Hemant Sharma। यशवंत व्यास हिन्दी के प्रयोगधर्मी लेखक-संपादक हैं. भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ है. समाज को देखने के क्रम में वरक-दर-वरक अनुभूति की कुदाली से खोदकर बातों को समझाने की दृष्टि है. फिर इस समझ और भाषा को ताने और बाने पर कसकर बरतने का और उसमें नए डिज़ाइन गढ़ने का कौशल है. वो नई दृष्टि और सोच को पुराने में जोड़कर कलमी नस्ल तैयार करने के माहिर भी हैं. यशवंत जी की प्रयोगधर्मिता का मैं मुरीद हूँ. उनके संपादन में निकली ‘अहा ज़िंदगी’ पत्रिका हो, अख़बारों के संपादकीय पन्ने हों या उनका सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘खटाक’, आपको हर कहीं नवाचार बिखरा मिलेगा. वे शब्दों से खेलते हैं. इसलिए उनकी भाषा सिर्फ शब्दों का संयोजन नहीं, समय की स्मृतियों को आकार देने वाली दुर्लभ कला है. वे भाषा को केवल बरतते नहीं, उसे गढ़ते हैं. आप उन्हें भाषा का बढ़ई या थोड़े सम्मान के साथ उन्हें भाषाई अभियन्ता भी कह सकते हैं. जिन्हें शब्दों का ‘फिजिक्स’ भी आता है और पाठक के मन की ‘केमिस्ट्री’ भी.
‘बेगमपुल से दरियागंज’ यशवंत की नई और अनूठी किताब है जो आपको लेकर चलती है उस दौर में, जब मेरठ, वाराणसी और इलाहाबाद जैसे शहर देसी पल्प के केंद्र हुआ करते थे. देसी पल्प यानी ऐसी किताबें जिन्हें सार्वजनिक रूप से पढ़ना धतकरम माना जाता था. वर्जनाओं से घिरी नैतिकता ध्वस्त होती थी. कभी इन किताबों का बीजकेंद्र मेरठ का बेगमपुल था. और इसको विस्तार मिला दिल्ली के दरियागंज में. हालॉंकि तब तक इस साहित्य की शुरुआत बनारस और इलाहाबाद में हो चुकी थी. ‘बेगमपुल से दरियागंज’ तक पल्प की दीवानगी सहेजे यशवंत व्यास की यह किताब सिर्फ कहानियों की नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे समाज, बाजार, और लेखकों की दुनिया का खजाना है. इस किताब में न सिर्फ पल्प साहित्य की ऐतिहासिक यात्रा छिपी है, बल्कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी है, जिसने इस साहित्य को जन्म दिया.

पल्प साहित्य यानी रहस्य, जासूसी, तिलस्मी, अय्यारी, स्कैम, युद्ध, अपराध, धोखा, प्रेमप्रसंग और तंत्र-मंत्र के वे उपन्यास जो रद्दी काग़ज़ पर सस्ती छपाई से तैयार होते थे. हिंदी के अभिजात्य आलोचकों ने कथ्य और प्रोडक्शन दोनों स्तर पर इसे ‘लुगदी साहित्य’ घोषित कर दिया. वे इन्हें लुगदी, घासलेटी, सस्ता या फुटपाथी साहित्य कह दुरदुराते थे. यों कहिए की इसे लफ़ंगों का साहित्य कहते थे. कभी उसके लेखक को गम्भीरता से नहीं लिया गया. विश्वविद्यालयों में बैठे कुछ मास्टर जो लेखकों का मुस्तकबिल तय करते हैं, रचनात्मकता को साहित्य और असाहित्य के खांचे में बॉंटने का काम करते थे. उनकी सामंती सोच ने इस साहित्य को असाहित्यिक बता ख़ारिज किया. तुर्रा ये था कि यह साहित्य समाज के नैतिक मूल्यों के खिलाफ था. इस तथ्य से उलट सच यह था कि इसी पल्प साहित्य ने हिन्दी पट्टी में किताब पढ़ने की आदत डाली. इस साहित्य ने आलोचकों की भूमिका ही खत्म कर दी. केवल लेखक, प्रकाशक और पाठक बच गए. हिंदी के आलोचक वैसे तो ग़ैर बराबरी के खिलाफ खड्गहस्त दिखते हैं. पर इस लोकप्रिय साहित्य को लुगदी साहित्य कहकर उन्होंने साहित्यिक ग़ैर बराबरी को बढ़ावा दिया. यह उनका ‘दुचित्तापन’ था. ये उपन्यास लोकप्रियता की उस ऊँचाई पर थे जहाँ पाठक ही इनका असली आलोचक और संरक्षक था.
