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India Speak Daily > समाचार > विदेश > भारत सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को आखिर जम्मू-कश्मीर में ही क्यों बसा रही है, जहां इस्लाम और पाकिस्तान के कारण जिहादी प्रकृति का संघर्ष छिड़ा हुआ है?
विदेश

भारत सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को आखिर जम्मू-कश्मीर में ही क्यों बसा रही है, जहां इस्लाम और पाकिस्तान के कारण जिहादी प्रकृति का संघर्ष छिड़ा हुआ है?

ISD News Network
By ISD News Network 8 Min Read
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India Speaks Daily - ISD News
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तुफैल अहमद। हाल के महीनों में म्यांमार से आ रहे रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों और जम्मू-कश्मीर तथा भारत के दूसरे क्षेत्रों में उनके बसने के मुद्दे ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अनुमान है कि अभी करीब 36000 रोहिंग्या शरणार्थी असम, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं। कठिनाई के वक्त किसी व्यक्ति को भोजन और आश्रय उपलब्ध कराना इंसानी स्वभाव है। इसीलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को आश्रय देना चाहिए, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि भारत सरकार इन शरणार्थियों को जम्मू-कश्मीर में ही क्यों बसा रही है, जहां इस्लाम और पाकिस्तान के कारण जिहादी प्रकृति का संघर्ष छिड़ा हुआ है?

अक्टूबर 2015 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि जम्मू में 1219 रोहिंग्या मुस्लिम परिवारों के कुल 5107 सदस्य रह रहे हैं, जिनमें से 4912 सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त द्वारा शरणार्थी का दर्जा दिया जा चुका है। इस साल जून में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने बताया था कि म्यांमार और बांग्लादेश से आए करीब 13400 शरणार्थी राज्य के विभिन्न कैंपों में रह रहे हैं। यह गौर करने लायक है कि जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात में हिन्दू पंडित कश्मीर में अपने घरों में वापस नहीं लौट पा रहे हैं, जबकि रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी वहां किसी भी तरह से आश्रय पाना चाह रहे हैं।

रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी बर्मा, जिसे अब म्यांमार के नाम से जाना जाता है, के उत्तरी राज्य रखाइन के निवासी हैं। बर्मा में रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, जबकि बौद्ध बहुसंख्यक हैं। हालांकि पूर्व में भी दोनों समुदायों के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है, लेकिन हिंसा की वर्तमान घटनाएं 2012 के दंगों की देन हैं, जिसके परिणामस्वरूप सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 140000 लोग विस्थापित हो चुके हैं जिसमें अधिकतर रोहिंग्या मुस्लिम हैं। विस्थापित रोहिंग्या मुस्लिम इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, बांग्लादेश, भारत सहित कई देशों में गए हैं।

मानव अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों की हत्या, दुष्कर्म और प्रताड़ना के लिए बर्मा की सेना पर आरोप लगाया है।1अप्रैल 2013 में अमेरिका स्थित एक मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच ने 153 पेज वाली अपनी एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने बर्मा के अधिकारियों और स्थानीय सशस्त्र समूहों पर जून 2012 से ही रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ हिंसक अभियान चलाने का आरोप लगाया था। इस साल आठ दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के म्यांमार मामलों के विशेष सलाहकार विजय नांबियार ने शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेता और बर्मा सरकार की प्रमुख आंग सान सू की से अपनी आत्मा की आवाज सुनने और म्यांमार के लोगों से जातीय, धार्मिक और अन्य मतभेदों से ऊपर उठने की अपील की।

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दूसरी ओर म्यांमार की सरकार ने कहा कि रोहिंग्या मुस्लिमों और बौद्धों के बीच संघर्ष में जिहादी तत्व शामिल हैं। इस साल नौ अक्टूबर को म्यांमार की सीमा पुलिस पर सशस्त्र उग्रवादियों ने हमला कर नौ जवानों की हत्या कर दी थी। रिपोर्ट के अनुसार इस हमले के लिए हरकह-अल-यकीन नामक उग्रवादी संगठन ने जिम्मेदारी ली है। हरकह-अल-यकीन या फेथ मूवमेंट का गठन रखाइन राज्य में रोहिंग्या मुस्लिमों और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच 2012 के दंगे के बाद हुआ था। अता उल्लाह की पहचान इस समूह के नेता के रूप में हुई, जिसका जन्म कराची में एक रोहिंग्या प्रवासी परिवार में हुआ था, जो बाद में सऊदी अरब के शहर मक्का चला गया था।

