इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो। आईआईटी बॉम्बे में घटी हालिया दुखद घटना और उसके बाद उपजे कानूनी विवाद के बीच तमिलनाडु से सामाजिक सौहार्द, परिपक्वता और आत्मसम्मान की एक अत्यंत सकारात्मक और प्रेरणादायी खबर सामने आई है। जहाँ एक ओर परीक्षा में अनुचित साधनों के प्रयोग पर कार्रवाई के बाद छात्र साहिल वकोडे की आत्महत्या के मामले में प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया और उनकी गिरफ्तारी को लेकर दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु के प्रतिष्ठित अनुसूचित जाति समुदाय (SC) ‘देवेंद्रकुला वेल्लालर’ (DKV) समुदाय ने इस कानून के दुरुपयोग के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज बुलंद की है।
देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय से आने वाले प्रमुख नेता अनंतन अय्यासामी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर निष्पक्षता का पक्ष लेते हुए प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के समर्थन में खुलकर स्टैंड लिया। उन्होंने दो-टूक शब्दों में लिखा:
“मैं आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों का सख्ती से विरोध करता हूँ।”
गौरतलब है कि ‘देवेंद्रकुला वेल्लालर’ (Devendrakula Vellalar) मुख्य रूप से दक्षिणी तमिलनाडु का एक ऐतिहासिक और पारंपरिक रूप से सशक्त कृषक अनुसूचित जाति समुदाय है, जिसका चोल और पांड्य राजवंशों के काल से जल प्रबंधन और कृषि व्यवस्था में गौरवशाली इतिहास रहा है। सात उप-जातियों (जैसे पल्लर, कादयान, काल्वादी आदि) के सामूहिक समावेशन से बना यह समाज लंबे समय से स्वयं को रूढ़िवादी ‘पीड़ित’ नैरेटिव से अलग कर एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध पहचान के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्षरत रहा है। इसी सामाजिक आत्मसम्मान की रक्षा के लिए इस समुदाय ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग कर इन सभी उप-जातियों को ‘देवेंद्रकुला वेल्लालर’ नाम की आधिकारिक मान्यता दिलाई, और अब इस समाज का एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग आरक्षण की निर्भरता तथा अनुसूचित जाति (SC) की सूची से बाहर निकलकर अपनी मूल कृषक-पहचान के साथ मुख्यधारा में खड़े होने का साहसिक रुख अपना रहा है।

स्वावलंबन और अकादमिक सत्यनिष्ठा का संकल्प
यह समर्थन केवल एक व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामाजिक बदलाव और स्वावलंबन का परिचायक है। देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय ने एक प्रगतिशील और साहसिक सामूहिक संकल्प लेते हुए यह स्पष्ट किया है कि वे एक समाज के रूप में एससी/एसटी एक्ट के तहत दुर्भावना से प्रेरित या अनुचित मुकदमों का समर्थन नहीं करेंगे।
आईआईटी बॉम्बे के भीतर से भी यह तथ्य सामने आया है कि परीक्षा कक्ष में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए नकल की कोशिश को रोकने के लिए की गई कार्रवाई पूरी तरह अकादमिक नियमों के तहत थी, न कि किसी जातिगत पूर्वाग्रह के कारण। संस्थान के अन्य प्राध्यापक और छात्र भी शिक्षक की अकादमिक निष्ठा के पक्ष में खड़े दिखे हैं। ऐसे में जब किसी सुरक्षात्मक कानून को अकादमिक अनुशासन के खिलाफ हथियार बनाने की कोशिश की जा रही हो, तब एक प्रमुख दलित समुदाय द्वारा प्रोफेसर के हक में खड़ा होना पूरे देश को एक नई दिशा दिखाता है।
तमिलनाडु से उठी यह पहल साबित करती है कि समाज का वास्तविक उत्थान विशेषाधिकारों या मुकदमों की राजनीति में नहीं, बल्कि योग्यता, स्वाभिमान और सत्य के साथ खड़े होने में है।
