संदीप देव। उत्तराखंड के अल्मोड़ा (मोहन) में स्थित इंडियन मेडिसिंस फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IMPCL) के रणनीतिक विनिवेश (Strategic Disinvestment) को लेकर जनता, श्रमिक संगठनों और राजनीतिक गलियारों में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक ऐसी कंपनी जो दशकों से मुनाफे में थी और जिसने देश में प्रामाणिक आयुर्वेदिक व यूनानी दवाओं की आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसे सरकार ने निजी हाथों में बेच कर क्या देश और देश की जनता को धोखा नहीं दिया है? आइए उठाते हैं सच से पर्दा!
IMPCL का ऐतिहासिक और आर्थिक प्रोफाइल
IMPCL की स्थापना 1978 में हुई थी और 1982 से इसने व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। यह केंद्रीय आयुष मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत एक ‘मिनी रत्न’ (Category-II) सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (CPSE) रही है। यह इकाई लगभग 656 आयुर्वेदिक और 336 यूनानी दवाओं का निर्माण करती रही है। इसकी दवाओं की गुणवत्ता पर देश के सरकारी अस्पतालों और अनुसंधान केंद्रों का अटूट भरोसा था।

यह कंपनी कभी घाटे में नहीं रही। वित्तीय वर्ष 2022-23 में कंपनी का टर्नओवर लगभग ₹145 करोड़ से ₹160 करोड़ के बीच था और यह लगातार शुद्ध लाभ (Profit After Tax) कमा रही थी। कोविड-19 महामारी के दौरान आयुष उत्पादों की मांग बढ़ने से इसकी प्रासंगिकता और अधिक साबित हुई थी।
कुमाऊं क्षेत्र के पहाड़ी इलाके (मोहन, अल्मोड़ा) में स्थित इस कंपनी के पास लगभग 42 एकड़ की बेशकीमती भूमि (जो वन क्षेत्र से सटी है), अत्याधुनिक निर्माण संयंत्र और करीब 500 से अधिक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर्मचारियों/स्थानीय जड़ी-बूटी संग्राहकों की आजीविका टिकी हुई थी।
विनिवेश (निजीकरण) का फैसला और उसके पीछे के तर्क
भारत सरकार के निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) ने कैबिनेट के फैसले के आधार पर IMPCL में सरकार की 100% हिस्सेदारी (जिसमें 98.11% केंद्र सरकार और 1.89% उत्तराखंड सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम की है) को बेचने के लिए निविदाएं (Bids) आमंत्रित कीं। सरकार का कहना और निजीकरण के समर्थकों का तर्क है कि यह सरकार की विनिवेश नीति है जिसके अनुसार रक्षा, परमाणु ऊर्जा, वित्तीय सेवाओं और बुनियादी ढांचे जैसे ‘रणनीतिक क्षेत्रों’ को छोड़कर अन्य क्षेत्रों (जैसे फार्मा या विनिर्माण) में सरकार की उपस्थिति धीरे-धीरे कम की जा रही है। तर्क यह है कि दवा बनाना निजी क्षेत्र का काम है, सरकार का नहीं।
सरकार समर्थकों का दूसरा तर्क है कि सार्वजनिक संपत्तियों को बेचकर प्राप्त धन को देश के बुनियादी ढांचे (सड़क, रेलवे, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं में लगाने का नीतिगत ढांचा तैयार किया गया है।
परंतु इस तर्क लोगों को पच नहीं रहा है, इसलिए सरकार पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। सरकार सीधे-सीधे ‘क्रोनी कैप्टलिज्म’ की ओर बढ़ती दिख रही है। देश के कीमती संसाधनों, जमीन, पूंजी-सबको वह अपने पसंदीदा उद्योगपतियों के हवाले करती जा रही है। यदि कोई सरकारी कंपनी घाटे में है तो सरकार की विनिवेश नीति समझ में आती है, जैसे घाटे में चल रही एयर इंडिया को सरकार ने बेच दिया, परन्तु जो कंपनी लगातार लाभ और रोजगार दोनों दे रही है, उसे उसकी अनुमानित कीमत से कम में बेचना, यह साफ-साफ भ्रष्टाचार है और इसी कारण सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
किस कंपनी को बेची गई और सौदा कितने में हुआ?
