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India Speak Daily > समाचार > विदेश > मेरठ हाशिमपुरा दंगों पर फैसला आ गया है क्या आपको मीडिया ने बताया ?
विदेश

मेरठ हाशिमपुरा दंगों पर फैसला आ गया है क्या आपको मीडिया ने बताया ?

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 15 Min Read
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India Speaks Daily - ISD News
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तुफैल चतुर्वेदी। अभी मेरठ दंगे का चर्चित हिस्सा बने हाशिमपुरा पर न्यायलय का फैसला आया है। न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एन.जी.ओ., मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता एक से बढ़ कर एक मरकट-नृत्य में संलग्न हो गए हैं। मेरे विचार से इस विषय की चर्चा करने के साथ इसी तरह के दंगे और उस पर बरसों चले हाहाकार की समवेत चर्चा उपयुक्त है। गोधरा में ट्रेन जलाने के बर्बर, पैशाचिक हत्याकांड के कारण उपजे आक्रोश से गुजरात के दंगे हुए। इस दंगे में प्रशासन, पुलिस प्रशासन पर मुसलमानों के प्रति दुर्भावना रखने और हिन्दुओं के पक्ष में होने के आरोप लगाये हैं। आइये तत्कालीन घटना कर्म को एक बार दैनंदिन रूप से याद कर लिया जाये।

साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर S-6 में विश्व हिन्दू परिषद् के कार-सेवक यात्रा कर रहे थे। 27 फरवरी 2002 की सुबह 7:30 बजे के लगभग इस बोगी को निशाना बना कर गोधरा के मुसलमानों द्वारा हिन्दू विरोधी नारों के बीच आग लगा दी। आग लगाने वालों की संख्या 1500 के क़रीब थी। इस अग्निकांड में 72 से अधिक लोग जला कर मार दिए गए। जिसमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। कोई हिंदू यात्री बोगी से बाहर ना निकल पाए इसीलिए योजना के अनुसार उन पर पत्थर भी बरसाए जाने लगे। गुजरात पुलिस ने भी अपनी जांच में ट्रेन जलाने की इस वारदात को आईएसआई की साजिश करार दिया, जिसका उद्देश्य हिन्दू कारसेवकों की हत्या कर राज्य में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करना था।

मुख्‍यमंमंत्री नरेंद्र मोदी शाम 4.30 बजे गोधरा पहुंचे और जली हुई बोगियों का निरीक्षण किया। उसके बाद संवाददाता सम्‍मेलन में नरेंद्र मोदी ने कहा कि गोधरा की घटना बेहद दुखदायी है, लेकिन लोगों को कानून व्‍यवस्‍था अपने हाथ में नहीं लेनी चाहिए। सरकार उन्‍हें आश्‍वस्‍त करती है कि दोषियों के खिलाफ महत्‍वपूर्ण कार्रवाई की जाएगी। उसी दिन गोधरा व उसके आसपास कर्फ्यू लागू कर दिया गया। राज्‍य सरकार ने केंद्र सरकार से गुजरात में पैरा मिलिट्री फोर्स की 10 कंपनियां और साथ ही रेपिड एक्‍शन फोर्स की चार अतिरिक्‍त कंपनी बहाल करने का अनुरोध किया।

