इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। राजनीति में सबसे भयावह दृश्य सत्ता की विदाई नहीं, बल्कि जनता की वह ‘उदासीनता’ होती है जो चीख-चीख कर कहती है कि तमाशा अब अपना प्रभाव खो चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर जो दृश्य देश के सार्वजनिक और डिजिटल पटल पर उभरा, वह किसी भी सर्वशक्तिमान सत्ता-तंत्र के लिए आत्ममंथन का समय है।
सरकारी मशीनरी, विज्ञापनों के भारी-भरकम बजट और संगठनात्मक तंत्र के तमाम दावों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर दीया जलाने के प्रति जनता की स्वाभाविक भागीदारी नदारद रही। जिस समाज ने कभी करोना जैसी महामारी के चरम संकट और घोर अव्यवस्था के दौर में नरेंद्र मोदी के एक आह्वान पर थालियां और तालियां पीट दी थीं, आज वही समाज सरकारी प्रायोजन वाले ‘दीपोत्सव’ के आह्वान पर अपने घरों की चौखट तक नहीं आया। यह अंतर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि ‘सम्मोहन के टूटने’ का है।
जनता की इस घटती दिलचस्पी और सुलगते आक्रोश का सबसे जीवंत प्रमाण तब दिखा, जब बीबीसी हिंदी के इंस्टाग्राम पेज ने सामान्य कौतूहलवश सवाल दागा— “जन्मदिन पर पीएम नरेंद्र मोदी को एक गिफ्ट जो आप देना चाहें!” इसके जवाब में आम नागरिकों की जो प्रतिक्रियाएं आईं, वे सत्ता के जनसंपर्क प्रकोष्ठ (PR Cell) के सारे दावों को तार-तार करने के लिए काफी थीं। लोगों के गुस्से और कटुता का स्तर इतना तीव्र था कि संस्थान को पहले ‘भाषा की मर्यादा’ की दुहाई देनी पड़ी और अंततः स्थिति असहनीय होने पर कमेंट बॉक्स ही बंद करना पड़ा। डिजिटल मंच, जिन्हें कभी सत्ता ने अपने नैरेटिव के निर्माण का सबसे सशक्त औजार बनाया था, आज वहीं से असंतोष का ऐसा लावा फूट रहा है जिसे संभालना तंत्र के वश में नहीं रहा।
ठीक इसी पृष्ठभूमि में, जब दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान में जन्मदिन का आत्ममुग्ध उत्सव आयोजित हो रहा था, तभी उज्जैन की धरती से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का एक बेहद गंभीर और दार्शनिक संकेत सामने आया। उज्जैन में ‘राष्ट्रीय युवा धर्म संसद’ में युवाओं को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने अहंकार और प्रकृति के अकाट्य नियमों की याद दिलाई। उन्होंने कहा:
“अब सूर्य है, उसका आप कुछ नहीं कर सकते। हम नहीं मानते, मत मानो। उसका उदय और अस्त निश्चित है। मनुष्य अहंकार में… सब ओर मेरी सत्ता चलती है, ऐसा मानकर जो करता है, उसके चलते ऐसी बातों का भी कि ये अपनी इच्छा से चलता है… ऐसी गलतफहमी उसके मन में होती है। लेकिन ऐसा नहीं है।”
भले ही इसे दार्शनिक आवरण में प्रस्तुत किया गया हो, लेकिन राजनीति में समय और संदर्भ कभी निष्पक्ष नहीं होते। जब नागपुर और दिल्ली के रिश्तों में अविश्वास की गहरी खाई पहले से मौजूद हो, जब पार्टी के राष्ट्रीय मंचों से कभी यह दावा किया गया हो कि ‘अब पार्टी को संघ की जरूरत नहीं’, तब भागवत का यह कहना कि “उदय हुआ है तो अस्त भी होगा… किसी को भ्रम नहीं रखना चाहिए कि सब उसके अनुसार चलता है”—केवल एक दार्शनिक उपदेश नहीं रह जाता है। यह सत्ता के उस असीमित ‘व्यक्ति-केंद्रित अहंकार’ पर सीधा और तीखा प्रहार है जो खुद को व्यवस्था, संविधान और समय से भी ऊपर समझने की भूल कर बैठा था।
इतिहास गवाह है कि जब जनमत की जमीन खिसकती है, तो सबसे पहले उसके अपने वैचारिक अधिष्ठान ही उसे आईना दिखाना शुरू करते हैं। सरकारी तंत्र भले ही करोड़ों रुपये फूंककर अखबारों के पहले पन्ने और टीवी चैनलों के स्क्रीन रंग दे, लेकिन वह जनता के दिलों में खत्म हो चुके उत्साह को दोबारा जीवित नहीं कर सकता।
थाली-ताली का दौर आज इसलिए समाप्त हो चुका है क्योंकि वह ‘उम्मीद’ पर टिका था। आज उस उम्मीद की जगह बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक वैमनस्य और टूटे वादों की हकीकत ने ले ली है। जब जनता ताली बजाना बंद कर दे, जब सोशल मीडिया के नियंत्रित एल्गोरिदम के बावजूद आक्रोश छलकने लगे और जब भाजपा के मातृ-संगठन संघ का शीर्ष नेतृत्व मंच से ‘अस्त’ होने का शाश्वत नियम याद दिलाने लगे—तो सत्ता को समझ लेना चाहिए कि भ्रम का तिलिस्म अब ढहने की कगार पर है। प्रकृति का नियम अडिग है: जिसका उदय हुआ है, उसका अस्त भी अवश्यंभावी है!