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय (DIPAM) ने स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड (Skymap Pharmaceuticals Pvt Ltd) को IMPCL का नया मालिक घोषित किया है।

स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स ने इसके लिए ₹121,00,94,400 (लगभग 121 करोड़ और 94 हजार रुपये) की उच्चतम बोली (Highest Bid) लगाई, जिसे सरकार के अधिकार प्राप्त मंत्री समूह (Alternative Mechanism) ने मंजूरी दी। इस सौदे के तहत स्काईमैप को कंपनी की 100% इक्विटी शेयरहोल्डिंग के साथ-साथ पूरा प्रबंधन नियंत्रण (Management Control) सौंप दिया गया है।
अल्मोड़ा की सरकारी धरोहर को अपने हाथ में लेने वाली इस निजी कंपनी का प्रोफाइल समझना इस पूरी रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प और खोजी हिस्सा है। स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स की स्थापना वर्ष 2006 में हुई थी। यह मूल रूप से दिल्ली-एनसीआर आधारित कंपनी है और इसके मुख्य प्रमोटर/संस्थापक संजय गुप्ता हैं।

यह कंपनी मुख्य रूप से एलोपैथिक फार्मास्युटिकल फॉर्मूलेशन (जैसे टैबलेट, कैप्सूल, इंजेक्टेबल्स, सिरप और अन्य डोज़ फॉर्म) के निर्माण और अनुबंध विनिर्माण (Contract Manufacturing) में लगी हुई है। कंपनी की वेबसाइट और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इसके पास 500 से अधिक फार्मा उत्पादों का पोर्टफोलियो है। यह घरेलू बाजार के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी दवाएं निर्यात करती है।
स्काईमैप का मुख्य अनुभव एलोपैथी और मॉडर्न मेडिसिन में रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, लगातार बढ़ते आयुर्वेदिक और वैलनेस मार्केट (Ayurvedic & Wellness Market) में सीधा और बड़ा एकाधिकार स्थापित करने के लिए इस कंपनी ने IMPCL के स्थापित ब्रांड, 42 एकड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी जड़ी-बूटी नेटवर्क का अधिग्रहण किया है।
इस नए तथ्य के बाद यह सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि 145-160 करोड़ टर्न ओवर वाली कंपनी को सरकार ने सस्ते अर्थात् 121 करोड़ में क्यों बेच दिया? दूसरा सवाल उठता है कि जिस कंपनी को आयुर्वेदिक दवा बनाने का अनुभव ही नहीं है, आखिर उसे इतनी बड़ी आयुष कंपनी किस आधार पर बेचा? तीसरा सवाल है कि इस कंपनी को आयुर्वेदिक एकाधिकार सौंपने के पीछे सरकार की मंशा क्या है?

एक स्थापित एलोपैथिक दवा निर्माता कंपनी (स्काईमैप) द्वारा देश की सबसे पुरानी और शुद्ध आयुर्वेदिक सरकारी इकाई (IMPCL) को मात्र ₹121 करोड़ में खरीद लेना एक नई बहस को जन्म देता है। स्काईमैप ने जो ₹121 करोड़ की बोली लगाई, वह सरकार द्वारा तय ‘रिजर्व प्राइस’ से थोड़ी ही ऊपर थी। लेकिन सवाल वही खड़ा रहता है कि क्या 2006 में बनी एक मध्यम स्तर की निजी एलोपैथी कंपनी को आयुष क्षेत्र के इतने बड़े और ऐतिहासिक बुनियादी ढांचे को सौंपना केवल एक “व्यावसायिक विनिवेश” है, या इसके पीछे कुमाऊं की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक साख को कॉर्पोरेट के हवाले करने की कोई गहरी पटकथा है?
अंदरूनी कहानी: ₹121 करोड़ के सौदे का ‘क्रोनोलॉजी’ और खेल!
एक ऐसी सरकारी कंपनी जिसे 2017 में ही बेचने की “सैद्धांतिक मंजूरी” (In-principle approval) दे दी गई थी, उसे अंततः मई 2026 में आकर ही क्यों बेचा गया? इसके पीछे की क्रोनोलॉजी और छिपी हुई रणनीतियां बड़ी दिलचस्प है।
सरकार ने सितंबर 2023 में प्रारंभिक सूचना ज्ञापन (PIM) जारी कर बोलियां मांगी थीं। शुरुआत में 7 कंपनियों ने इसे खरीदने की इच्छा (Expression of Interest) जताई थी। इन सभी को गृह मंत्रालय (MHA) से बकायदा सिक्योरिटी क्लीयरेंस भी मिल गया था।
दिसंबर 2025 में जब अंतिम तकनीकी और वित्तीय बोलियां (RFP) आमंत्रित की गईं, तो रहस्यमयी ढंग से 7 में से 5 कंपनियां पीछे हट गईं। अंत में जनवरी 2026 तक केवल दो कंपनियों ने सीलबंद लिफाफे में अपनी वित्तीय बोलियां जमा कीं।
जब प्रतियोगिता में सिर्फ दो खिलाड़ी बचे, तो स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स ने ₹121,00,94,400 की बोली लगाकर बाजी मार ली। यह बोली सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम गोपनीय मूल्य (Reserve Price) से मात्र कुछ लाख रुपये ही ऊपर थी।