इस अस्पृश्यता के बावजूद ‘लुगदी’ उपन्यास लाखों में छपते रहे. इनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 1993 में वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ रिलीज़ होने के पहले दिन पन्द्रह लाख बिक गया. इस उपन्यास की करोड़ प्रतियाँ बिकी. छपाई और बिक्री के सभी मानक तोड़ते सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की ढाई करोड़ प्रतियां बिकी. सुरेन्द्र मोहन पाठक का प्रसिद्ध उपन्यास “असफल अभियान” और “खाली वार” था जिसने पाठक जी को प्रसिद्धि के बुर्ज ख़लीफ़ा पर पहुंचा दिया और फिर पाठक जी ने पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा. उनके उपन्यास “पैंसठ लाख की डकैती” का अंग्रेजी में अनुवाद भी छपा. यह खबर टाईम मैगज़ीन में छपी. सुरेंद्र मोहन पाठक ने हिंदी में लगभग 300 थ्रिलर उपन्यास यानी Crime fiction लिखे.

मेरा मानना है कि इस साहित्य की पाठक संख्या को देखते हुए इन्हें ‘लोकप्रिय साहित्य’ कहा जाना चाहिए था. ये किताबें लुगदी कागज यानी रद्दी या रिसाइकिल हुए कम गुणवत्ता वाले कागजों पर छपते थे. जिन्हें अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ से बनाया जाता था. इस पल्प साहित्य के जरिए ही हिंदी में जासूसी, क्रांतिकारी, अपराध, थ्रिलर सस्पेंस और फैमिली ड्रामा श्रृंखला की शुरूआत हुई. गुलशन नंदा लुगदी साहित्य के सबसे ज्यादा बिकने वाले लेखक रहे. वे 60 से 80 के दशक में दर्जनों सिल्वर और गोल्डन जुबली फ़िल्मों के भी लेखक रहे. पर हिंदी आलोचकों ने उन्हें भी उपेक्षा की नज़रों से देखा. नंदा के ‘झील के उस पार’ उपन्यास का पहला संस्करण ही पॉंच लाख कॉपी का रहा. इनके अलावा लुगदी साहित्य के नामी लेखकों में वेदप्रकाश कम्बोज, कर्नल रंजीत, मनोज, राजहंस, ओमप्रकाश शर्मा, रानू, इब्ने शफी, कुशवाहा कांत जैसे लोकप्रिय उपन्यासकार हुए. कुशवाहा कान्त बनारस से ‘चिनगारी’ पत्रिका निकालते थे. चिनगारी प्रेस हमारे घर के पास ही था. 1952 में कबीर चौरा के पास ही उनकी हत्या हो गयी.
कुशवाहा कान्त को भले ही शुद्धता के ठेकेदार आलोचकों ने अछूत समझा. पर उस वक्त के मशहूर लेखक पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र उनके बारे में लिखते हैं. “हिन्दी कथा साहित्य से आपका जरा भी सम्बन्ध है, तो आपने कुशवाहा कान्त का नाम जरूर सुना होगा. मैं उन्हें अपने स्कूल की एक शाखा का विद्यार्थी मानता हूँ. आप उसे नाम दे सकते हैं ‘यौवन सनसनी’. जब हिन्दी के बिगड़े साहित्यिक और कलाकार उसे असफल और अश्लील कह रहे थे तो यह लेखक बनारस में अपना बड़ा सा प्रेस खोल कर सैकड़ों किताबों की लाखों प्रतियाँ बेच रहा था.” उग्र जी की इस टिप्पणी से आप कुशवाहा कान्त के जलवे का अंदाज लगा सकते हैं.वैसे इब्ने सफ़ी हिन्दी में जासूसी उपन्यासों के उस्ताद थे. अब तो हार्पर कालिन्स उन्हें धड़ल्ले से छाप रहा है. लुगदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम प्यारे लाल आवारा का भी है. साठ के दशक में उनकी तूती बोलती थी. इलाहाबाद से वह एक पत्रिका भी छापते थे.
आलोचक चाहे जो कहें पर पल्प साहित्य उस पूरे दौर की धड़कन था. जिन्हें स्कूल की किताबों के बीच छुपाकर किशोर पढ़ते थे. या फिर उसके जिल्द पर अखबार चढ़ा, यह एकान्त में पढ़ा जाता था. उस जमाने में ऐसे उपन्यास पढ़ने का मतलब था कि लड़का बड़ा हो गया है. उसकी रेखिया उठान की अवस्था आ गयी है. ये उपन्यास बस अड्डों, रेलवे स्टेशन और शहरों के नुक्कड़ पर लगने वाले बुक स्टॉलों पर मिलते थे. छोटे कस्बों और शहरों में तो ये किराए पर भी मिल जाते थे. तब दुनिया खुली नहीं थी. इंटरनेट का जमाना नहीं था. इन किताबों के जरिए ही किशोर मन का रोमांटिक दुनिया से पहला साबका पड़ता था. इन किताबों में उस रंगीन और रहस्यमयी दुनिया का एक ऐसा तिलिस्म था, जिसमें शामिल जासूसों, शातिर बदमाशों और बेताब आशिकों के हैरतअंगेज किरदारों ने करोड़ों पाठकों को बाँधे रखा. तुलसीदास के बाद हिन्दी में घर घर पहुँचने वाले लेखक गुलशन नंदा ही थे. आलोचकों ने उन्हें अश्लील और अनैतिक करार दिया. मैंने गुलशन नंदा, प्रेमचंद और शरतचंद्र को एक साथ पढ़ा. मुझे गुलशन नंदा में कहीं अश्लीलता नज़र नहीं आई.

इसी देशी पल्प पर पहली बार व्यवस्थित और खोजी पड़ताल की है यशवंत व्यास ने. बिलकुल व्यासपीठ के कथावाचक की शैली में. व्यास जी ने अंतरराष्ट्रीय प्रेरणाओं, भारतीय भाषाओं की विविधता, गली-मोहल्लों के किस्सों और शोध आधारित विश्लेषणों के जरिए पल्प साहित्य को नैतिकता की परछाई से निकालकर रोशनी में लाने की कोशिश की है. जिसे अक्सर गंभीर साहित्य की बहसों में नजरअंदाज कर दिया जाता है. हालॉंकि साहित्य में इसकी शुरुआत भारतेंदु युग में ही देवकीनन्दन खत्री और गोपाल सिंह गहमरी ने कर दी थी. इब्ने सफ़ी इसके ट्रेण्ड सेंटर थे. पश्चिम में अगाथा क्रिस्टी, सिडनी शेल्डन, स्टीफ़न किंग, जेफ्री आर्चर और ऑर्थर कानन डायल जैसे लेखकों ने जासूसी उपन्यासों को कथित मुख्य धारा साहित्य से ऊपर उठा दिया था. पर हिंदी साहित्य का इतिहास लिखनेवालों ने इस लोकप्रिय साहित्य की सुदीर्घ परम्परा को सिरे से ग़ायब कर दिया.
तब न मोबाइल था, न सोशल मीडिया. समाज में अच्छे-बुरे की परिभाषाएं तय थीं. कुछ भी देख,सुन,पढ़ कर चार लोग क्या कहेगें नैतिकता का विमर्श इसी के गिर्द घूमता था. हालांकि मैं आजतक उन ‘चार’ से नहीं मिला, लेकिन समाज की सीमाएं उन चार ( अमूर्त ) लोगों के कहने से तय होती थीं. रातें इतनी चुप होती कि पन्ना पलटने की आहट भी एक राज़ लगती थी. जवानी के विस्फोट के लिए न कम्प्यूटर का क्लिक था, न नेटफ्लिक्स. भीतर उमड़ते युवा मन के पास बाहर झांकने का सिर्फ एक रोशनदान था. कभी किताबों के पीछे, कभी तकिए के नीचे… हल्के पीले, खुरदुरे कागजों का एक झुंड. चमकदार कवर में सजा एक उपन्यास. जिसको पलटते ही पन्ने एक ऐसी खिड़की खोलते थे, जिसके उस पार प्रेम था, रहस्य था, विद्रोह था, शक था, जासूसी थी और अनकही आजादी भी. जो उपन्यास नौजवानों के भीतर की दुनिया को आकार दे रहे थे, उन्हें सभ्य समाज ने छिपकर पढ़ने की ही इजाजत दी थी. लेकिन किसी विद्रोह की तरह, नए विचार की तरह, यह अंदर ही अंदर उमड़ता-घुमड़ता रहा. जेनरेशन और जवानी, दोनों इसमें अपनी निहित भावनाओं, जिज्ञासाओं और सार्वजनिक सच के पीछे के रहस्यों को खोज रहे थे. यह साहित्य एक पूरी प्यासी पीढ़ी सनसनी का प्याला पिला रही थीं.
