संदीप देव। ‘नारद परिव्राजकोपनिषद’ और ‘संन्यासोपनिषद’ में साफ-साफ लिखा है कि विकलांग व्यक्ति संन्यासी नहीं हो सकता है। उपनिषदों के इस वचन को इलाहाबाद हाईकोर्ट के डिविजन बैंच ने २२ सितंबर २०१७ के अपने फैसले में स्वीकार किया है। जब श्रुति (वेद) के अनुसार, रामभद्राचार्य संन्यासी ही नहीं हैं तो फिर यह अपने आप को जगतगुरु कैसे बोल सकते हैं?
हां संघियों के लिए तो सनातन शास्त्रों का महत्व ही नहीं है, इसलिए मोहन भागवत को महाभारत में समलैंगिकता का दर्शन हो जाता है और रामभद्राचार्य जी जैसों को स्वयं को जगतगुरु कहने का अवसर मिल जाता है!
उपनिषदों को वेद का हिस्सा माना जाता है। वेद विरुद्ध आचरण करने वालों को सनातन धर्म में नास्तिक कहा गया है। इस हिसाब से अवैदिक रामभद्राचार्य नास्तिक की श्रेणी में रखे जाएंगे, जैसे बुद्ध, चर्वाक आदि को रखा गया है। वैसे संघ का रिलीजन भी नास्तिकता ही है!
हद बात यह है कि रामभद्राचार्य इस वीडियो में झूठ भी बोल रहे हैं। इनका पिछला कुछ कर्म अवश्य खराब था तो इस जन्म में यह नेत्रहीन हुए! इस जन्म को भी झूठ बोलकर क्यों बिगाड़ रहे हैं? क्यों महानरक में जाना चाहते हैं?
यह झूठ बोलते हुए ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामीश्री जगतगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज की पालकी को रथ बता रहे हैं। जब इनके पास दृष्टि ही नहीं है तो पालकी और रथ का अंतर इन्हें कैसे पता चलेगा? सरकारी बाबा बनने का दोष क्या इन्हें नहीं मालूम है?
हमारे यहां एक कथा आती है। चार नेत्रहीन व्यक्ति थे। उन्हें हाथी का परिचय देने को कहा गया। एक अंधे ने हाथी का कान छुआ और कहा हाथी सूप जैसा होता है। दूसरे अंधे ने हाथी का सूंड छुआ और कहा कि हाथी केले के स्तंभ जैसा होता है। तीसरे अंधे ने हाथी का पूंछ छुआ और कहा हाथी डंडे जैसा होता है और चौथे अंधे ने हाथी का पैर छुआ और कहा कि हाथी साखू के पेड़ जैसा होता है।
रामभद्राचार्य जी की मनोदशा कुछ ऐसी ही है! बिना अनुभव और बिना शास्त्रों के ज्ञान के यह कुछ भी बोल रहे हैं! इन्हें तो यह तक नहीं पता कि महर्षि वेदव्यास जी ने ऋग्वेद की शिक्षा अपने शिष्य पैल को दी थी या जैमिनी को?
राम मंदिर मामले में यह बार-बार झूठ बोलते रहे कि इन्होंने ऋग्वेद की जैमिनी संहिता से रामजन्म भूमि को साबित किया, जबकि जैमिनी की संहिता सामवेद पर है, न कि ऋग्वेद पर!
इन्होंने अपने मन से ‘तुलसी दोहा शतक’ की रचना कर राम मंदिर पर हिंदुओं का केस भी बिगाड़ना चाहा था, परंतु धन्यवाद है इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस सुधीर अग्रवाल का जिन्होंने इनकी झूठी गवाही को रद्द कर दिया, अन्यथा पूरा केस हिंदू हार जाते!
किसी को विश्वास न हो तो रामजन्म भूमि पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय पढ़े। मुस्लिम पक्ष के सबसे प्रिय गवाह रामभद्राचार्य ही थे! मुस्लिम पक्ष बार-बार रामभद्राचार्य की गवाही पर जोर दे रहा था, आखिर क्यों?वह इस कारण कि मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर पा रहा था कि रामजन्म भूमि पर मंदिर नहीं मस्जिद था! लेकिन रामभद्राचार्य ने फर्जी ‘तुलसी दोहा शतक’ रच कर यह साबित करने का भरपूर प्रयास किया कि रामजन्म भूमि पर बाबरी मस्जिद था!
कोर्ट का स्पष्ट कहना था कि मुस्लिम पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि वहां कोई मंदिर नहीं था! अब जिन रामभद्राचार्य का झूठ शास्त्रों पर और अदालत में खुल चुका है, उन्हें बार-बार संघी अपनी झूठ को जस्टिफाई करने के लिए खड़ा कर देते हैं, जो बेहद दुखद है!
