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बॉलीवुड न्यूज़

अलाउद्दीन खिलजी के लौंडेबाजी पर फिल्म बनाओ न भंसाली! सारी क्रियेटिविटी का पता चल जाएगा!

Courtesy Desk
By Courtesy Desk 6 Min Read
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India Speaks Daily - ISD News
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पुष्कर अवस्थी। यह संजय भंसाली क्या पिटा की सारे तथाकथित सेक्युलर, बुद्धजीवी, कलाकार और फ़िल्मी जमात ‘सृजनात्मकता का अधिकार’, सिनेमेटिक क्रिएटिविटी का झंडा बुलन्द किये कूद पड़े है। उन्हें इतिहासिक चरित्रों को, तोड़ मोड़ कर गाने अफसानो से थाली पर सजा कर जनता को पेश करने की आज़ादी चाहिए है। उन्हें हिंदुत्व के प्रतीकों से छेड़खानी करने का अधिकार चाहिए है। इन भारत की संस्कृति और माटी से दूर, विक्षिप्त लोगो में यह घृष्टता करने की सर्जनात्मकता कहाँ से आ गयी है? ऐसा पिछले दशको में क्या हुआ है की आज वह निर्लज्जता कर रहे है और उनके समर्थन में राजनैतिक वर्ग से लेकर मिडिया उनके समर्थन कर रही है? इस सबको समझने से पहले हमें भारतीय बम्बईया सनीमा के पीछे जाना होगा।

एक जमाने में जब भारत में सनीमा नही था तब कहानियों और किस्सों पर नौटंकियां बनती थी। जिसमे ज्यादातर या तो धार्मिक होते थे या फिर इतिहास के चरित्रों को कहानियों में फेंट कर दिखाया जाता था। इन इतिहासिक किस्सों का यथार्थ से कोई भी मतलब नही होता था वह बस भारत की गुलाम जनता को जीवन की कड़वी हकीकत से सपनो की दुनिया में जीने का मौका देता था। अब क्योंकि हिन्दू गुलाम था इसलिए पश्चिम से आये आताताइयों और मुगलो के चरित्रों को नौटंकी में एक अलग रूप में गाने बजाने के साथ दिखाये जाते थे।

यह लैला मजनू, शीरी फरहाद सलीम अनारकली इत्यादि के किस्से सब कोरी कल्पना थी जो हमारी संस्कृति के हिस्से भी नही थे लेकिन उनको नौटंकी की माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारा बनाया गया है।उसके बाद जब मुम्बई में पारसी थिएटर का उदय हुआ तब इनमे इतिहासिक भारतीय चरित्रों की शूरवीरता को विशेष स्थान मिला क्योंकि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का काल था।

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो भारत के हिंदुत्व वाले मूल चरित्र में बदलाव लाने के लिए वामपंथियों ने इसमें घुस पैठ किया और एक अलग मंच बनाया। दरअसल जो हम आज देख रहे है उसकी जड़ स्वतन्त्रता के बाद से ही पड़ गयी थी। मुम्बई के सिनेमा और थिएटर में वामपंथी जमात ने, बुद्धिजीविता के नाम पर पहले ही अपना कब्ज़ा जमा लिया था। उन्होंने शुरू में इसे वर्ग संघर्ष और आम गरीब आदमी की चाशनी में परोसा जिसकी परणिति 70 के दशक में समांतर फिल्मो के रूप में हुयी थी।

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वामपंथी मौहोल की इप्टा, एनएसडी, फिल्म इंस्टिट्यूट पुणे आदि से निकली पौध जहाँ सर्जनात्मकता लायी वही तब तक के वामपंथियों के अघोषित एजेंडे को भी ले कर आयी। उसी के साथ सेक्युलरता की परिभाषा गढ़ी जाने लगी जहाँ हिन्दू चरित्र नकरात्मक और मुस्लिम चरित्र को सकरात्मकता के नाम पर बदले जाने के प्रयास होने लगे, जिसका दाऊद इब्राहम की मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री में पकड़ बनाने के बाद, इसका इस इंडस्ट्री के हर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर प्रयोग होने लगा है। इसका सीधा प्रभाव यह हुआ की व्यवसायिकता की दौड में लगी प्रगतिशीलता की 40 /50 की कलाकार पीढ़ी, 80 /90 के दशक के आते आते, फाइव स्टार होटल में 2000 रूपए की स्कॉच और 5000 प्लेट का खाना खाने वाली बन गयी थी। आज भारतीय सेक्युलर राजनैतिज्ञों और बुद्धजीवियों ने, भारत और भारतीयता की अवधारणा की ठेकेदारी इन्ही कलाकारों के हाथो दे रक्खी है जिनके लिए हिंदुत्व एक अपराधबोध बन गया है। यह हिंदुत्व व भारतीय प्रतीकों पर कुठारघात करना अपना सेक्युलारिय धर्म समझते है।

अब मेरा संजय भंसाली से प्रश्न है कि उसे खिलजी से इतनी ही मुहब्बत है तो अपनी क्रिएटिविटी को धरातल पर पंख क्यों नही देते है? क्यों नही लैला मजनू, बाजीराव मस्तानी की तर्ज़ पर ‘कफूर खिलजी: एक अमर प्रेम’ बनाते है? भंसाली को कहानी नही मालूम तो हम सूना देते है। यह कहानी किसी लेखक की कल्पना नही है बल्कि यह कहानी इतिहास में ही दर्ज है।

अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात पर चढ़ाई के दौरान एक लड़के को पकड़ कर गुलाम बनाया गया था। कहते है वह बेहद खूबसूरत बच्चा था। उसको जब पकड़ा गया तो उसके टेस्टिकल्स काट कर हिजड़ा बनाया गया और उसको इस्लाम कबूल करवाया गया। उसका नया नाम मलिक कफूर रक्खा गया। अलाउद्दीन खिलजी एक व्यभिचारी सुल्तान तो था ही वह समलिंगी भी था, उसे लौंडेबाजी का शौक था, उसकी जब निगाह उस पर पड़ी तो वह अपना दिल दे बैठा। खिलजी ने उस गुलाम लड़के को अपनी यौन इच्छा के लिए 1000 दीनार में खरीद लिया था, इसी लिए यह मलिक कफूर, इतिहास में ‘हज़ार दीनार कफूर’ के नाम से भी जाना जाता है। खिलजी इस कफूर की मुहब्बत में इतना गिरफ्तार था कि उसे पहले सिपाही और बाद में उसे अपनी फौज का सेनापति बना दिया था। फिर इसी कफूर ने बाद में 1316 में अलाउद्दीन खिलजी को मरवा कर खुद सत्ता हथिया ली थी लेकिन अंत में खिलजी के तीसरे बेटे मुबारक के हाथों मारा गया था।

संजय भंसाली, कहानी में दम है लेकिन मैं जानता हूँ की तुम नही बना पाओगे क्योंकि तब तुम्हारी सारी प्रगतिशीलता और क्रिएटिविटी, तुम्हारे टेस्टिकिल्स में उतर आयेगी और मलिक कफूर बनाये जाने के डर से तुम्हारी सारी सिनेमैटिक क्रिएटिविटी कपूर बन उड़ जायेगी।

साभार: पुष्कर अवस्थी के फेसबुक वॉल से

Courtesy Desk January 28, 2017
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