इसी छुपी हुई दुनिया को फिर से खोलती ‘बेगम पुल से दरियागंज’ केवल पल्प साहित्य का इतिहास नहीं लिखती, बल्कि उस दौर के समाज, उस समय के बाज़ार और एक अनोखे सांस्कृतिक भूगोल से भी हमारा रिश्ता जोड़ती है. सस्ते कागज़ में लिपटी ये किताबें पाठक को सिर्फ कहानी नहीं सुनाती थीं, उसे अपना किरदार बना देती थीं. जिन्हें पढ़नेवालों को ‘लफंगा’ समझा गया. साहित्य के ठेकेदारों ने इन किताबों को पुस्तकालयों में जगह नहीं दी. जो बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों से गुजरते हुए लाखों दिलों तक पहुँचीं. 60 से 80 के दशक में सिनेमा के पर्दे पर फिरोज खान, संजीव कुमार और ओम पुरी जैसे कलाकार इन्हीं उपन्यासों को पढ़ते दिखे. आज के दौर में भी हसीन दिलरुबा की तापसी पन्नू या मिर्जापुर वाले कुलभूषण खरबंदा के हाथों में कभी केशव पंडित, कभी वेदप्रकाश कंबोज, कभी सुरेंद्र मोहन पाठक ही दिखाई देते हैं. टेलीविज़न के दौर में इस साहित्य की धकड़नें कमजोर होने लगीं. लेकिन उसकी तासीर टीवी के डेली-सोप (धारावाहिक) में दिखती रही. अब पाठक, दर्शक बन गए. सास-बहू के बीच सिर्फ साजिश की कहानियां रची गईं. प्रेम में सिर्फ धोखा दिखाई दिया. दोस्ती में सिर्फ दगा मिलने लगा. लुगदी का मूल रस अलग रुप में घर-घर पहुंचा. इन कहानियों की जड़ उसी पल्प संसार में थीं.
व्यास जी की किताब बताती है कि कैसे समय के साथ इन कहानियों के किरदार बदले, कैसे यह साहित्य समाज के साथ-साथ विकसित हुआ. यह केवल दस्तावेज़ नहीं, एक अनुभव है. मैं व्यास जी की बात से सहमत हूं कि उस पल्प का पहला पन्ना ही आपको बाँध लेता है और आखिरी पन्ना अगली किताब की तलब जगा देता है. एक ऐसा नशा, जो तब तक नहीं उतरता जब तक अगली कहानी हाथ में न आ जाए. सोचिए जब बड़े-बड़े हिन्दी साहित्यकार पाठकों के लिए तरस रहे थे, तब ये गुमनाम लेखक लाखों प्रतियों में बिक रहे थे. हिंदी के प्रसार में इन उपन्यासों का योगदान गहरा और अनकहा है.
लुगदी साहित्य को लेकर पक्ष विपक्ष दोनों आमने-सामने खड़े हैं. लोकप्रिय, पॉपुलर और लुगदी में क्या फ़र्क़ है?, यह दिलचस्प ‘शास्त्रीय बहस’ अर्से से चल रही है. शुद्धतावादियों की चलती तो कबीर भी लुगदी साहित्य के ही खाने में होते. भाषा और कथ्य के आधार पर तो मास्टर आलोचक यह कर ही सकते थे. गुरूदेव रवींद्र नाथ ठाकुर न होते तो कबीर छप भी नहीं पाते. गुरूदेव की दखल से ही कबीर पहली बार छपे. तुलसी भी लुगदी साहित्य में ही रखे जाते. काशी के शुद्धतावादी संस्कृत पंडित तो उनसे मारपीट कर उनके लिखे मानस के प्रंसग गंगा के हवाले कर ही रहे थे. पर पश्चिम में इस साहित्य का दर्जा भी क्लासिक जैसा ही है. पश्चिम में इस शैली की पुस्तक ‘फ्रैंकेंस्टीन’ को लोकप्रिय साहित्य की श्रेणी में रखा गया. आज वह एक विश्व क्लासिक का दर्जा पा चुका है. ‘ड्रैकुला’ भी एक डरावना उपन्यास था मगर अब साहित्यिक खांचे में रखकर उस पर बात की जाती है. हालांकि बिकता वह आज भी पल्प फ़िक्शन की तरह ही है और लोकप्रियता में कई समकालीन ‘बेस्ट सेलर्स’ को टक्कर देता है. ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ को एक अपराध कथा की श्रेणी में रखा जाता है जबकि वह एक उच्च स्तर का दार्शनिक आध्यात्मिक मूल्यों वाला उपन्यास है. काफ़्का के भय और अजनबियत से भरे वातावरण वाली कहानियां पल्प की अवधारणा के बहुत करीब हैं. एडगर एलन पो ने बहुत सारी डरावनी कहानियां लिखी हैं. चार्ल्स डिकेंस ने भी ‘अ क्रिसमस कैरोल’ के नाम से डरावना लघु उपन्यास लिखा. स्कॉटिश लेखक आरएल स्टीवेंसन ने कभी समुद्री डाकुओं की रोमांचक कहानियां लिखीं तो ‘डॉ जैकिल एंड मि. हाइड’ के नाम से डरावना उपन्यास लिखा.
