लोकतंत्र के धर्म को जानो , संविधान – कानून है ;
इनका उद्गम देशभक्ति है , जिससे नेता-अफसर हीन हैं ।
नेता ,अफसर ,व्यापारी ,बाबा , देशभक्ति को भूल चुके हैं ;
हर-एक समस्या की जो जड़ है , भ्रष्टाचार में डूब चुके हैं ।
देश के लगभग आधे-हिंदू , धर्म-सनातन से अनजान ;
पाखण्डों में फंसे हुये हैं , भूल चुके अपनी पहचान ।
पाश्चात-संस्कृति अप-संस्कृति है , स्कूलों से यही मिल रही ;
म्लेच्छों का शिक्षा पर कब्जा, नैतिकता मिट्टी में मिल रही ।
अब्बासी-हिंदू भारत के नेता , धर्म-संस्कृति से डरते हैं ;
एपस्टीन-फाइल के मामले , इन्हीं के जीवन में मिलते हैं ।
धर्म-सनातन का दुश्मन है , अब्राहमिक-ग्लोबल-एजेण्डा ;
अब्बासी-हिंदू भारत के नेता , पिछवाड़े म्लेच्छों का डंडा ।
उनके आगे पूंछ हिलाते , उनका मजहब फैलाते हैं ;
ये टुकड़खोर टुकड़े पा जाते , पुरस्कार भी पाते हैं ।
भारत की सबसे-बड़ी समस्या, देशभक्ति व चरित्र का संकट ;
धर्म – सनातन में ही शक्ति , दूर करे जो सारे कंटक ।
नेता इसको जान चुके हैं , कि घड़ा पाप का फूटने वाला ;
अंतिम-प्रयास कर रहा है नेता,पर अब नहीं है बचने वाला ।
शंकराचार्य पर उनका हमला, बचने का है अंतिम-प्रयास ;
पर ये मूरख नहीं जानता , यही बनेगा गले की फांस ।
जलती-आग में हाथ डालकर, मूरख हाथ जला बैठा है ;
फिर भी मूरख-हृदय न चेता, अपनी चिता में जा बैठा है ।
शंकराचार्यों का तेज-तपोबल, जल के रहेगी पाप की लंका ;
जो सबसे बड़ा नौटंकीबाज है , फूट चुका है उसका-डंका ।
लंकापति रावण की लंका , “हनुमान” ने आग लगाई ;
डंकापति की पाप की लंका, उसकी भी अंतिम-बेला आई ।
धर्म-सनातन की अग्नि में , सारे-पापी जलने वाले हैं ;
शंकराचार्य को क्रुद्ध कर दिया,अब नहीं कोई बचने वाले हैं ।
पापी फौरन करें समर्पण और चरणों में गिर जायें ;
वरना बहुत-बुरी गति होगी , बचा-खुचा जीवन पछतायें ।
अब्बासी-हिंदू तू तौबा कर ले,दोजख की आग में जलने वाला;
पिट चुके हैं तेरे सारे-मोहरे , अब तू जेल में जाने वाला ।
धर्महीन – अज्ञानी – हिंदू , परिवर्तन को पहचानें ;
सच्चे-धर्म में वापस आकर, अपने सही-लक्ष्य को जानें ।
परिवर्तन की आ रही सुनामी , हर – पापी बह जायेगा ;
शंकराचार्यों की बागडोर में , ये भारत बच जायेगा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
