इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो। प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत ने 3 सितंबर 2026 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि केस क्राइम संख्या 58/2026 (थाना झूँसी) की विवेचना केवल दर्ज आरोपों तक सीमित नहीं रह सकती। जांच अधिकारी (IO) का यह कानूनी दायित्व है कि वह आरोपी पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए उन सभी सबूतों की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच करे।
इसी न्यायिक आदेश के अनुपालन में, 14 सितंबर 2026 को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि की ओर से अधिवक्ताओं ने झूँसी थाने के विवेचक को 324 पृष्ठों का विस्तृत परिवेदन, 23 अनुलग्नक और सभी डिजिटल साक्ष्यों से युक्त पेन ड्राइव सौंपी।
इस कदम से अब विवेचना का रुख पूरी तरह बदल चुका है। अब जांच इस बात की होगी कि जगद्गुरु ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज एवं उनके शिष्य स्वामी प्रत्यक्चैतन्य मुकुंदानंद गिरि को बदनाम करने के लिए किन-किन लोगों ने मिलकर फर्जी सबूत गढ़े और कानून का दुरुपयोग किया।
पूरी पृष्ठभूमि: माघ मेले से शुरू हुआ षड्यंत्र का खेल
इस पूरे मामले की सच्चाई को समझने के लिए घटनाक्रम को सिलसिलेवार जानना आवश्यक है:
1. माघ मेला और कोरे कागजों पर धोखे से दस्तखत (जनवरी 2026)
जनवरी 2026 में प्रयागराज माघ मेले के दौरान आशुतोष ब्रह्मचारी (उर्फ आशुतोष पांडे) ने दो निर्धन बटुकों को यज्ञ के बहाने बुलाया। ‘दक्षिणा कार्ड’ बनवाने और आर्थिक मदद का झांसा देकर इन बटुकों और उनके परिवार से सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। बाद में इन्हीं कोरे कागजों पर मनगढ़ंत कहानी लिखकर शंकराचार्य जी और उनके शिष्य के खिलाफ गंभीर आरोप मढ़ दिए गए।
2. अपहरण, बंधक बनाना और झूठी एफआईआर (फरवरी 2026)
जब षड्यंत्र को आगे बढ़ाना था, तब स्कूल में परीक्षा दे रहे बटुक को बहला-फुसलाकर ले जाया गया और उसके पिता को कई दिनों तक कमरे में बंधक बनाकर रखा गया। दबाव और भय के साए में 21 फरवरी 2026 को कोर्ट के आदेश के जरिए झूँसी थाने में पॉक्सो की संगीन धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई। टीआरपी की होड़ में कुछ टीवी चैनलों पर नाबालिग की पहचान और आवाज उजागर करके कानून की धज्जियां उड़ाई गईं। इस बीच, पूज्य शंकराचार्य जी और उनके शिष्य को अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी, जहाँ से उन्हें अग्रिम जमानत मिली।
3. खुद षड्यंत्रकारी के मुंह से सच का खुलासा (जून 2026)
झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है। 9 से 14 जून 2026 के बीच मुख्य शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने खुद मीडिया और सोशल मीडिया पर कई चौंकाने वाले खुलासे किए:
*उसने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उसने यह फर्जी मुकदमा स्वामी रामभद्राचार्य के उत्तराधिकारी रामचंद्र दास (जय मिश्रा) और कुछ प्रभावशाली अधिकारियों के दबाव में दर्ज कराया था।

*पत्रकार संजय तेली द्वारा सार्वजनिक की गई व्हाट्सएप चैट में जय मिश्रा द्वारा आशुतोष को केस दर्ज कराने और अधिकारियों से फोन कराने के सीधे निर्देश सामने आए।

*एनडीटीवी पर आशुतोष ने यहां तक कह दिया कि यदि शंकराचार्य जी उससे बात कर लें, तो वह केस वापस ले लेगा—जिससे साफ हो गया कि यह पूरा मुकदमा केवल सौदेबाजी और दबाव बनाने के लिए किया गया था।
4. खोजी कैमरे पर पीड़ित परिवार का सच (जुलाई 2026)
7 जुलाई 2026 को दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में पूरा सच देश के सामने आ गया। कैमरे पर बटुक, उसके पिता और चाचा ने साफ कहा:
*वे शंकराचार्य जी को जानते तक नहीं हैं और न ही कभी उनके आश्रम में रहे हैं।
*उनके साथ कभी कोई गलत काम नहीं हुआ।
*आशुतोष ब्रह्मचारी ने धोखे से सादे कागजों पर दस्तखत कराए थे और उन्हें बंधक बनाकर झूठी गवाही देने के लिए मजबूर किया गया था।
निष्कर्ष: सत्य की विजय और न्याय की अनिवार्यता
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात शीशे की तरह साफ है—पॉक्सो जैसे कड़े और संवेदनशील कानून को सनातन धर्म के सर्वोच्च पद को लांछित करने के लिए एक औजार बनाया गया था। किंतु, बटुक के परिवार का सच, खुद आशुतोष के बदलते बयान और अब पुलिस को सौंपे गए अकाट्य डिजिटल सबूतों ने इस पूरे षड्यंत्र की कमर तोड़ दी है।
अदालत के आदेश के बाद अब गेंद विवेचना अधिकारी के पाले में है। अब पुलिस को केवल आरोपों की नहीं, बल्कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत झूठे सबूत गढ़ने (धारा 229, 230, 248), आपराधिक षड्यंत्र (धारा 61(2)) और अपहरण व अवैध परिरोध (धारा 127, 137) के तहत षड्यंत्रकारियों की भूमिका की गहन जांच करनी होगी।

सत्य को परेशान किया जा सकता है, पराजित नहीं। पूज्य शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज की शुचिता और गरिमा इस अग्निपरीक्षा से और अधिक निखरकर सामने आई है। अब समय आ गया है कि कानून का दुरुपयोग करने वाले सूत्रधारों को ऐसी सजा मिले, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति धर्म और कानून के पवित्र मंचों को अपनी दुर्भावना का अखाड़ा न बना सके।

जय सियाराम हर हर महादेव !सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहि!