India Speak Daily Bureau.नई दिल्ली। देश की खाद्य सुरक्षा की निगरानी करने वाली संस्था FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) खुद विवादों में घिर गई है। कुछ सोशल मीडिया हैंडल्स ने FSSAI के वरिष्ठ पदों (खासकर Director स्तर) पर डायरेक्ट रिक्रूटमेंट की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं उजागर कीं। जवाब में FSSAI के एक शक्तिशाली अधिकारी की शिकायत पर दिल्ली पुलिस (PS IP Estate) ने इन हैंडल्स के खिलाफ FIR दर्ज कर ली।


यह मामला अब सिर्फ एक भर्ती विवाद नहीं रह गया है। यह सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और whistleblower की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़ा कर रहा है।
आरोप क्या हैं?
सोशल मीडिया पर मुख्य रूप से @khurpenchh, @gemsofbabus_ और संबंधित अकाउंट्स ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया कि FSSAI की आंतरिक कमिटी रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों की नियुक्ति में गड़बड़ियां पाई गईं। सबसे ज्यादा चर्चा Sweety Behera (Director) की नियुक्ति को लेकर हुई।
आरोप के अनुसार, बेहरा ने अपनी बायोडाटा में Nestlé India में अनुभव का दावा किया था। उनके दावे के अनुसार, वर्ष 2006 से 2020 तक उन्होंने काम किया था, लेकिन रिकॉर्ड्स में उनकी जॉइनिंग अगस्त 2007 दिखाई दे रही है, जो उनके दावे की पोल खोल रहा है।
आरोप है कि पद प्राप्ति के लिए 5 वर्ष supervisory experience अनिवार्य था, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण बेहरा ने जमा नहीं किया। इसके अलावा यह भी आरोप लगा कि अंतिम दो वर्षों का ₹18 लाख CTC अनिवार्य था, लेकिन दस्तावेज केवल एक वर्ष का दिखाया गया।
यह भी आरोप लगा कि Recruitment Rules 2018 में CTC या अनुभव में रिलैक्सेशन की कोई व्यवस्था नहीं थी, फिर भी विशेष Office Memorandum के जरिए नियमों को ‘साइड’ कर दिया गया।
इन आरोपों में FSSAI की आंतरिक जांच रिपोर्ट और दस्तावेजों का जिक्र था। आरोपकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने पहले चेतावनी दी, फिर दस्तावेज सार्वजनिक किए, लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उन्हें निशाना बनाया गया।
व्हिसिलब्लोअरों पर FIR दर्ज होने के बाद सोशल मीडिया पर तूफान आ गया। हजारों पोस्ट्स में इसे “whistleblower का दमन” बताया जा रहा है। कई यूजर्स ने लिखा कि “खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भर्ती में गड़बड़ी हो तो सवाल उठाना गुनाह कैसे हो सकता है?” कुछ ने कहा कि FSSAI का असली काम मिलावट रोकना है, न कि आलोचकों पर केस करना।
जिन एकाउंट्स पर FIR किया गया, उनमें से एक ‘खुरपेंच’ ने लिखा: “हमने दस्तावेज शेयर किए जो आंतरिक कमिटी रिपोर्ट का हिस्सा थे। दोषियों पर कार्रवाई की बजाय हमें टारगेट किया जा रहा है। कोर्ट में ले जाएं, वे खुद उजागर होंगे।”
दूसरी तरफ, FSSAI की ओर से अभी कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सार्वजनिक रूप से नहीं आया है। संस्था पहले भी फर्जी भर्ती विज्ञापनों के खिलाफ अलर्ट जारी कर चुकी है, लेकिन अपने अधिकारियों की भर्ती पर सवालों का सीधा जवाब देने की जगह, सवाल पूछने वालों पर प्राथमिकी दर्ज करा रहे हैं!
दोनों पक्षों की दलीलें:-
- आरोपकर्ताओं का पक्ष: सार्वजनिक संस्था में भर्ती की पारदर्शिता जनता का अधिकार है। खाने की सुरक्षा से जुड़ी संस्था में अगर योग्यता से समझौता हुआ तो आम आदमी की सेहत खतरे में पड़ सकती है। सोशल मीडिया पर दस्तावेज शेयर करना लोकतंत्र का हिस्सा है, न कि अपराध।
- FSSAI/शिकायतकर्ता का पक्ष: अगर आरोप झूठे या बिना संदर्भ के हैं और अधिकारियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है, तो कानूनी रास्ता अपनाना उनका अधिकार है। मानहानि (defamation) के तहत FIR सामान्य प्रक्रिया हो सकती है।
बड़ा सवाल: क्या Whistleblower सुरक्षित हैं?
भारत में Whistleblower Protection Act है, लेकिन उसकी प्रभावी क्रियान्वयन पर अकसर सवाल उठते रहते हैं। जब कोई सरकारी अधिकारी या संस्था खुद पर लगे आरोपों की बजाय सूचना उजागर करने वाले पर FIR करती है, तो यह संदेश जाता है कि ‘सवाल मत पूछो’।
FSSAI जैसी संस्था का काम फेक मिल्क, मिलावटी पनीर-मिठाई, तेल और अन्य खाद्य पदार्थों पर नकेल कसना है। अगर उसकी अपनी भर्ती में अनियमितताएं हैं, तो जनता को जानने का हक है।
मामला अभी शुरुआती दौर में है। कोर्ट में अगर दस्तावेज पेश किए गए तो सच्चाई सामने आएगी। FSSAI को इस पर स्पष्ट, पारदर्शी जवाब देना चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे। साथ ही, भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा और जरूरी सुधार भी जरूरी हैं।
निष्कर्ष: भ्रष्टाचार या अनियमितता के खिलाफ आवाज उठाना ‘Badge of honour’ हो सकता है, लेकिन सिस्टम यहां आवाज उठाने वालों की आवाज दबाने में जुटी हुई है। FSSAI को अपनी छवि बचाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए, यानी भारतवासियों को सुरक्षित भोजन मुहैया कराना। सच्चाई सामने आए और जवाबदेही बने, यही उम्मीद है।
