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India Speak Daily > वैचारिकी > संघवाद > हाँक सके सो हाँक!
संघवाद

हाँक सके सो हाँक!

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 9 Min Read
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9 Min Read
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शंकर शरण। 1970 के दशक वाले सोवियत रूसी समाज की स्थिति जैसी हालत लगती है। जब वहाँ नेता नियमित झूठ से ही अपने देश को ‘उत्साहित‘ यानी भ्रमित रखते थे। वहाँ किसी बात या स्थिति की आलोचना अथवा परीक्षण का कोई स्थान न था। फलतः समय के साथ नेतागण भी अपने ही प्रोपेगंडा के शिकार खुद बन चुके थे! इसीलिए जब झूठी नीतियों की विफलता से बनी चुनौती की स्थिति सामने आई, तब नेता डफर साबित हुए।‌ उस किंकर्तव्यविमूढ़ता का परिणाम सोवियत विघटन (1991) भी था।

भारत का समाज, संस्कृति, नैतिकता, शिक्षा, तथा अंतरराष्ट्रीय स्थिति — इन सब में जितनी ही हालत गिर रही है, उतनी ही यहाँ जिम्मेदार लोग ऊँची-ऊँची हाँक रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय देखें:  पिछले साल ‘आपरेशन सिंदूर’ भारत की भूल हुई लगती है। जिस ने पहलगाम में अंदरूनी जिहाद की लीपा-पोती करके उसे मात्र पाकिस्तानी कारस्तानी बताकर, फिर पाकिस्तान पर हमला बोल कर, फिर एकाएक बंद कर, लगातार तीन गलतियाँ कीं! जो अभी साफ दिखा, जब बचे-खुचे कश्मीरी हिन्दुओं को भी वहाँ से भागने का खुला नोटिस मिला। यह पाकिस्तान ने नहीं, देसी मुस्लिमों ने किया। पर ‘घर में घुस कर मारने’ के हँकैतों ने इस की अनदेखी कर मामला रफा-दफा मान लिया।

यह असली समस्याओं से मुँह चुराने का उदाहरण है। तमाम इस्लामी उग्रवाद, विस्तारवाद को पाकिस्तान की करतूत बताकर अपनी जिम्मेदारी छिपाना। इसी तरह अन्य समस्याओं में भी लोगों को भ्रमित या उलझा कर मुख्यतः वोट साधने की कोशिश। जो प्रायः सफल भी होती है। पर ऐसा कब तक चलेगा?

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असलियत काफी कुछ जाहिर हो चुकी है कि भारत की उस भूल के बाद ही पाकिस्तान की उपेक्षित हालत एकाएक बदली। उसे सहानुभूति मिली, और अमेरिकी, अरब, तुर्क सहयोग से उस की ताकत बढ़ी। ऐसा यहाँ शासकों में सूझ-बूझ की कमी से हुआ। वे एक ही तरह की घटनाओं पर अलग-अलग प्रतिक्रिया करते या चुप रहते हैं। बार-बार ऐसा दिखने से किसी नीति के बदले जैसे-तैसे चलने और किंकर्तव्यविमूढ़ता की झलक अधिक मिलती है।

ईमानदारी और गुणवत्ता पर तो अब अधिक कहने की भी जरूरत नहीं। नियुक्तियों के लिए योग्यता को महत्वहीन बना देना; निरंतर बिल्डिंगें, मूर्तियाँ, सेल्फी-प्वायंट जैसे अनावश्यक निर्माण; कुछ भी तोड़ कर पुनर्निर्माण; मीडिया को पंगु बनाना; सांसदों को बंधुआ; चुनावी खर्च में जानबूझ कर बेहिसाब वृद्धि; राजकीय पदों, संस्थानों की पार्टी-संपत्ति जैसी बंदर-बाँट; नियुक्त लोगों द्वारा निजी लालसा में धाँधली, या धाँधली की अनदेखी; आदि अब देश भर में काफी कुछ नीचे तक लोगों की भी नजर में आ चुका है। खुद संघ-परिवार के आदर्शवादी लोग उस की मार झेल रहे हैं। उन्हें भी चढ़ावा दिए बिना टापने को मजबूर होना पड़ रहा है।

