विजय सिंह ठकुराय। पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश निवासी एक भारतीय महिला के पासपोर्ट को अवैध करार देकर चीन ने घंटों तक महिला को जबरिया हिरासत में रखा, जिससे अरुणाचल विवाद एक बार फिर गहरा गया है। चीन हमेशा से ही ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा संबंधी 1914 में हुए शिमला समझौते को नकारता रहा है और अरुणाचल प्रदेश पर हक जताता रहा है।
पर एक रोचक बात यह भी है कि 1962 के युद्ध में अरुणाचल के कई हिस्से जीत लेने के बावजूद युद्ध-विराम के बाद चीन स्वयं ही जीते हुए हिस्सों को छोड़ कर सीमा रेखा के परे वापस चला गया था। उसके बाद भारत ने अरुणाचल को 1972 में यूनियन टेरिटरी बनाया, 1987 में पूर्ण राज्य।
पर आज तक जुबानी बतोलेबाजी के अलावा चीन ने अरुणाचल पर अपने दावे को मजबूत करने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया है। इसका कारण यह है कि चीन को अरुणाचल चाहिए ही नहीं। अरुणाचल का राग समय-समय पर छेड़ते रहना बस एक मनोवैज्ञानिक जंग है। वास्तव में चीन को जो चीज चाहिए, वह है – अक्साई चिन।
अक्साई चिन एक ऐसा दुर्गम क्षेत्र है, जहाँ धनिया तक नहीं उगता। इस क्षेत्र में कभी लड़ाई नहीं हुई, कभी कोई ह्यूमन एस्टेब्लिशमेंट नहीं रहा। वो तो अंग्रेजों ने उन्नीसवीं शताब्दी में “विलियम जॉनसन” नामक अपने अधिकारी को सर्वे करने भेजा था। जॉनसन भाई जहाँ तक जा पाए, वहाँ तक गए। जब थक गए तो वापस आ गए।
जॉनसन द्वारा कवर किये गए क्षेत्रों के आधार पर 1897 में अंग्रेजों ने “जॉनसन लाइन” के अनुसार अपना नक्शा छाप दिया, जिसके अनुसार अक्साई चिन भारत का हिस्सा होता था। 1899 में, यानी दो साल बाद, अंग्रेजों ने “मैकडोनाल्ड मैककार्टनी लाइन” के आधार पर नया नक्शा छाप दिया, जिसके अनुसार अक्साई चिन चीन का हिस्सा होता था। यह नक्शा अंग्रेजों ने चीन को भी अवलोकन के लिए भेजा पर चीन ने जवाब नहीं दिया तो वापस जॉनसन लाइन को ही आधिकारिक सीमा रेखा घोषित कर दिया गया।
अब चीन अड़ा है कि चूंकि आखिरी नक्शा मैकडोनाल्ड मैककार्टनी लाइन के अनुसार था, इसलिए हम उसी को मानेंगे। वाजिब भी है क्योंकि चीन की तिब्बत से कनेक्टिविटी के लिए अक्साई चिन पर कब्जा होना बेहद जरूरी है। इसलिए 62 से पहले और बाद में भी चीन का भारत के प्रति हमेशा यह प्रस्ताव रहा है कि – अक्साई चिन हमारा, अरुणाचल तुम्हारा। 50-50 पर सौदा पटाओ।
अंग्रेज चालाक कौम थी। जानती थी कि ये देश है तो ससुरे दुर्योधन का। 18 अक्षोहिणी सेनाओं का फातिहा पढ़वा देगा, पर सुई की नोक बराबर भूमि पर भी समझौता करने को राजी नहीं होगा। अंततः जाते-जाते अंग्रेज कुछ ऐसे सीमा विवाद हमारे पल्ले मढ़ गए, जिन पर हम शताब्दियों तक पड़ोसियों से लड़ते-झगड़ते रहें और कभी महाशक्ति बनने की डगर पर आगे न बढ़ पाएं।
अब चूंकि 62 के युद्ध के बाद चीन अरुणाचल के जीते गए हिस्सों को खुद ही त्याग कर वापस लौट गया था और एक फेयर 50-50 की डील की बात कर रहा है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें अक्साई चिन को चीन को सौंप कर अरुणाचल रख लेना चाहिए। वैसे भी एक्चुअल में कोई लेनदेन नहीं करना है। 62 से अक्साई चिन पर चीन का ही कब्जा है। हमें तो बस दावा त्यागना है। आप 500 साल लड़कर भी अक्साई चिन को वापस नहीं ले सकते। भूल जाइए।
वक्त की नजाकत यही है कि पड़ोसी से हाथ मिलाकर भारत-चीन-रूस की महायुति बनानी चाहिए। ये तीन मुल्क एक हो जाएं तो रक्षा से लेकर बाजार तक – पूरे विश्व में इनका डंका बजेगा। पाकिस्तान के मुकाबले भारत चीन को क्या दे सकता है – यह चीन को भी पता है।
अब दिक्कत यह है कि जो नेता यह समझौता करेगा, उसका पॉलिटिकल कैरियर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। तो अब बिल्ली के गले मे घण्टी बांधे कौन? देखा जाए तो एक आदमी है। बस एक ही आदमी है – मोदी !!
62 के युद्ध में चीन अपने द्वारा प्रस्तावित “मैकडोनाल्ड मैककार्टनी लाइन” को पार कर के कई किमी भारत की सीमा के अंदर घुस आया था और सीजफायर के बाद भी वापस नहीं गया था। यानी टेक्निकली आज भी चीन भारत की हजारों वर्ग-किमी भूमि पर कब्जा किये बैठा है। अगर चीन-भारत समझौता होता है तो अक्साई चिन हासिल करने के बावजूद चीन को नियंत्रण रेखा से कई किमी पीछे जाना पड़ेगा। हजारों वर्ग-किमी भूमि भारत को वापस मिल जाएगी।
अगर मोदी चाहें, तो इसे इस तरह प्रचारित कर सकते हैं कि – हमनें चीन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया मितरों। आपका ये चौकीदार भारत की हजारों किमी भूमि वापस लेकर आया है मितरों।
अर्थात – सांप भी मर जायेगा और लाठी भी न टूटेगी। समझौता भी हो जाएगा और भारत-भूमि चीन को दे देने का अपयश हासिल भी न होगा।
देखा जाए तो इस मुद्दे को हल करने के लिए एक ऐसे आदमी की जरूरत है, जो जनता की आंखों में धूल झोंकने और लोगों को खड़े-खड़े मूर्ख बनाने की विद्या में माहिर हो – और अपने मोदी जी तो गंजे को भी कंघा बेचने की विद्या में महारथी हैं।
इसलिए इस विवाद को मोदी को अतिरिक्त कोई नहीं सुलझा सकता – न भूतो, न भविष्यति।
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