श्वेताभ पाठक श्वेत प्रेम रस। वास्तव में तो महिला दिवस मनाना नारी या स्त्री का अपमान ही है ! अरे उनका तो सभी दिन है, सभी पल है ! उनके बिना तो जीवन की कल्पना भी व्यर्थ ही है !
और सबसे अज़ीब तो तब लगता है जब यह भारतवर्ष इस दिवस को मनाये ! बाकी देश मनाये ठीक है क्योंकि हो सकता है वहाँ नारियों को सम्मान न दिए जाने की परंपरा हो परन्तु हमारा देश तो हमेशा से स्त्री पुरुष में समान विचार रखता है ! बल्कि कहीं कहीं नारियों की पुरुषों से भी बढ़कर स्तुति की गयी है !
नव वर्ष के आगमन पर ही 9 दिन लगातार हम शक्ति की पूजा करते हैं ! एक हमारे भारतवर्ष में ही नारी को शक्ति का प्रतीक माना जाता है और अन्यत्र पूरे विश्व में ऐसा कहीं नहीं है !
दुर्गा जिससे नौ दिन हम अपने शरीर को शक्ति से दुर्ग और अभेद्य बनाने की प्रक्रिया करते हैं वह भी एक नारी की पूजा से ही है ! सरस्वती , जो सभी कलाओं, विद्याओं और गुणों की दात्री हैं , वह भी नारी प्रतीक ही हैं !
लक्ष्मी , जो आरोग्य , संपदा , धन , वैभव इत्यादि की प्रतीक हैं , वह भी एक स्त्री हैं !
यहाँ तक कि हर देवता या ईश्वर की उपासना उनकी शक्ति के साथ की जाती है !
सनातन धर्म के मूल “सीता राम , राधा कृष्ण ” दोनों को हम बिना उनकी शक्ति प्रतीक के हम कल्पना भी नहीं करते ! सबसे पूर्व में हम स्त्री प्रतीक का ही नाम लेते हैं !
शिव को भी बिना शक्ति के शव समझा जाता है और अर्धनारीश्वर के नाम से संबोधित किया जाता है !
प्राचीन भारत में महिलाएं काफी उन्नत व सुदृढ़ थीं। समाज में पुत्र का महत्व था, पर पुत्रियों को समान अधिकार और सम्मान मिलता था। मनु ने भी बेटी के लिए संपति में चौथे हिस्से का विधान किया। उपनिषद काल में पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी शिक्षित किया जाता था। सहशिक्षा व्यापक रूप से दिखती है, लव-कुश के साथ आत्रेयी पढ़ती थी। नारी भी सैनिक शिक्षा लेती थी।
वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है – मैत्रेयी , गार्गी , विश्ववारा , लोप, मुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी, कुंती , माद्री , मदालसा , अरुंधती इत्यादि सैकड़ों नाम हैं !
आज से हजारों वर्ष पूर्व जब दुनिया की अन्य देशों की नारियां नग्न हो जानवरो की तरह घूमती थी और उन्हें डाईन कहकर प्रताड़ित कर मार दिया जाता था , तब भारतवर्ष की महान नारियाँ राजाओ के साथ सिहासन पर बैठकर शासन के महत्वपूर्ण फैसले लिया करती थी , तब भारतवर्ष की महान नारी लीलावती और गार्गी के रूप मे गणित और विज्ञान मे अपना परचम फहरा रही थी ।
वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं !
वेदों में स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और
सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य
किसी धर्मग्रंथ में नहीं है !
वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश
की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं !
वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय| वेदों में
नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली,
देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक
आदर सूचक नाम दिए गए हैं !
वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है – उसे
सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन
की बात कही गई है !
वैदिक काल में नारी अध्यन- अध्यापन से लेकर
रणक्षेत्र में भी जाती थी , जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई
थी !
एकमात्र भारत ही ऐसा देश रहा जिसमें स्त्री को स्वयं अपना वर चुनने का अधिकार प्राप्त था ! हजारों पुरुषों में स्वयं वह अपना वर चुन सकती थी !
सावित्री को स्वयं उनके पिता ने रथ सजाकर दिया कि जाओ स्वयं अपना वर कहीं से भी किसी भी दिशा में से चुनो !
जिन्होनें वेदों के दर्शन भी नहीं किए, ऐसे कुछ रीढ़ की हड्डी विहीन
बुद्धिवादियों ने इस देश की सभ्यता, संस्कृति को नष्ट – भ्रष्ट करने
का जो अभियान चला रखा है – उसके तहत वेदों में नारी की अवमानना का ढ़ोल पीटते रहते हैं !
वेदों की घोषणा को महर्षि मनु अपनी संहिता में देते हुए कहते हैं :
“जो समाज स्त्री का आदर करता है वह स्वर्ग है और
जहां स्त्री का अपमान होता है, वहां किए गए सत्कर्म भी ख़त्म हो जाते
हैं ! ” वेदों के इस महत्वपूर्ण सन्देश की अनदेखी के कारण ही भारत एक
ऐसा गुलाम राष्ट्र बना जिसे गुलामों द्वारा ही चलाया जाता रहा और
यही कारण है कि आज बहुत सारी तथाकथित प्रगति के बावजूद
भी दुनिया एक खतरनाक और दाहक जगह बन गई है !
महिलाएं – जो साहस का उद्गम हैं उनको यथोचित सम्मान न मिलना ही इस का मूल कारण है !
अगर हम ने स्त्रियों को भोगविलास और नुमाइश की वस्तु मान
लिया तो कर्मफल व्यवस्था के अनुसार हमें अत्यंत कठोर परिणाम भुगतने
होंगे और यही हो रहा है ! लेकिन अगर हम मातृशक्ति को साहस और
हमारी समस्त अच्छाइयों का प्रतिमान मान लें तो हम संसार को स्वर्ग
बना सकेंगे !
यह पोस्ट बहुत लम्बी हो जायेगी इसीलिए इसको यहीं विराम दे रहा हूँ ! आगे की पोस्ट में फिर चर्चा करूँगा !
– Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )
