भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय में 1915 में जब गांधी भारत आए तो जो सत्याग्रह वो 21 वर्ष साउथ अफ्रीका में भारतीयों के लिए चलाए कुछ वैसा ही काम भारत में भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चलाना चाहते थे , चंपारण सत्याग्रह के 1917 जी एक किसान आंदोलन था काफ़ी सफल हुआ फिर 1918 का अहमदाबाद का मज़दूरों के लिए सत्याग्रह भीं काफ़ी सफल और प्रभावकारी था अंग्रेज़ परेशान हो गए और उनको डर सताने लगा ।
इसी बीच अंबेडकर 1917 में भारत आए और छात्रवृत्ति की शर्तों के अनुसार बड़ौदा राजघराने में सैन्य विभाग में सहायक की नौकरी किए कुछ ही महीने बाद आरोप लगा कर नौकरी छोड़ दिए और बांबे आ गए वहाँ उन्होंने सीडनहैम कॉलेज में नौकरी की शिक्षक की लेकिन उनके पढ़ाने से बच्चे संतुष्ट नहीं होते थे इस लिए स्कूल ने उन्हें बाहर निकाल दिया कारण एक और था उस समय अंबेडकर शिक्षक कम नेतागीरी ज़्यादा करने लगे थे थे ।
इस कॉलेज में पढ़ाते समय ही भारत में एक क्रांतिकारी घटना हुई चेम्सफोर्ड सुधारों के द्वारा ब्रिटिश सरकार भारत में आंशिक लोक तंत्र लाना चाहती थी उसकी पृष्ठभूमि भी आगे के लेखों में आपको पढ़ने को मिलेगा चुकी गांधी के सत्याग्रह के कारण भारत के लोग सभी हिंदू मुस्लिम एक होकर भारत को स्वतंत्र करा कर भारत की अपनी सरकार बनाना चाहते थे । चेम्सफोर्ड सुधार 1919 लागू हो उससे पहले लार्ड साउथबरो के नेतृत्व में एक समिति 1918 में भारत आई और सभी जगह घूम घूम कर सभी जाति समूह से उनके निर्वाचन के बारे में बात किया उनके समक्ष अंबेडकर ने डिप्रेस्ड क्लास के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित होकर यह पहली बार मांग किया कि महारों को अलग निर्वाचक मंडल दिया जाए उन्हें हिंदुओं से अलग रखा जाए यह अंबेडकर के रूप में हिंदू समाज को कमजोर करने वाला अंग्रेजों को रत्न प्राप्त हो गया था ।
जो गाँधी के आंदोलन को दबाने ,कमजोर करने में मदद कर सकता था । आपको जानना चाहिए कि जब इस साउथबरो समिति के समक्ष अंबेडकर खड़े थे उस समय अंग्रेजी सरकार के स्कूल में शिक्षक थे और इसी के इनाम में अंबेडकर को अंग्रेजों ने फिर बड़ौदा रियासत से छात्रवृत्ति देकर बार-एट-लॉ कराया इतना ही नहीं अंग्रेजों ने अंबेडकर को तीनों गोल-मेज सम्मेलनों में डिप्रेस्ड क्लास के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित किया और आगे चलकर डिप्रेस्ड क्लास के लिए अलग से सेपरेट स्लेटोरेट दिया जो गांधी के यरवदा जेल में अनशन के बाद पूना पैक्ट 1932 में समाप्त हुआ ।
आपको एक बात जरूर जानना चाहिए जो गोलमेज सम्मेलन 1930,1931,1932 में हुवे थे उसमें जिन्ना और अंबेडकर तीनों सम्मेलनों में सम्मिलित हुवे थे इस लिए की अंग्रेजों की बाँटों और राज्य करो की नीति में ये दोनों फिट बैठते थे जिन्ना पाकिस्तान माँगते थे और अंबेडकर दलितिस्तान और भारतीय आंदोलन इससे कमजोर होता चला गया आगे आपको हर जगह जिन्ना (पाकिस्तान संस्थापक) और अंबेडकर (डिप्रेस क्लास केवल नहरों के नेता ) हमेशा एक साथ दिखे आज भी कमोबेश जिन्ना के लोग और अंबेडकर के लोग एक साथ होकर भारत को कमजोर करने में लगे हुवे हैं ।
तथाकथीत दलितों को समझना होगा कि योगेंद्र नाथ मंडल के नेतृत्व में दलितों का पूरा समूह जिन्ना के साथ पाकिस्तान गया था लेकिन मंडल भारत वापस भाग आए और हमारे दलित भाई आज भी वहाँ मारे जा रहे हैं । लेकिन हम भारतीयों को इस साज़िश को समझना होगा और इससे मजबूती से लड़ना होगा बिना डरे और बिना रुके । इस प्रकार अम्बेडकर ना कभी स्वतंत्रता के आंदोलन में रहे ना संविधान निर्माण में हमेशा अपना भला सोचे और अंग्रेजों से लाभ लिए दूसरी तरफ़ बीएन राइ साहब ने सदा भारत के लिए काम किया और अंत में एक मजबूत संविधान भारत को दे गए।#संविधान_निर्माता_BN_राव
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