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India Speak Daily > समाचार > न्यायपालिका > चुनाव आयोग में ‘साइबर तख्तापलट’: सीमा खन्ना, अमेरिकी सॉफ्टवेयर और लोकतंत्र के अपहरण का पूरा कच्चा चिट्ठा!
न्यायपालिकासंपादकीय

चुनाव आयोग में ‘साइबर तख्तापलट’: सीमा खन्ना, अमेरिकी सॉफ्टवेयर और लोकतंत्र के अपहरण का पूरा कच्चा चिट्ठा!

ISD News Network
By ISD News Network 13 Min Read
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इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में चुनाव आयोग पर संदेह के बादल पहले भी उठे हैं, लेकिन निर्वाचन सदन के भीतर से जो बदबूदार सच अब फाइलों और डिजिटल कोड्स से निकलकर बाहर आया है, उसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है।

यह विवाद अब केवल दो चुनाव आयुक्तों की प्रशासनिक नाराजगी या राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर स्वतंत्र भारत के चुनावी तंत्र के ‘साइबर तख्तापलट’ का सनसनीखेज मामला बन चुका है। पर्दे के पीछे से नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) से निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्ति पर लाई गईं आईटी महानिदेशक (DG-IT) डॉ. सीमा खन्ना की संदिग्ध भूमिका और अमेरिका से मंगाए गए एक अनधिकृत ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ सॉफ्टवेयर के जरिए जो खेल खेला गया, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के इशारे पर जनमत को हाइजैक करने के लिए तकनीक को हथियार बना लिया गया।

जिस देश का आम नागरिक कतारों में लगकर यह समझता है कि उसका वोट सरकार चुन रहा है, पर्दे के पीछे उसी वोटर की पहचान और अधिकार को बिना किसी वैधानिक मंजूरी के विदेशी कोड्स और दिल्ली के केंद्रीय सर्वर के हवाले कर दिया गया। इस पूरे बहुआयामी षड्यंत्र को परत-दर-परत और बिंदुवार समझना हर उस नागरिक के लिए जरूरी है जो इस देश में संविधान और लोकतंत्र की सांसों को बचाए रखना चाहता है:

*अमेरिका से आयातित सॉफ्टवेयर और समानांतर सत्ता: सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि मतदाता सूचियों से विसंगतियां छांटने के नाम पर अमेरिका से एक थर्ड-पार्टी ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ सॉफ्टवेयर समानांतर तौर पर चलाया गया। इस सॉफ्टवेयर का न तो कोई वैधानिक मैनुअल जारी हुआ और न ही चुनाव आयोग के दोनों साथी आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) से इसकी कोई आधिकारिक मंजूरी ली गई। इस अनधिकृत सॉफ्टवेयर के जरिए जमीनी हकीकत को दरकिनार कर डेटाबेस से मनमाने ढंग से मतदाताओं की पहचान को प्रभावित किया गया।

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*सीमा खन्ना और ‘ECINet’ का केंद्रीकृत जाल: जनवरी 2026 में निर्वाचन आयोग के 40 से अधिक अलग-अलग पोर्टलों और ऐप्स को मिलाकर ‘ECINet’ नाम से एक नया ढांचा तैयार किया गया। आरोप है कि डीजी (आईटी) डॉ. सीमा खन्ना की देखरेख में इस एकीकरण के जरिए राज्य और जिला स्तर के डेटाबेस का पूरा नियंत्रण दिल्ली स्थित आईटी मुख्यालय में खींच लिया गया। इस कदम ने मतदाता सूची के उस विकेंद्रीकृत संघीय ढांचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जो भारत की चुनावी सुरक्षा की पहली गारंटी था।

*स्थानीय अधिकारियों (ERO) के अधिकार छीने और ‘रोलबैक’ का अंत: जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का कानूनी अधिकार जमीनी स्तर के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) के पास होता है। सॉफ्टवेयर के बैक-एंड में ऐसे कोड लागू किए गए कि स्थानीय ERO के पास से सुधार या ‘रोलबैक’ (Rollback) का विकल्प ही पूरी तरह छीन लिया गया। यदि दिल्ली के सॉफ्टवेयर ने किसी मतदाता को सूची से बाहर फेंक दिया, तो स्थानीय स्तर पर उसे ठीक करने की सारी शक्तियां पंगु बना दी गईं।