दंगा भड़कने से रोकने के लिए सुरक्षा के लिहाज से बड़े पैमाने पर संदिग्‍ध लोगों को गिरफ्तार किया गया। जिन 217 लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें 137 हिंदू और 80 मुसलमान थे। गोधरा के बाद पहले ही दिन गुजरात के संवेदनशील व अतिसंवेदनशल क्षेत्र में 6000 पुलिस के जवानों की तैनाती की गई। स्‍टेट रिजर्व पुलिस फोर्स की 62 बटालियन थी, इसमें 58 स्‍टेट रिजर्व पुलिस फोर्स और चार सेंट्रल मिलिट्री फोर्स की बटालियन शामिल थी। गुजरात की मोदी सरकार ने सभी 62 बटालियन को संवेदनशील क्षेत्र में तैनाती के आदेश दे दिए। गोधरा से लौटने के बाद मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात 11 बजे अपने घर पर वरिष्‍ठ अधिकारियों की बैठक बुलाई और कानून व सुरक्षा की स्थिति का जायजा लिया। मोदी ने अधिकारियों से कहा कि सेना के जवानों की मदद भी लेनी पड़े तो लें लेकिन कानून व्‍यवस्‍था को चरमराने न दें। स्‍थानीय आर्मी हेडक्‍वार्टर ने जवाब दिया कि उनके पास सेना की अतिरिक्‍त बटालियन नहीं है। युद्ध जैसे हालात को देखते हुए सभी बटालियन को पाकिस्‍तान से सटे गुजरात बॉर्डर पर लगाया गया है। सेना की बटालियन उपलब्‍ध न होने के कारण गुजरात सरकार ने अपने पड़ोसी राज्‍य महाराष्‍ट्र, मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान से अतिरिक्‍त पुलिस बल की मांग की, लेकिन कांग्रेसी सरकारों ने गुजरात की कोई मदद नहीं की।

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संपादकीय…पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में ‘खूनी चुनाव’, बेकाबू जनआक्रोश और पाकिस्तान का कबूलनामा !

दिग्विजय सिंह उस वक्‍त मध्य प्रदेश, अशोक गहलोत राजस्‍थान और विलासराव देखमुख महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री थे। दिग्विजय सिंह व अशोक गहलोत सरकार ने यह कह कर गुजरात सरकार को पुलिस फोर्स देने से मना कर दिया कि उनके पास अतिरिक्‍त जवान नहीं हैं। विलासराव देशमुख ने थोड़े से पुलिस के जवान भेजे, जिन्‍हें कहा गया था कि स्थिति के नियंत्रित होते ही लौट आयें। नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्‍ण आडवाणी से सेना के जवानों की तैनाती का अनुरोध किया। इसके बाद रक्षा मंत्रालय अन्‍य राज्‍यों में तैनात जवानों को हवाई मार्ग द्वारा गुजरात लाया।

इस बीच नरेंद्र मोदी ने निर्देश दिया कि 6000 हाजी हज कर गुजरात लौट रहे हैं। उन्हें हर हाल में सुरक्षा प्रदान किया जाए। ये सभी हाजी गुजरात के 400 गांव व कस्‍बों से हज करने गए थे। सरकार ने सभी 6000 हाजियों को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा दिया। हालात के नियंत्रित होने और इन्‍हें सुरक्षित घर तक पहुंचाने में सरकार को 20 मार्च 2002 तक का वक्‍त लग गया लेकिन इनमें से एक को भी हिंसा का सामना नहीं करना पड़ा। सेना के जवानों को लेकर आने वाली पहली उड़ान 28 फरवरी की मध्‍य रात्रि को अहमदाबाद में उतरी। राज्‍य की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए 13 सैन्‍य टुकडि़यों को बहाल किया गया। 1 मार्च 2002: दंगाईयों को गोली मारने का आदेश दिया गया। दंगा 28 को भड़का था और उसके 24 घंटे के अंदर पहली मार्च को गुजरात सरकार के मुख्‍य सचिव ने दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया था।

2 मार्च 2002 को पुलिस की गोली से 12 हिंदू और चार मुसलमान मरे। दो मार्च को 573 दंगाइयों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें से 477 हिंदू और 96 मुसलमान थे। 3 मार्च 2002 को पुलिस ने 363 दंगाइयों को पकड़ा जिनमें 280 हिन्दू और 83 मुसलमान थे। इसी दिन फायरिंग में 10 हिंदू मारे गए। 4 मार्च को 285 लोगों को हिरासत में लिया गया। जिसमें 241 हिंदू और 44 मुसलमान थे। पुलिस फायरिंग में 4 हिंदुओं की मौत हुई। पूरे दंगे के दौरान 66,268 हिंदू और 10,861 मुसलमानों को हिरासत में लिया गया था। दंगे के शुरुआती तीन दिनों मे ही मोदी सरकार ने यह कार्रवाई की थी।

