विपुल रेगे। विष्णु मंदिर के एक पुजारी की बेटी अन्नपूर्णानी को स्वादिष्ट भोजन पकाने की कला का जन्मजात ज्ञान है। बड़ी होने पर उसकी महत्वाकांक्षाएं उड़ान भरने लगती है। वह एक प्रसिद्ध शेफ बनना चाहती है। शेफ बनने के बीच एक ही अड़चन है। फाइव स्टार होटल में शेफ बनने के लिए उसे मांस पकाना भी आना चाहिए। अन्नपूर्णानी एक ऐसे ब्राम्हण परिवार से है, जिसकी तीन पीढ़ी विष्णु भगवान् की उपासना करती आई है। ‘अन्नपूर्णी द गॉडेस ऑफ़ फ़ूड’ उसी तरह की फिल्म है, जैसी फ़िल्में बॉलीवुड एजेंडे के तहत परोसता आया है। दुःखद आश्चर्य है कि ऐसी एजेंडावादी फिल्म दक्षिण भारत से डिलीवर हुई है। ये तमिल फिल्म थियेटर में रिलीज होकर विवाद पैदा करने में सफल रही थी और अब ये नेटफ्लिक्स पर रिलीज की गई है।
अन्नपूर्णी :द गॉडेस ऑफ़ फ़ूड
निर्देशक : नीलेश कृष्णा
भाषा : तमिल, हिन्दी
कलाकार : नयनतारा, सत्यराज, कार्तिक कुमार, पूर्णिमा रवि
जॉनर : ड्रामा
विगत कुछ वर्षों में हिन्दू समुदाय में ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ नामक शब्द बहुत प्रचलन में आए हैं। अब इन शब्दों से देश के नागरिक अच्छी तरह परिचित हो चुके हैं। निर्देशक नीलेश कृष्णा की फिल्म ‘अन्नपूर्णी: द गॉडेस ऑफ़ फ़ूड’ ऐसे ही एक और जिहाद को चलन में ला सकती है और इसको ‘फ़ूड जिहाद’ कहा जा सकता है। इस कहानी को जस्टिफाई करने के लिए कहानी में विष्णु भगवान् की एक प्रचलित कथा का सहारा लिया गया है। लेडी सुपरस्टार नयनतारा और सत्यराज जैसे सिद्धहस्त कलाकारों की फिल्म में मौजूदगी भी हैरान करती है। ये फिल्म पिछले दिसंबर में प्रदर्शित हुई थी और प्रदर्शित होते ही विवादों में घिर गई। केरल, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में फिल्म की विषयवस्तु को लेकर घोर आपत्ति दर्ज कराई गई। दक्षिण भारत का हिन्दू समुदाय उत्तर भारत के हिन्दू समुदाय जैसा सहनशील नहीं है और मुखर होकर अपनी बात कहने के लिए जाना जाता है। धर्म को लेकर उनका आग्रह उत्तर और मध्य से अधिक देखा जाता है।
कहानी :अन्नपूर्णानी एक महत्वाकांक्षी शेफ हैं जो होटल प्रबंधन में डिग्री हासिल करना चाहती हैं और अपने आदर्श शेफ आनंद सुंदरराजन की तरह कॉर्पोरेट शेफ बनने की सीढ़ियां चढ़ना चाहती हैं। उनके परिवार का वंश श्रीरंगम मंदिर में सेवा करने के लिए समर्पित है, जहां वह भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाने वाला भोजन पकाते हैं। ब्राह्मण होने के कारण यह परिवार केवल शाकाहारी भोजन खाता है। उसे डिग्री प्राप्त करने के लिए मांस पकाना आवश्यक है। हालाँकि, अन्नपूर्णानी शेफ बनने के अपने निर्णय पर दृढ़ रहती हैं। मुस्लिम दोस्त की संगत में वह मांस पकाने के साथ खाना भी सीख जाती है। एक दिन अन्नपूर्णी के पिता उसे चिकन लेगपीस खाते हुए पकड़ लेते हैं। उसे शादी के लिए विवश किया जाता है तो वह शादी के दिन ही अपने दोस्त फरहान के साथ घर से भाग निकलती है। इस कहानी को निर्देशक ने अत्यंत आपत्तिजनक दृश्यों के साथ प्रस्तुत किया है।
निर्देशन
निर्देशक ने कहानी को इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि स्वाद की असाधारण समझ और खाना पकाने के प्रति जुनून रखने वाली एक लड़की के सपनों के बीच हिन्दू संस्कृति आ जाती है। दिखाया जा रहा है कि नॉनवेज बनाने वाला एक मुस्लिम लड़का उसके लिए ज्ञान के द्वार खोलने आया है। और तो और वह लड़की एक ऐसे व्यक्ति की बेटी है, जो श्रीरंगम जैसे पवित्र क्षेत्र में पुजारी है। उल्लेखनीय है कि श्रीरंगम भारत के भक्ति आंदोलन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पुजारी देवता के लिए भोग बनाते हैं और उनकी बेटी को भी ये कला विरासत में मिली है। अन्नपूर्णी का चरित्र एक स्वतंत्र नारी के रुप में गढ़ने का प्रयास किया गया और उसके पिता का किरदार कुछ निगेटिव बताया गया। जबकि संपूर्ण प्रभाव में अन्नपूर्णी का चरित्र बहुत नकारात्मक दिखाई देता है।
यदि इस कहानी में श्रीरंगम का बैकड्रॉप नहीं होता, तो फिल्म इतने विवाद में नहीं फंसती। यह फिल्म सिर्फ शर्मनाक नहीं बल्कि एक घोटाला है। दर्शकों को लुभाने के लिए देवी के नाम का इस्तेमाल किया गया है। ये फिल्म वामपंथी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है। हिंदू फ़ोबिक और ब्राह्मण फ़ोबिक विचारों को इसी तरीके से आगे बढ़ाया जाता है। एक दृश्य में कुकिंग की प्रतियोगिता चल रही है। सभी को चिकन बिरयानी बनाने का लक्ष्य दिया गया है। हमारी हीरोइन आधे घंटे के कुकिंग समय के पंद्रह मिनट नमाज़ पढ़ती है। नमाज़ पढ़ने के बाद वह चिकन बिरयानी बनाती है और जीत जाती है। जीतने के बाद वह कहती है कि जिन मुस्लिम महिला से उसने चिकन बिरयानी बनाना सीखा, उन्होंने बताया था कि नमाज़ से बिरयानी में स्वाद आता है।
ये फिल्म कितनी एजेंडावादी है, ये इस एक दृश्य से स्पष्ट हो जाता है। तमिल सिनेमा को ऐसी ‘चिकन बिरयानी’ बनाने से परहेज करना चाहिए। इस फिल्म को देखा नहीं जाना चाहिए लेकिन इस पर चर्चा आवश्यक है। अपने एजेंडे को इस्तेमाल करने के लिए श्रीरंगम की एक प्राचीन देव कथा का इस्तेमाल करना अपने आप में ही इतना घृणित कार्य है। मुझे हैरानी है कि हमारे लाड़ले यशस्वी सेंसर बोर्ड ने इसे पास करने में इतनी उदारता आखिर क्यों दिखाई है।
