाद। आरोप है कि 2003 के बाद वैध तरीके से जोड़े गए मतदाताओं को बिना किसी जांच, बिना नोटिस दिए बाहर कर दिया गया और उन्हें पुनः पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 भरने को मजबूर किया गया। यह सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ‘लाल बाबू हुसैन बनाम ईआरओ (1995)’ का खुला उल्लंघन है। स्थापित न्यायिक सिद्धांत यह है कि अयोग्यता सिद्ध करने का दायित्व प्रशासन या आपत्ति उठाने वाले का होता है, न कि मतदाता का। ज्ञानेश कुमार ने प्रमाण का पूरा भार गरीब नागरिकों पर लाद दिया।
* केंद्रीकृत डिजिटल नियंत्रण: कानूनन जो शक्ति स्थानीय ERO के पास थी, उसे तकनीकी तंत्र और शीर्ष स्तर पर एक अधिकारी के अधीन सीमित कर दिया गया। यहाँ तक कि गोवा में 97 मतदाताओं को ERO, DEO और CEO द्वारा वैध पाए जाने के बावजूद डिजिटल मतदाता सूची के केंद्रीकरण के चलते उनके नाम शामिल नहीं करवाए जा सके।
हाशिए के समाज पर प्रहार: ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी‘ का अमानवीय चश्मा
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील और पीड़ादायक पहलू वह तकनीकी क्रूरता है, जो हमारे सामाजिक यथार्थ से पूरी तरह कटी हुई है। आर. के. सिंह ने पत्र में सवाल उठाया है:
“ज्ञानेश कुमार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भारत में गरीब लोग कैसे रहते हैं। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होते… जब BLO उनके पास जाता है तो वे अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताते हैं। पिता और पुत्र में 15 वर्ष से कम का अंतर बताकर इसे ‘logical discrepancy’ कहना और नाम काट देना गरीबों के साथ खुला अन्याय है।“
जो प्रवासी मजदूर हैं, जो रोज़ी-रोटी की तलाश में दर-दर भटकते हैं, जिनके पास जटिल दस्तावेज नहीं हैं, उनके नाम कंप्यूटर के एक एल्गोरिदम ने काट दिए। जबकि कड़वी हकीकत यह है कि विदेशी घुसपैठिए सबसे पहले अपने पहचान पत्र और दस्तावेज दुरुस्त करवाते हैं, लेकिन इस देश का असली, भूमिहीन और साधनहीन नागरिक व्यवस्था की कागजी भूलभुलैया में अपने मताधिकार से बेदखल कर दिया गया।
आयोग के भीतर से ही उठा विद्रोह: महाराष्ट्र के CEO की चिट्ठी ने खोली पोल
अब तक इस खेल को केवल राजनीतिक दलों या सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप कहकर खारिज करने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन अब निर्वाचन आयोग के अपने ही शीर्ष अधिकारियों ने इस निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खोजी रिपोर्ट ने पूरे देश को चौंका दिया है। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) एस. चोक्कलिंगम ने सीधे केंद्रीय चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर ‘ECINet’ सॉफ्टवेयर के जरिए चलाए जा रहे इस खेल पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। चोक्कलिंगम ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि फैसला लेने का वैधानिक अधिकार ERO (स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) को दिया जाए, न कि दिल्ली में बैठे एक सॉफ्टवेयर (ECINet) को।
महाराष्ट्र CEO ने ECINet सॉफ्टवेयर की निरंकुशता को समाप्त करने के लिए 4 प्रमुख मांगें रखी हैं:
1 . सुनवाई से छूट का विकल्प (Exempted from Hearing): अच्छे और वैध कागजात प्रस्तुत करने पर मतदाता को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट मिले, ताकि बुजुर्गों, बीमारों और दिव्यांगों को बेवजह सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
2 . ‘अन्य दस्तावेज’ का 14वां विकल्प: निर्धारित 13 दस्तावेजों के अलावा ‘अन्य समतुल्य दस्तावेज’ (Other Equivalent Documents) स्वीकार करने का प्रावधान हो; क्योंकि जंगलों में रहने वाले आदिवासी, बेघर, हाशिए के वर्गों और घुमंतू समाज के पास वे विशिष्ट 13 दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते।
3 . ERO का स्वायत्त अधिकार: ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ या विसंगतियों पर अंतिम फैसला स्थानीय ERO स्वयं कर सके, उसे हर छोटी बात के लिए फाइल जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के पास न भेजनी पड़े। कानूनन मतदाता सूची की वैधानिक जवाबदेही ERO की है।
4 . पुरानी SIR लिस्ट की अनिवार्य अपलोडिंग समाप्त हो: हर मामले में पिछली SIR सूची को अनिवार्य रूप से अलग से अपलोड करने की बाध्यता हटाई जाए, क्योंकि सॉफ्टवेयर पहले ही उस डेटाबेस से जुड़ा है।