*गोवा के 97 वोटरों की मिसाल और 8 अनसुने ईमेल: इस तकनीकी मनमानी का सबसे पुख्ता सबूत गोवा से सामने आया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल किए गए 97 वैध मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. संजय गोयल ने केंद्रीय चुनाव आयोग (सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश भारती और आईटी डीजी सीमा खन्ना) को महज 7 दिनों में 8 बार ईमेल भेजे। सॉफ्टवेयर में रोलबैक का विकल्प न होने और दिल्ली मुख्यालय द्वारा इन 8 ईमेल पर साधी गई कुंभकर्णी चुप्पी के कारण देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश के बावजूद वे 97 नागरिक अपने वोट से वंचित रह गए।

*10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्तियां: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच फाइलों पर 14 बार औपचारिक और कड़े विरोध दर्ज कराए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज की गईं।

The Election Commission of India is under fire like never before.

The SIR has struck 13 crore names off draft rolls, putting the EC at the centre of intense public debate over its role in deciding who gets to vote — and who doesn’t.

HOWEVER, what nobody knew: through that same… pic.twitter.com/CC1QIdqk1L

— Ritika Chopra (@RitikaChopra__) September 23, 2026

*फॉर्म-6 में अवैध बदलाव और कैबिनेट सचिव को गुहार: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर नए मतदाताओं के पंजीकरण फॉर्म (फॉर्म-6) में बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के बदलाव थोपे गए, जिसे आयुक्त संधू ने आधिकारिक फाइल नोटिंग में सीधे तौर पर ‘अनाधिकृत और अवैध’ (Unauthorised and Illegal) करार दिया। राज्य स्तर के डेटाबेस के दिल्ली में हो रहे ‘क्रमिक केंद्रीकरण’ पर साथी आयुक्तों ने कड़ा ऐतराज जताते हुए सीधे देश के कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी।

*‘फुल कमीशन’ को दरकिनार कर एकतरफा आदेश: अप्रैल 2026 में दोनों आयुक्तों ने आंतरिक नोट लिखकर यह पर्दाफाश किया कि निर्वाचन आयोग के नाम पर कई बड़े नीतिगत परिपत्र और आदेश ‘पूरे आयोग’ (Full Commission) की अनिवार्य वैधानिक मंजूरी के बिना ही मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर से सीधे जारी किए जा रहे हैं। यहाँ तक कि 30 जुलाई को दोनों आयुक्तों ने एकजुट होकर अधिकारियों के काम के मनमाने बंटवारे वाले प्रशासनिक आदेश को निरस्त (Rollback) कर दिया, क्योंकि वह भी बिना उनकी सहमति के थोपा गया था।

*आईटी ऑडिट का दबाया गया प्रस्ताव: 29 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने पूरे आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर के एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तकनीकी ऑडिट का लिखित प्रस्ताव रखा था, जिसका 13 जुलाई को सुखबीर सिंह संधू ने पुरजोर समर्थन किया। लेकिन इस प्रस्ताव को मुख्य चुनाव आयुक्त स्तर पर दबा दिया गया ताकि सॉफ्टवेयर के भीतर चल रहे बैक-एंड खेल पर पर्दा पड़ा रहे।

*Gen-Z (युवा) वोटरों के पंजीकरण पर अड़ंगा: खुलासे का एक और काला अध्याय यह है कि जनवरी 2024 से नई पीढ़ी—’Gen-Z’—के पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया पर सीईसी द्वारा अड़ंगा लगा दिया गया था। दोनों साथी आयुक्त इस रोक के सख्त खिलाफ थे। सवाल उठता है कि देश के युवाओं और नई सोच वाली पीढ़ी से आखिर सत्ता का कौन-सा खेमा खौफजदा था, जिसे रोकने के लिए लाखों युवाओं का मताधिकार छीना गया?

*ममता बनर्जी का विस्फोट और दोबारा चुनाव की मांग: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुला आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया के नाम पर अकेले बंगाल में 92 लाख मतदाताओं के नाम अवैध रूप से काट दिए गए।

उन्होंने ज्ञानेश कुमार और आईटी डीजी सीमा खन्ना की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की। साथ ही दावा किया कि जनवरी 2025 के बाद SIR के साए में बंगाल, बिहार और हरियाणा में हुए तमाम चुनाव असंवैधानिक हैं, लिहाजा पुरानी वोटर लिस्ट के आधार पर वहां दोबारा चुनाव कराए जाएं। उन्होंने अलीपुर स्ट्रांग रूम की केवल उसी मंजिल पर लगी आग पर भी गंभीर सवाल उठाए जहाँ ईवीएम और रिकॉर्ड रखे थे।