कांग्रेस और अन्य लोगों की मिलीभगत से बनी सरकार ने 11 मई 2005 में संसद के अंदर अपने लिखित जवाब में बताया था कि 2002 के दंगे में 1044 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें से 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। गुजरात दंगा पूरे आजाद भारत के इतिहास का एक मात्र दंगा है जिस पर अदालती फैसला इतनी शीघ्रता से आया है और इतने बड़े पैमाने पर लोगों को सजा भी हुई है. अगस्‍त 2012 में आए अदालती फैसले में 19 मुकदमे में 249 लोगों को सजा हुई है। जिसमें से 184 हिंदू और 65 मुसलमान हैं। इन 65 मुसलमान में से 31 को गोधरा में रेलगाड़ी जलाने और 34 को उसके बाद भड़के दंगे में संलिप्‍तता के आधार पर सजा मिली है।

तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रशासन और पुलिस ने प्राण-प्रण से दंगा रोकने का प्रयास किया और इसी कारण दंगा गुजरात के बहुत छोटे से हिस्से से आगे नहीं बढ़ पाया। इसका एक दूसरा खुला प्रमाण ये भी है कि पुलिस की गोलियों से मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक मारे गए। यदि पुलिस दंगा रोकने का प्रयास नहीं कर रही थी तो हिन्दू पुलिस की गोलियों से मारे ही कैसे गए ? फिर भी ट्रेन में लोगों को जला कर मार देने जैसे भयानक काम का पक्ष लेने में अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एनजीओ, मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता एक से बढ़ कर एक मरकट-नृत्य करते रहे । बरसों गुजरात के प्रशासनिक अधिकारियों पर मुकदमे चले। नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह सहित न जाने कितने भाजपा के अधिकारियों, विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं, संघ के लोगों पर मुकदमे चलाये गए। अब सवाल उठता है कि विदेशी फंड पर पलने वाली मीडिया, वामपंथियों, कांग्रेस, तीस्‍ता जावेद सीतलवाड़, संजीव भट्ट जैसों की बात यदि सच है तो फिर 254 हिंदुओं की हत्‍या किसने की थी ? लेकिन संच को आंच नहीं लगती देर से ही सही नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह जैसे लोग न्यायिक आयोगों द्वारा मुक़दमों से बरी कर दिए गए

अब उसी तरह के मुस्लिम दंगे पर 28 साल बाद ऐसा ही एक और फैसला आया है। उस घटना को भी जानना ठीक रहेगा। फैजाबाद न्यायालय द्वारा फरवरी 1986 में राम जन्म भूमि का असंवैधानिक रूप से लगाया गया ताला खुलवाने का आदेश देने के बाद देश के विभिन्न भागों में दंगे शुरू हो गए। मेरठ में भी मुस्लिम दंगा शुरू हो गया। जिन मित्रों को मुस्लिम दंगे शब्द से विरोध है वो कृपया अभी हाल ही में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे की जानकारी कर लें। मैं आश्वस्त हूँ कि उसकी जानकारी करने के बाद वह मेरे इन शब्दों की सत्यता से परिचित हो जायेंगे। मेरठ में अप्रैल 1987 में दंगा फैलाया गया। प्रशासन ने दंगा दबा दिया। दंगा शांत होने के बाद सुरक्षा बलों की टुकड़ियों को हटा लिया गया। 18 मई को दंगा फिर शुरू कर दिया गया। 21 मई को मेरठ के तब तक शांत इलाके हाशिमपुरा में अपने मुस्लिम मरीज को देखने गए डाक्टर अजय को उनकी कार में ही जिन्दा जल दिया गया और हाशिमपुरा, मलियाना में भी दंगा भड़क उठा। नारा ए तकबीर के नारों के बीच 23 मई 1987 को आरोप लगाया गया कि पी ए सी के 41 वीं वाहिनी के बल ने हाशिमपुरा से एक मस्जिद के बाहर चल रही सभा में से 42 लोगों को पकड़ लिया और उन्हें गोली मार दी। यहाँ यह प्रश्न उठाया जाना ही चाहिए कि कर्फ्यू लगे क्षेत्र में मस्जिद के बाहर सभा कैसे संभव थी ?