अभी हरकह-अल-यकीन अपनी गतिविधियों का संचालन मक्का से ही करता है। खबर है कि बर्मा के सुरक्षा बलों ने प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवाद रोधी अभियानों को आरंभ कर दिया है। 15 अक्टूबर को जारी एक बयान में म्यांमार के सूचना मंत्रलय ने नौ अक्टूबर के हमले के लिए अका-मल-मुजाहिदीन नामक एक जिहादी संगठन को जिम्मेदार ठहराया था। 45 वर्षीय इस्लामिक उग्रवादी हविस्तूहर इसका प्रमुख है, जो पूर्व में पाकिस्तान में तालिबान के एक आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर में छह माह का वक्त बिता चुका है। वह पहले कभी बांग्लादेश में चल रहे शरणार्थी शिविरों में विभिन्न उग्रवादियों के संपर्क में आया, जहां वह पाकिस्तानी नागरिकों कालिस, इब्राहिम, अजा और अयातुल्लाह से भी मिला था।

सूचना मंत्रलय के बयान के अनुसार बाद में कालिस हविस्तूहर द्वारा भर्ती और गोलबंद किए गए स्थानीय उग्रवादी लड़ाकों को आतंकवाद का प्रशिक्षण देने के लिए म्यांमार आया। 1इसमें निश्चित रूप से पाकिस्तान का संबंध है। 30 सितंबर, 2013 को जारी अपने बयान में अलकायदा के सरगना उस्ताद फारूक ने म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका और भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों का मुद्दा उठाया था। इसे अलकायदा की लुक ईस्ट पॉलिसी कहा जा सकता है। फारूक ने दुस्साहसिक रूप से भारत सरकार को चेतावनी दी थी कि कश्मीर, गुजरात के बाद असम में हुई ¨हसा का बदला लिया जाएगा। अब असम के मुस्लिमों में जिस कदर कट्टरता बढ़ रही है वह हमारी चिंताओं में लगातार इजाफा कर रही है।

बहुत से लोगों को इस बात का अहसास नहीं होगा कि अलकायदा एक पाकिस्तानी संगठन के प्रभाव में है। 1988 में आइएसआइ की निगरानी में पेशावर में उसका गठन हुआ था। यह वही साल था जब आइएसआइ अफगानिस्तान में विजेता के रूप में उभरी थी और उसने कश्मीर में जिहाद की अपनी योजना को जन्म दिया था। जमात उद दावा, जिसे अब लश्कर-ए-तैयबा के नाम से जाना जाता है, का संस्थापक हाफिज सईद गाजा के मुस्लिमों सहित इंडोनेशिया में रोहिंग्या मुस्लिमों के शरणार्थी शिविरों में लंबे समय तक सक्रिय रहा है। हाफिज सईद की अगुआई में जमात उद दावा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थित रोहिंग्या शरणार्थियों को कंबल, भोजन और अस्थायी टेंट मुहैया कराकर स्वयं के मानवीय संगठन होने का दिखावा करता है।

यह बात पूरी तरह साफ है कि हाफिज सईद को आइएसआइ का समर्थन प्राप्त है। इस बात की बहुत संभावना है कि आने वाले दिनों में यह संगठन जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणाथियों के युवाओं को जिहाद के लिए भड़काने का प्रयास करेगा। भारत को रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को आश्रय जरूर देना चाहिए, लेकिन उसे सावधान भी रहना होगा। भारत एक बड़ा देश है, लेकिन जम्मू-कश्मीर वह जगह नहीं हो सकती है जहां रोहिंग्या मुस्लिमों को बसाया जाना चाहिए, क्योंकि वहां होने वाले संघर्ष जिहादी प्रकृति के होते हैं।

लेखक: तुफैल अहमद (नई दिल्ली स्थित ओपन सोर्स इंस्टीट्यूट के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)

साभार : जागरण.कॉम

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TAGGED: Jammu & Kashmir, kashmir conflict, rohingya refugees

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