सत्रहवीं शताब्दी में गॉथिक नॉवेल ने आधुनिक पल्प फिक्शन की नींव तैयार की. होरेस वालपोल गॉथिक शैली के आरंभिक और सबसे चर्चित उपन्यासकार रहे. गॉथिक एक स्थापत्य शैली थी, जिसका इस्तेमाल मध्यकालीन इमारतों, चर्च और महलों को बनाने में किया जाता था. गॉथिक नॉवेल में भी आमतौर पर इसी से मिलती-जुलती सेटिंग का इस्तेमाल किया जाता था. इन उपन्यासों के कथानक महल, मठ, जमीन के भीतर बने रास्तों, गुप्त दरवाजों और तहखानों की भूल-भुलैया में चक्कर लगाया करते थे. हिंदी में देवकीनंदन खत्री भी जब आम जन को सुहाने वाली कहानियां लिखते हैं तो वे भी तहखानों, चोर दरवाजों और सुरंगों का तिलिस्म रचते हैं.
आज की परिभाषा में जिसे हम ‘पल्प फ़िक्शन’ कहते हैं, पश्चिम में उसकी बुनियाद 19वीं शताब्दी में ही पड़ी थी. सन् 1900 से 1950 के बीच अमेरिका में सस्ते कागज़ में छपने वाली इन कहानियों से ‘पल्प फिक्शन’ या ‘लुगदी साहित्य’ अस्तित्व में आया. इस ‘लुगदी साहित्य’ के बिकने की बड़ी वजह थी उनका कवर. जिनका मूल कहानी से बहुत कम लेना देना होता था. कवर पर अक्सर बहुत ही आकर्षक वेशभूषा या कम कपड़ों में किसी महिला की तस्वीर होती. हिंदी में यथार्थवादी लेखन की नींव डालने वाले प्रेमचंद अपने पढ़ने की शुरुआत 13 साल की उम्र में ही ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ से करते हैं. वे हिंदी-उर्दू की बात भी ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ से ही करते हैं.
हिंदी में इसके समानांतर बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी और किस्सा तोता मैना भी मौजूद हैं. बैताल पचीसी की कहानियां भारत की सबसे लोकप्रिय कथाओं में से हैं. बैताल पचीसी का स्रोत राजा सातवाहन के मंत्री की लिखी रचना ‘बृहत्कथा‘ थी, इसे 495 ईसा पूर्व में लिखा गया था. इसकी रचना प्राकृत में हुई थी. कश्मीर के महाकवि सोमदेव भट्ट राव ने इसको बाद में संस्कृत में लिखा और ‘कथासरित्सागर’ नाम दिया. ‘कथासरित्सागर’ भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है. इसमें विक्रमादित्य, बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी, किस्सा तोता मैना आदि कई किस्सों को शामिल किया गया.
जिस तरह खड़ी बोली का इतिहास अमीर खुसरो से शुरू होता है उसी तरह से लोकप्रिय साहित्य का इतिहास भी अमीर खुसरो से ही शुरू किया जाना चाहिए. फारसी का ‘किस्सा-ए-चाहर दरवेश’, जिसे उर्दू में ‘बाग-ओ-बहार’ के नाम से जाना जाता है, फ़ारसी में लिखी गई अमीर खुसरो की कहानियों का एक संकलन है. इस बारे में एक किस्सा है कि अमीर खुसरो के गुरु और सूफी संत निजामुद्दीन औलिया एक बार बीमार पड़ गए थे. अमीर खुसरो उनका हालचाल जानने और सेवा-टहल के लिए पास में रहते थे. औलिया का मन लगा रहे इसके लिए उन्होंने औलिया को ‘अरेबियन नाइट्स’ की शैली में किस्सों का एक सिलसिला सुनाना शुरू किया, जो इतने लोकप्रिय हुए कि बाद में उनको लिपिबद्ध किया गया.