पीएसी के 19 लोगों को आरोपी बनाया गया। मुक़दमे को वादियों की मांग पर उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। ये लोग 28 बरस तक पेशियां भुगतते रहे। राष्ट्र की सेवा की शपथ लिए सामान्य आर्थिक स्थिति के ये जवान बसों, रेलों में टक्करें मारते पेशियों पर साल दर साल जाते रहे। कलंक के इस दाग को अपने माथे पर लिए, दर-दर भटकते रहे। अपने-पराये की संदेह भरी नजरें झेलते रहे। 28 बरस बाद इस घोर कष्टपूर्ण तपस्या का फल आया है और माननीय न्यायालय ने16 लोगों को बरी कर दिया गया है। 3 लोग ये बोझ अपने सीने पर रखे संसार छोड़ कर जा चुके हैं। इन 16 लोगों में समीउल्लाह नाम के मुस्लिम जवान भी हैं। उस तिरस्कार, अपमान, पीड़ा की कल्पना करें जो इन 28 वर्षों तक मुस्लिम समुदाय के समीउल्लाह को अपने समाज में झेलना पड़ा होगा।

भारत में न्याय का शासन है। वादियों की मांग पर मुक़दमे स्थानांतरित करने के बावजूद आज जब फैसला आ गया है तो प्रेस के महारथी, अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एनजीओ, मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता माननीय न्यायालय पर भी उँगलियाँ उठा रहे हैं, भौं चढ़ा रहे हैं, आँखें दिखा रहे हैं।

क्यों इस अघोरी दल को अभी भी चैन नहीं है ? क्या ये वर्ग तभी किसी बात को मानेगा जब उसकी इच्छा पर न्यायालय फैसला देगा ? ये भी एक गंभीर विचारणीय बिंदु है। पाकिस्तानी मूल के कैनेडियन लेखक, प्रतिष्ठित पत्रकार तारिक फातेह के शब्दों में इसका सबसे बड़ा कारण हिन्दू गिल्ट है। हिन्दू अपने होने से लज्जित हैं। वो अपने से, अपने सत्व से, अपनी चिति से शर्मिंदा हैं यानी लार्ड मेकॉले की शिक्षा पद्यति भरपूर सफल हुई है। अन्यथा क्या कारण है कि हिंदी के समाचार पत्र 22 मार्च के संस्करणों में पूरे पेज पर न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर सवालिया निशान लगाते हैं ? राष्ट्र विरोधी मुस्लिम प्रचार तंत्र को अनर्गल आरोप लगाने के लिए मसाला सप्लाई करते हैं ? अशिष्ट रूप से न्यायालय को कठघरे में खड़ा करते हैं ? न्यायायिक फैसले पर लगभग कोसने, थू-थू करने की शैली में की गयी ये रिपोर्टिंग मैं सर-माथे रख लेता मगर जब विश्व हिन्दू परिषद रामजन्मभूमि को आस्था का विषय कह कर उस पर दृढ़ता दिखती है तो वो सांप्रदायिक हो जाती है। तो आपको न्याय व्यवस्था की अवमानना करने वाला उद्दंड संवाददाता, संपादक, मालिक क्यों न माना और कहा जाये ? आप राष्ट्र के संस्थानों को अपनी मनमर्ज़ी से क्यों हांक रहे हैं ? समाज को आपका बहिष्कार क्यों नहीं करना चाहिए ?

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। IndiaSpeaksDaily इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

Courtesy Desk December 26, 2016
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