*राहुल गांधी का हमला—’वोट चोरी से कानून चोरी’ और फॉरेंसिक ऑडिट: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और कहा कि यह केवल वोट चोरी नहीं बल्कि ‘कानून चोरी’ है—क्योंकि फर्जी जनादेश से बनी सरकार के बनाए सारे कानून भी नाजायज हो जाते हैं। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को मोदी-शाह के खिलाफ ‘सरकारी गवाह’ बनने की सलाह दी। साथ ही एंटी-इंकम्बेंसी के अचानक गायब होने पर सवाल उठाते हुए मांग की कि ERO-Net और ECINet का स्वतंत्र ‘साइबर फॉरेंसिक ऑडिट’ कराया जाए और संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए।

*बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका और 14 आदेशों को चुनौती: इस दस्तावेजी खुलासे के तुरंत बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँच गया है। अदालत में रिट याचिका दायर कर सीईसी द्वारा दोनों आयुक्तों की आपत्तियों को दरकिनार कर जारी किए गए सभी 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द (Quash) करने, महाराष्ट्र की SIR प्रक्रिया को तत्काल रोकने और चुनाव स्थगित कर स्वतंत्र न्यायिक जांच कमेटी गठित करने की मांग की गई है।

#BREAKING | Plea In Bombay High Court To Quash 14 Orders Passed By CEC Gyanesh Kumar Despite Objections Of 2 ECs |@NarsiBenwal

The petitioners also question the Maharashtra SIR process.#ElectionCommissionofIndia #ECI #MaharashtraSIRhttps://t.co/YdAoN75JyT

— Live Law (@LiveLawIndia) September 24, 2026

*सुप्रीम कोर्ट में जजों का बंटवारा: ‘मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ (जिसने चयन समिति से CJI को बाहर कर कार्यपालिका को 2:1 का बहुमत दिया) की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों—जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा—की राय बंट चुकी है। जस्टिस दत्ता की वह ऐतिहासिक टिप्पणी आज गूंज रही है कि “क्रिकेट मैच में जब कप्तान ही अंपायर चुनेगा, तो अंपायर के फैसलों पर हमेशा संदेह रहेगा”। यह मामला अब 5 जजों की संविधान पीठ के पास है।

*धारा 18 का अभूतपूर्व ‘सुरक्षा कवच’: 2023 के कानून की धारा 18 के तहत चुनाव आयुक्तों को उनके फैसलों के खिलाफ किसी भी अदालत में सिविल या क्रिमिनल केस से जो आजीवन कानूनी सुरक्षा (Immunity) दी गई है, वह सवालों के घेरे में है। जब राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री तक को यह छूट नहीं है, तो चुनाव आयुक्तों के लिए ऐसा सुरक्षा चक्र क्यों गढ़ा गया? क्या यह पहले से पता था कि भविष्य में ऐसे अवैध कृत्य होंगे जिनके लिए जेल जाने से बचने की ढाल की जरूरत पड़ेगी?

यह पूरा घटनाक्रम किसी साधारण प्रशासनिक विवाद का दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक ऐसा भयावह आईना है जो बताता है कि किस तरह विदेशी सॉफ्टवेयर, संस्थागत मिलीभगत और आईटी नेटवर्क के केंद्रीकरण के जरिए लोकतंत्र के सबसे पवित्र अनुष्ठान को भीतर से खोखला कर दिया गया। जब अंपायर ही संदिग्ध हो जाए, तकनीकी व्यवस्था ERO के हाथ बांध दे और युवा वोटरों के नाम डिजिटल कोड्स के जरिए दबा दिए जाएं, तो यह व्यवस्थागत चुप्पी देशद्रोह से कम नहीं है। अब वक्त आ गया है कि देश की न्यायपालिका और सजग नागरिक इस पूरे साइबर चक्रव्यूह की तकनीकी और न्यायिक चीरफाड़ करें, वरना मतपेटी में बंद होने वाला हर जनादेश सत्ता की साजिशों का केवल एक बंधक बनकर रह जाएगा।

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1 Comment
  • Avatar Anonymous says:
    September 27, 2026 at 8:51 pm

    Sandeep Ji Ram Ram, ye sara khel ACYPL ki training aur November 2014 main BJP ke kuch leaders China CPC ke school main classes laga ke aye hain ussi ka prinam lag raha hai. Sayad ish sab ki tayari inhone 2014 main ate hee kar li thi ki ab hame kisi nhi trah se hamesha satta main bane rahna hai.

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