ब्रिटिश राज में फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रोफेसर जॉन गिलक्रिस्ट के कहने पर मीर अमन देहलवी ने इसी ‘चहार दरवेश’ का उर्दू-हिन्दी रूपांतरण किया और ‘किस्सा चार दरवेश’ (1801) अस्तित्व में आई, जिसे उर्दू-हिंदी के आरंभिक मानक गद्य में गिना जाता है. सन 1888 में देवकीनंदन खत्री ने दो दुश्मन राजघरानों, नौगढ़ और विजयगढ़ के बीच प्रेम, तिलिस्म और अय्यारी में रची-बसी कहानी बुनकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया. यह किताब आज भी हिंदी साहित्य की ‘ऑल-टाइम बेस्टसेलर’ मानी जाती है. 19वीं शताब्दी की शुरुआत में ही गोपाल राम गहमरी ने भी हिंदी में रहस्य-रोमांच पर आधारित लेखन की शुरुआत कर दी थी. हिंदी को जासूसी उपन्यास शब्द से परिचित कराने का श्रेय उन्हीं को जाता है.
हम जिस लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं उसमें ‘मॉसेज’ की अनदेखी नहीं हो सकती है. जिस विधा को करोड़ों लोग पढ़ रहे हों उन्हें नकारना बौद्धिक बेइमानी है. एक बार लता जी ने कहा था कि शास्त्रीय संगीत की अहमियत सुगम संगीत की वजह से ही है. जो लोक में समादृत हैं उन्हें आप कैसे नकार सकते हैं. बुद्ध से लेकर तुलसीदास तक की पूरी नायक श्रृंखला तत्कालीन व्यवस्था से नकारे हुए लोग थे पर क्या इतिहास उन्हें नकार पाया. इतिहास की कमज़ोरी है कि उसे राजाओं और प्रभावशाली लोगों ने, व्यवस्था ने अपने अस्तित्व को याद रखवाने के लिए लिखवाया. इसीलिए लिखा हुआ इतिहास राजाओं और सत्ताओं का इतिहास है. लेकिन इतिहास की एक खूबी है कि इतिहास सबका होता है. जो कहा नहीं गया, क्या वो इतिहास नहीं. जो आमजन थे या हैं, जो हाशिए के लोग हैं, जो कमज़ोर हैं, जो सुदूर हैं, इतिहास उनका भी है. हिंदी के पंडित जिसे लुगदी मानकर छूना नहीं चाहते, उसका इतिहास किसी मायने में मानक हिंदी के कुनबे के इतिहास से कमतर नहीं है.
यशवंत व्यास के प्रयोग हमने पहले भी देखें हैं. ‘मोहब्बत की दुकान’, ‘बोसकीयाना’, ‘कवि की मनोहर कहानियाँ’, ‘अबतक छप्पन’, ‘ख्वाब के दो दिन’, ’कल की ताजा खबर’, ’अभिताभ का अ’, ‘यारी-दुश्मनी’ जैसी उनकी कृतियाँ हिंदी में प्रयोगधर्मिता की नई जमीन तैयार करती हैं. उनके उपन्यास ‘चिंताघर’ और ‘कामरेड गोडसे’ पुरस्कृत रहे हैं. वे देश की पहली सकारात्मक जीवन-दृष्टि वाली पत्रिका ‘अहा जिंदगी’ के संस्थापक संपादक रहे हैं, शरद जोशी सम्मान से सम्मानित हैं, और फिलहाल अमर उजाला समूह के सलाहकार संपादक तथा अंतरा इन्फोमीडिया के संस्थापक हैं. ‘बेगमपुल से दरियागंज’ उनके इसी समृद्ध अनुभव और गहरी शोधयात्रा का नतीजा है. पेंग्विन से छपी इस किताब को पढ़ना आमजन के दिलों के स्पंदन को क़रीब से महसूस करना है. अनकहे इतिहास में गोते लगाना है और उस समाज को देखना है, जिसे घराने वाले इतिहास ने दिखाने और देखने की जहमत नहीं उठाई. यशवंत इस पुस्तक के लिए साधुवाद के पात्र हैं. मुझे उनमें उस लेखक की आभा और प्रतिमान नज़र आते हैं, जो केवल पढ़ा नहीं जाता, याद रह जाता है.
जय जय.
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