यह कोई पहला आंतरिक विरोध नहीं है। इससे पहले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने भी ECINet सॉफ्टवेयर और मतदाता सूचियों के अनधिकृत केंद्रीयकरण का कड़ा विरोध दर्ज कराया था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने साथी चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। जब विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और स्वयं आयोग के आयुक्त ही सॉफ्टवेयर के जरिए हो रहे अधिकारों के अपहरण और मतदाताओं की छंटनी पर सवाल उठा रहे हों, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई सामान्य तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनादेश को प्रभावित करने की एक गहरी साजिश है। ऐसे में नैतिक और संवैधानिक आधार पर ज्ञानेश कुमार के पास पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं बचता; उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
फॉर्म 6 में अवैध परिशिष्ट, थोक में फॉर्म 7 और 13% का चुनावी समीकरण
आर. के. सिंह द्वारा उजागर किए गए अन्य बिंदु भी निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाते हैं:
* फॉर्म 6 में अवैध परिशिष्ट: ज्ञानेश कुमार ने दोनों चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद फॉर्म 6 में मनमाना परिशिष्ट जोड़ दिया, जिसमें 2003 की मतदाता सूची में माता-पिता का ब्योरा मांगा गया। 18 वर्ष का युवा 23 वर्ष पुरानी सूची कहाँ से लाएगा? यह सीधे तौर पर युवा मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने की रणनीति है।
* फर्जी फॉर्म 7 के जरिए नाम हटाना: बिना किसी भौतिक सत्यापन के थोक में जाली दस्तखत वाले फॉर्म 7 स्वीकार किए गए। बंगाल में ERO द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं का पंजीकरण केवल संदिग्ध अपीलों के आधार पर रोक दिया गया।
* चुनावी नतीजों पर असर: 2024 के आम चुनाव में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच कुल मतों का अंतर मात्र 3% था। वहीं दूसरी ओर, SIR के माध्यम से अब तक 13% यानी 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। यह अंतर किसी भी चुनाव के परिणाम को पलटने के लिए काफी है।
न्यायिक साख का संकट और विपक्ष को सीधी चेतावनी
आर. के. सिंह का पत्र देश की शीर्ष अदालत की भूमिका पर भी तीखा प्रहार करता है। वे स्पष्ट लिखते हैं कि SIR को दी गई न्यायिक मान्यता और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर निर्णय में देरी से सुप्रीम कोर्ट की साख को उतना ही गहरा आघात पहुंचा है, जितना आपातकाल के दौर में एडीएम जबलपुर फैसले से पहुंचा था।
संसद में महाभियोग की सीमाओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने विपक्षी दलों को चेताया है कि वे केवल बयानों तक सीमित न रहें। विपक्ष ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध सीधे आपराधिक मामले दर्ज कराए और तब तक किसी भी चुनाव में भाग न ले, जब तक कि मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्त इस्तीफा न दें और सीजेआई की मौजूदगी वाली पारदर्शी चयन समिति बहाल न हो। साथ ही, लंबित अपीलों के बीच कराए गए चुनावों को निरस्त करने और पूरी तरह हैक-प्रूफ न होने के कारण EVM की जगह बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग उठाई जाए।
‘इंडिया स्पीक डेली‘ का संपादकीय दृष्टिकोण:
लोकतंत्र केवल मतदान के दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि संस्थाओं की शुचिता, निष्पक्षता और कानून के शासन का निरंतर अभ्यास है। जब तंत्र स्वयं को कानून और संविधान से ऊपर समझने लगे और सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम की आड़ में गरीबों, वंचितों और युवाओं के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाला जाने लगे, तो उसे प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि ‘लोकतांत्रिक राजद्रोह’ कहा जाएगा।
आर. के. सिंह के पत्र और महाराष्ट्र सीईओ एस. चोक्कलिंगम की आपत्तियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यह लड़ाई किसी दल विशेष की नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य के हर उस नागरिक के संवैधानिक वजूद की है, जिसके पास सत्ता से सवाल करने का एकमात्र हथियार उसका ‘वोट’ है। यदि देश का प्रबुद्ध वर्ग, न्यायपालिका और जागरूक नागरिक अब भी नहीं जागे, तो डिजिटल फाइलों की आड़ में लोकतंत्र को दफन कर दिया जाएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अब पद छोड़ना ही होगा; इसके अलावा संस्थागत विश्वसनीयता को बचाने का कोई दूसरा रास्ता शेष नहीं है।
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बहुत तथ्यपरक लेख है।
👍🚩🙏
जय सियाराम हर हर महादेव!
चुनाव आयोग अब पूरी तरह से भाजपा का बंधुआ मजदूर की तरह कार्य करता दिख रहा है।
संपादकीय में आप संक्षेप में सब बता देते हैं 🙏🙏 धन्यवाद