फलत: एक ओर अपवाद-स्वरूप बचे विद्वान भी निराश्रय हैं। उन्हें कोई स्थान नहीं, जहाँ वे अर्जित जानकारी, अनुभव, आदि जिज्ञासु सुपात्रों को दे सकें। दूसरी ओर,  मेधावी विद्यार्थी भी कोरे प्रोपेगंडिस्टों की तोतारटंत सुन रहे हैं। इस तरह, शिक्षक बिना विद्यार्थी के, और विद्यार्थी बिना शिक्षक के — दोनों असहाय — अकादमिक क्षेत्र की ऐसी दयनीय गति पिछले किसी राज में बदस्तूर नहीं थी!

इस प्रकार, संघ परिवार ने रामनाथ गोयनका का अविश्वास सही साबित किया। उन्होंने चार दशक पहले अरुण शौरी को कहा था कि संघ परिवार नेताओं की ‘सादगी, नि:स्वार्थता’ से अभी प्रभावित मत हो — क्योंकि “अभी उन के पास सादगी के सिवा चारा ही क्या है!  उन्हें तमगा तब देना जब इन के हाथ में सत्ता आ जाए।”  वरना, सत्ताविहीन की सादगी क्या, दरिद्र की उदारता क्या, दुर्बल की क्षमाशीलता क्या!

सो, अब ‘चाल, चरित्र, चेहरा’ का मुहावरा कोई संघ-भाजपा नेता भूल से भी नहीं दोहराता! क्यों?

इसीलिए कि सब को दिख चुका कि वह मुहावरा केवल प्रचार के लिए था। उस में कोई गंभीरता नहीं थी। चरित्र के मामले में पक्ष-विपक्ष तमाम दल लगभग एक समान रहे हैं। मुख्य लड़ाई लूट की राजनीति में केवल अपने हिस्से की है। संघ-भाजपा भगवा चोला फेंक नीला, काला कुछ भी पहनने को तैयार दिखते हैं, यदि कुर्सी उसी से बनी रहे। समाज, संस्कृति, चरित्र, जवाबदेही कोई और देखे — यह जैसे सर्वदलीय भावना बन चुकी है! यह लज्जाजनक स्थिति हर दीदावर देख सकता है।

अकादमिक बौद्धिक जगत की दुर्दशा की पूरी तस्वीर दिखाना विकट काम है। पर जो भी बिन्दु लें: भारतीय भाषा-साहित्य की हालत, प्रमाणपत्रों की असली मूल्यवत्ता, संस्थानिक पदधारियों की वास्तविकता, शिक्षा के उद्देश्य घूरे पर फेंक दलीय, उत्कोचीय लाभ उठाना; योग्यता निरपेक्ष आरक्षण बढ़ाते जाना; शैक्षिक संस्थाओं को दलगत, जातिगत दुर्भाव से विषाक्त करना;  तथा उन सब से सीधे प्रभावित होने वाले क्षेत्र यानी साहित्य, कला, चिंतन, लेखन, शोध, पत्र-पत्रिकाएं, अकादमिक जर्नल, टीवी चैनल तक — यह सब अधिकाधिक दुर्दशा की ओर जा रहे हैं। कुछ का तो अस्तित्व तक समाप्त होने पर है।

जैसे, देश में किसी भाषा में अब अखिल भारतीय पहचान वाली अकादमिक या साहित्य पत्रिका नहीं रह गई। या नाम की बची है। उन में भी प्रोपेगंडा और घिसे-पिटे नारों का उच्छिष्ट अधिक रहता है। यह देश की कल्पना और मेधा को भूखों मार डालने समान है! जो मुख्यत: राजकीय यानी दलीय नीतियों के कारण हो रहा है। शेष सब कारण उसी से बनते हैं।