अंदरूनी कहानी यह साफ करती है कि यह केवल एक साधारण व्यावसायिक सौदा नहीं है। 2006 में बनी एक विशुद्ध एलोपैथिक दवा बनाने वाली कंपनी (स्काईमैप), जिसके प्रमोटर दिल्ली-एनसीआर के रसूखदार व्यवसायी हैं, उसने आयुष मंत्रालय के तहत आने वाली देश की सबसे प्रामाणिक आयुर्वेदिक साख को अपने नियंत्रण में ले लिया है। ₹145 करोड़ से अधिक का सालाना टर्नओवर रखने वाली और ₹22 करोड़ का शुद्ध सालाना मुनाफा कमाने वाली मिनी-रत्न कंपनी को, उसके 42 एकड़ के विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थापित ब्रांड वैल्यू समेत, महज ₹121 करोड़ में एक निजी एलोपैथिक प्लेयर को सौंप देना यह साबित करता है कि परदे के पीछे बिछी बिसात व्यावसायिक कम और राजनीतिक-कॉर्पोरेट गठजोड़ (Crone Capitalism) का हिस्सा अधिक दिखाई देती है।
इस कंपनी के मुख्य प्रमोटर संजय गुप्ता के कारपोरेट नेटवर्क को खंगालने पर पता चलता है कि उनका दखल केवल फार्मा तक सीमित नहीं है। वे क्रोनस माइन्स प्राइवेट लिमिटेड (Kronus Mines Private Limited) जैसी खनन (Mining) क्षेत्र की कंपनियों में भी निदेशक रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि इस समूह का व्यावसायिक दायरा और पहुंच काफी रसूखदार है।
उठते गंभीर सवाल
जब कोई उपक्रम लगातार मुनाफे में हो और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो, तो उसका निजीकरण कई नीतिगत और नैतिक सवाल खड़े करता है। आलोचकों और श्रमिक यूनियनों का सबसे बड़ा आरोप इसके कम मूल्यांकन को लेकर है। यदि किसी कंपनी का सालाना टर्नओवर ही ₹145 करोड़ से अधिक है और उसके पास 42 एकड़ भूमि, मशीनरी तथा स्थापित ब्रांड वैल्यू है, तो उसका आरक्षित मूल्य या बिक्री मूल्य उसके वार्षिक राजस्व से भी कम (~₹121 करोड़ से ₹150 करोड़ के दायरे में) तय किया जाना वित्तीय बुद्धिमत्ता पर सवाल खड़े करता है। इसे अक्सर “क्रॉनी कैपिटलिज्म” या चुनिंदा कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने की कोशिश के रूप में देखा जाता है।
IMPCL केवल एक व्यापारिक इकाई नहीं थी, बल्कि यह देश के गरीब नागरिकों को सस्ती और शुद्ध आयुर्वेदिक दवाएं उपलब्ध कराने का एक जरिया थी। निजी हाथों में जाने के बाद मुनाफे को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र के खत्म होने से इस बाजार पर निजी कंपनियों का एकाधिकार (Monopoly) स्थापित होने का रास्ता साफ होता है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन एक गंभीर समस्या है। IMPCL जैसी फैक्ट्रियां स्थानीय स्तर पर रोजगार का बड़ा जरिया थीं। निजी प्रबंधन अक्सर लागत कम करने के नाम पर छंटनी करता है या ठेका प्रथा (Contract Labor) को बढ़ावा देता है, जिससे स्थानीय लोगों के आर्थिक हितों को चोट पहुंचती है।
विपक्ष और खोजी पत्रकारों द्वारा अक्सर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि क्या सार्वजनिक उपक्रमों को खरीदने वाली कंपनियों या उनके सहयोगियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा दिया गया है। हालाँकि, IMPCL के मामले में “भाजपा के खाते में कितने करोड़ गए” इस पर कोई भी सीधा, प्रमाणित या कानूनी दस्तावेज सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर कोई निश्चित वित्तीय आंकड़ा दिया जा सके। लेकिन कॉर्पोरेट चंदे और नीतिगत फैसलों के बीच सांठगांठ की आशंका लोकतांत्रिक विमर्श का एक अहम हिस्सा बनी हुई है।
संपादकीय टिप्पणी:-
अल्मोड़ा की IMPCL का निजीकरण इस देश की आर्थिक नीतियों के एक बड़े वैचारिक बदलाव का प्रतीक है, जहां ‘वेलफेयर स्टेट’ (कल्याणकारी राज्य) की अवधारणा से पीछे हटकर ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा दिया जा रहा है।
तथ्य यह है कि मुनाफे में चल रही और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देने वाली इस सार्वजनिक धरोहर को बेचना केवल एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक नीतिगत चूक के रूप में देखा जा रहा है। जब देश पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों (आयुष) को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने की बात कर रहा है, तब उसी क्षेत्र की अपनी सबसे विश्वसनीय सरकारी कंपनी को निजी हाथों में सौंप देना विरोधाभासी प्रतीत होता है। विकास के नजरिए से यह कदम कुमाऊं की जनता और देश के सार्वजनिक ढांचे के लिए एक बड़ा नुकसान है।
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नाकारा बेटा पूर्वजों की संकलित की हुई जायदाद बेच कर खा जाता है, यह भी वही है। जिसे जीवन भर परिवार से कोई संबन्ध नहीं रहा वो क्या जाने परिवार क्या होता है, पूर्वजों की संकलित सम्पत्ति क्या होती है।