जरा सोचें, सवा अरब आबादी, भरपूर संसाधन, सुसंस्कृत भाषाओं से भरे देश में एक भी देशव्यापी हिन्दी या अंग्रेजी पत्रिका, या अकादमिक जर्नल नहीं जहाँ कोई कविता अथवा शोध-चिंतनपरक लेख प्रकाशित हो सके! ऐसे विचार-दरिद्र देश के नेता विश्वगुरु होने की डींग हाँकते हैं। जो एंडरसन की कहानी वाले राजा के ही साकार रूप हैं।

अब इक्के-दुक्के अनजान से अकादमिक जर्नल बचे हैं। विश्वविद्यालयों के अग्रणी छात्र भी उन का नाम तक शायद ही जानते हैं। जबकि वैसे जर्नल यहाँ पचास वर्ष पहले भी अनेकानेक थे। ब्रिटिश राज में तो ‘एपीग्राफिया इंडिका’, ‘मॉडर्न रिव्यू’, ‘एशियाटिक सोसायटी जर्नल’, आदि की अंतरराष्ट्रीय पूछ थी। अब हम अकादमिक-बौद्धिक क्षेत्र में किसी गिनती में नहीं हैं। अपनी गिनती में भी नहीं! किसी भी देशवासी से पूछ कर देखिए:  क्या वह आज के चार भारतीय विद्वान, या इंटेलेक्चुअल का नाम भी बता सकता है जिसे सब जानते हों?

पर यहाँ किसी भी विश्वविद्यालय या अकादमी में जाकर देखें। भारतीय ज्ञान पर ढोल बजाना मुख्य गतिविधि हो गई है! किसी महान ग्रंथ या नई पुस्तक, किन्हीं ज्ञानी, कोई शोध, महत्वपूर्ण रचना, आदि के अध्ययन अथवा उन के प्रसार का उस में कोई स्थान नहीं है। सारी गतिविधियाँ मुख्यतः आत्म-प्रचार, दल-प्रचार, जिस-तिस को कोसने, जहाँ-तहाँ मूर्तियाँ लगा देने, तोतारटंत एवं नियमित भक्ति साझा करने तक सीमित है। उन गतिविधियों में कुछ विद्वत-जन भी दिख जाते हैं। पर तमाम क्रियाकलापों का आम चरित्र वही है।

यही सब ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ का ढोल बजाने में हो रहा है। जिस का नाम तक किसी भारतीय भाषा में नहीं रखा जा सका — ऐसी बौद्धिक दरिद्रता! इस ढोलबजाव परियोजना का नाम है: ‘आई.के.एस.’। इस का एस. है ‘सिस्टम’, जिस का अनुवाद बनाया ‘परंपरा’, मानो दोनों शब्द पर्याय हों। ऐसे प्रणेता पुरोहित ही आज देश की शिक्षा के सर्वेसर्वा हैं। खुदा खैर करे!

यह 1970 के दशक वाले सोवियत रूसी समाज की स्थिति जैसी हालत लगती है। जब वहाँ नेता नियमित झूठ से ही अपने देश को ‘उत्साहित’ यानी भ्रमित रखते थे। वहाँ किसी बात या स्थिति की आलोचना अथवा परीक्षण का कोई स्थान न था। फलतः समय के साथ नेतागण भी अपने ही प्रोपेगंडा के शिकार खुद बन चुके थे! इसीलिए जब झूठी नीतियों की विफलता से बनी चुनौती की स्थिति सामने आई, तब नेता डफर साबित हुए।‌ उस किंकर्तव्यविमूढ़ता का परिणाम सोवियत विघटन (1991) भी था।

आज भारतीय समाज भी कुछ उसी तरह की आत्म-प्रवंचना का शिकार लग रहा है। वैसी ही असहाय दिशाहीनता भी झलक रही है। वरना सर्वोच्च भारतीय नेताओं में इतने ‘दिव्यांग’ क्यों दिखते हैं?

साभार-मूल लिंक

Courtesy Desk September 22, 2026
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TAGGED: Modi goverment, Shankar Sharan, shankar sharan and sangh, shankar sharan story

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1 Comment
  • Avatar Anonymous says:
    September 27, 2026 at 6:19 pm

    Shankar Saran Ji ko Namaskar, unhone bahute hi achhe se aaj ki satithi ko kam sabdon main samjhaya hai.

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